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मैन्युफैक्चरिंग में वृद्धि

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मैन्युफैक्चरिंग में वृद्धि
growth rate

भारतीय अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार के संकेत हैं. प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों का बढ़ता संग्रहण इंगित करता है कि कारोबारी और अन्य उत्पादक गतिविधियों में गति आ रही है. इस कड़ी में मैन्युफैक्चरिंग का बढ़ना बहुत महत्वपूर्ण है. बीते दिसंबर में मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर इंडेक्स (पीएमआई) 57.8 रहा, जो नवंबर में 55.7 था. यह आंकड़ा अक्टूबर, 2020 के बाद से सबसे अधिक है.

एस एंड पी ग्लोबल के अपने आकलन में यह भी बताया है कि वर्तमान वित्त वर्ष (2022-23) की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में पीएमआइ का औसत 56.3 रहा है, जो एक साल में सबसे अधिक है. इससे सिद्ध होता है कि कोरोना महामारी के असर से हमारी फैक्ट्रियां निकल चुकी हैं और यह बढ़त आगे भी बरकरार रहेगी.

वर्ष 2022 की शुरुआत से ही भारतीय मैन्युफैक्चरिंग उद्योग ने मजबूत गति पकड़ी हुई है और उसने साल का अंत शानदार रिकॉर्ड के साथ किया है. घरेलू बाजार में मांग बढ़ते जाने के साथ कंपनियों ने अतिरिक्त माल भी खरीदा और तेज उत्पादन करने के लिए अधिक लोगों को रोजगार भी दिया. इसका एक असर यह भी हुआ कि चीजों के उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली चीजों की मांग भी बढ़ी.

इससे हमारे निर्यात में बढ़ोतरी के साथ आयात में भी वृद्धि हुई. उत्पादन में बढ़ोतरी के महत्व को इस बात से भी समझा जाना चाहिए कि हमारा निर्यात तो बढ़ता रहा है, लेकिन बीते पांच माह में वैश्विक स्तर पर मांग में कमी आने से इस वृद्धि की रफ्तार बहुत कम रही है. लेकिन घरेलू बाजार में मांग बनी रही है और कंपनियां उसकी आपूर्ति में जुटी हुई हैं. मांग, उत्पादन और रोजगार परस्पर संबद्ध होते हैं.

रोजगार मिलने से आमदनी होती है, तो मांग में वृद्धि होती है. उसकी पूर्ति के लिए उत्पादन बढ़ता है और फिर रोजगार के मौके भी बढ़ते हैं. हालांकि बीते वर्ष फैक्ट्रियों में भर्ती की प्रक्रिया चली है, लेकिन श्रम बाजार को उसका बहुत अधिक लाभ नहीं मिला है. दिसंबर में रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद रोजगार के अवसरों का सृजन की दर तीन माह में सबसे कम रही.

उल्लेखनीय है कि दिसंबर में लागत मूल्य की मुद्रास्फीति पहले से कम ही रही थी, लेकिन उत्पादकों ने तैयार माल को अधिक दाम पर बेचा. इस कारण विभिन्न वस्तुओं, विशेषकर खाद्य पदार्थों, की मुद्रास्फीति कम होने के बावजूद महंगाई से लोगों को वैसी राहत नहीं मिली है, जितनी अपेक्षित है.

जानकारों का मानना है कि कंपनियों को इन मामलों में संतुलन स्थापित करने की कोशिश करनी चाहिए. अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तरह भारत का ध्यान भी 2023 में वैश्विक परिस्थितियों पर है. मंदी की आशंका के बावजूद हमारे उत्पादकों ने यह संकेत दे दिया है कि उनमें अधिक उत्पादन की क्षमता है.

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