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भारत-चीन संबंध में सुधार रणनीतिक है

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भारत-चीन संबंध में सुधार रणनीतिक है
भारत-चीन संबंध

India-China relations : भारत-चीन संबंधों में हाल के महीनों में जो नरमी दिख रही है, वह दोनों देशों के बीच पारस्परिक विश्वास में किसी बुनियादी बदलाव का परिणाम कम और तेजी से विखंडित होती वैश्विक व्यवस्था के दबावों का नतीजा अधिक है. पिछले एक दशक तक दोनों को प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जाता रहा, जिनके बीच सीमा विवाद, क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा और अलग-अलग रणनीतिक झुकाव जैसे गहरे मतभेद मौजूद थे. वर्ष 2020 के गलवान घाटी संघर्ष के बाद यह धारणा और मजबूत ही हुई कि दोनों देशों के रिश्ते लंबे समय तक तनावपूर्ण बने रहेंगे. पर 2025 के बाद के घटनाक्रम बताते हैं कि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं. यह बदलाव इसलिए नहीं है कि उनके मूल विवाद सुलझ गये हैं, बल्कि इसलिए है, क्योंकि वैश्विक परिस्थितियां, खासकर डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों ने सहयोग के लिए एक सीमित, लेकिन महत्वपूर्ण अवसर पैदा कर दिया है.


जिस अमेरिका को भारत लंबे समय तक भरोसेमंद रणनीतिक साझेदार के रूप में देखता रहा, ट्रंप के नेतृत्व में वह अधिक लेन-देन आधारित और अनिश्चित रुख अपनाता नजर आ रहा है. भारत और चीन पर लगाये गये टैरिफ, खासकर भारतीय निर्यात पर कड़े शुल्क यह दिखाते हैं कि वैश्विक आर्थिक संबंध कितने अस्थिर हैं. चीन के प्रति अमेरिकी नीति में भी उतार-चढ़ाव दिखता है, जहां एक ओर दबाव बनाया जाता है, दूसरी ओर कुछ मामलों में समझौते की गुंजाइश भी रखी जाती है. इस असमान व्यवहार ने भारत को सोचने पर मजबूर किया है कि अमेरिका पर निर्भर रहना रणनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है. इसी परिदृश्य में चीन ने भी तेजी से कूटनीतिक अवसर को भुनाने की कोशिश की है.

चीनी नेताओं के बयान इस पर जोर देते हैं कि भारत और चीन के साझा हित उनके मतभेदों से कहीं अधिक हैं. चीन यह संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि भारत को अमेरिकी नेतृत्व वाले इंडो-पैसिफिक ढांचे, खासकर क्वाड जैसे मंचों के साथ अपने जुड़ाव को संतुलित रखते हुए बीजिंग के साथ सहयोग के रास्ते खुले रखने चाहिए. कुछ ठोस कदम भी इस दिशा में उठाये गये हैं. भारत द्वारा सीमित रूप से चीनी निवेश के लिए नियमों में ढील देना संकेत है कि नयी दिल्ली आर्थिक वास्तविकताओं को समझते हुए एक व्यावहारिक दृष्टिकोण अपना रही है. इलेक्ट्रॉनिक्स, सोलर और पूंजीगत वस्तुओं में चीन की भूमिका की अनदेखी करना भारत के लिए संभव नहीं है, खासकर तब, जब वह अपने विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करना चाहता है. इसी तरह, दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानों का फिर से शुरू होना, पर्यटक वीजा की बहाली और कैलाश मानसरोवर यात्रा का पुनरारंभ दर्शाता है कि दोनों पक्ष संबंधों को सामान्य बनाने के लिए माहौल तैयार कर रहे हैं.


दोनों देश हाल के भू-राजनीतिक झटकों से उत्पन्न समान चुनौतियों का सामना कर रहे हैं. होर्मुज के आसपास बढ़ते तनाव और ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता ने दोनों की बाहरी निर्भरता उजागर की है. चीन के लिए खाड़ी क्षेत्र से तेल की आपूर्ति सुनिश्चित करना लंबे समय से रणनीतिक प्राथमिकता रही है, जबकि भारत के लिए महंगा तेल महंगाई, मुद्रा दबाव और आर्थिक अस्थिरता का कारण बनता है. ऐसे में, जब वैश्विक आपूर्ति शृंखलाएं बाधित होती हैं या भुगतान संबंधी समस्याएं सामने आती हैं, तब भारत को अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. इन साझा चिंताओं ने दोनों देशों को सीमित सहयोग की ओर प्रेरित किया है. भारत और चीन समझते हैं कि विखंडित वैश्विक व्यवस्था उनके आर्थिक हितों के लिए खतरा है. इसीलिए सीमित स्तर पर सहयोग करना उनके लिए व्यावहारिक बनता जा रहा है.

चीन के लिए भारत के साथ संतुलित संबंध बनाये रखना इस बात की गारंटी देता है कि एशिया में उसके खिलाफ एकजुट मोर्चा न बने, जबकि भारत के लिए यह अमेरिका के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाये रखने का एक साधन है. हालांकि, इस नरमी को स्थायी सुधार के रूप में देखना गलत होगा. दोनों देशों के बीच अविश्वास के मूल कारण अब भी मौजूद हैं. सीमा विवाद अब भी अनसुलझा है और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव की आशंका बनी रहती है. ऐसे ही पाकिस्तान के साथ चीन की घनिष्ठता, जिसमें सैन्य और परमाणु सहयोग शामिल है, भारत के लिए चिंता का विषय है. जल संसाधनों, बुनियादी ढांचे और क्षेत्रीय प्रभाव से जुड़े मुद्दे भी आपसी अविश्वास बढ़ाते हैं.

बहुपक्षीय मंचों पर भी चीन का रवैया कई बार भारत के हितों के अनुरूप नहीं होता. दोनों देशों के बीच शक्ति का असंतुलन भी एक महत्वपूर्ण कारक है. चीन की आर्थिक और तकनीकी क्षमता भारत से अधिक है, जिससे उसे वैश्विक मंचों पर अधिक प्रभाव मिलता है. यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चीन और भारत के साथ व्यवहार करने का तरीका अलग-अलग होता है. यह स्थिति भारत के लिए एक चुनौती है, क्योंकि उसे अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाये रखते हुए अपने हितों की रक्षा करनी होती है. नयी दिल्ली ने अब तक इस स्थिति का संतुलित तरीके से सामना किया है. उसने अमेरिका और अन्य साझेदार देशों के साथ अपने संबंधों को कमजोर नहीं किया है, लेकिन साथ ही, चीन के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते भी खुले रखे हैं. यह भारत की पारंपरिक रणनीतिक स्वायत्तता की नीति के अनुरूप है, जिसमें किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए बहुआयामी संबंध बनाये जाते हैं. लेकिन इस नीति को सफल बनाने के लिए भारत को अपनी घरेलू क्षमताओं को भी मजबूत करना होगा, चाहे वह विनिर्माण हो, प्रौद्योगिकी हो या फिर ऊर्जा सुरक्षा.


इन दिनों भारत-चीन संबंधों में जो सुधार दिख रहा है, वह अंतत: एक रणनीतिक समायोजन है, न कि स्थायी समाधान. दोनों देश बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुसार अपने-अपने विकल्प तलाश रहे हैं. सहयोग और प्रतिस्पर्धा का यह मिश्रण भविष्य में भी बना रहेगा, जो इस पर निर्भर करेगा कि दोनों देश अपने मतभेदों को कितनी समझदारी से संभालते हैं और किस हद तक अपने साझा हितों को प्राथमिकता देते हैं. अभी यह कहना उचित होगा कि भारत और चीन पारंपरिक अर्थों में साझेदार नहीं बन रहे, बल्कि अनिश्चित और बदलती विश्व व्यवस्था में अपने हितों को सुरक्षित करने के लिए व्यावहारिक कदम उठा रहे हैं. यह एक सावधानीपूर्ण और सीमित सहयोग है, जो परिस्थितियों के अनुसार बदल सकता है. जब तक मूल विवादों का समाधान नहीं होता, तब तक यह नरमी नाजुक ही बनी रहेगी और दोनों देशों को हर कदम सोच-समझकर उठाना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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