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क्रिकेट नियमों में जरूरी बदलाव

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क्रिकेट नियमों में जरूरी बदलाव

पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल (आइसीसी) ने कुछ नये नियमों को स्वीकृति दी है, जिनका अहम असर हो सकता है. इस संबंध में चर्चा से पहले क्रिकेट के मौजूदा माहौल को देखा जाना चाहिए. खेल के रूप में क्रिकेट टेस्ट क्रिकेट से एकदिवसीय फॉर्मेट में आया, जिसमें समय-समय पर नियमों में बदलाव होता रहा है. पहले वह साठ ओवर का होता था, फिर चालीस-पैंतालीस ओवरों के मैच भी हुए और आखिरकार पचास ओवर निर्धारित हुए.

एक समय ऐसा भी आया, जब सचिन तेंदुलकर के सुझाव पर अनधिकृत रूप से एकदिवसीय खेल में भी 25-25 ओवर के पारी की व्यवस्था हुई. टी-20 फॉर्मेट आने के बाद कई लोग टेस्ट क्रिकेट को असली फॉर्मेट मानते हुए कहते रहे हैं कि इसके आने के बाद एकदिवसीय क्रिकेट का क्या औचित्य रह गया है. साथ ही, द्विपक्षीय एकदिवसीय खेलों पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं.

अगर फुटबॉल में देखें, तो राष्ट्रीय टीमें दोस्ताना मैच खेलती हैं या फिर उनका मुकाबला विश्व कप और महादेशीय टूर्नामेंट में होता है. उसके बाद फुटबॉल में लीग कल्चर है, लेकिन क्रिकेट में ऐसी संगठित व्यवस्था नहीं है. टेस्ट मैच और टी-20 के बीच में भी एकदिवसीय मैच खेले जाते हैं. साथ ही, कई तरह के टूर्नामेंट भी होते रहते हैं.

भारतीय टीम के पूर्व कोच और अनुभवी खिलाड़ी रहे रवि शास्त्री का स्पष्ट मानना है कि टी-20 लीग के स्तर पर खेला जाना चाहिए तथा अन्य फॉर्मेट में विश्व कप जैसे आयोजन होने चाहिए. द्विपक्षीय मैचों का कोई मतलब नहीं रह गया है. उदाहरण के लिए, कुछ दिन के बाद कितने लोग मोहाली में हुए भारत-ऑस्ट्रेलिया मैच को याद कर सकेंगे. तीसरी उल्लेखनीय बात यह है कि पिछले समय में क्रिकेट में बदलाव की सबसे बड़ी चुनौती यह रही है कि इस खेल को कैसे दिलचस्प बनाकर रखा जाए.

अभी जो नियमों में बदलाव या संशोधन हुए हैं, इनकी मांग लंबे समय से हो रही थी और अंतत: आईसीसी को उन्हें मानना पड़ा है. नॉन-स्ट्राइकर एंड पर खड़े बल्लेबाज को गेंद फेंकने से पहले रन आउट करने को ‘मांकड़ रन आउट’ कहा जाता था, जो सीधे तौर पर एक उत्कृष्ट भारतीय खिलाड़ी के लिए अपमानजनक मामला था. भारतीय खिलाड़ी रविचंद्रन अश्विन ने इस पर सवाल उठाया था कि इस रन आउट को क्यों अनैतिक माना जाता है. अक्सर बल्लेबाज गेंद फेंके जाने से पहले से ही आगे बढ़ कर बढ़त ले लेता है.

चेतावनी के बावजूद वह ऐसा करता है और गेंदबाज उसे आउट कर देता है, तब कहा जाता था कि यह खेल भावना व नैतिकता के विरुद्ध है. जब अश्विन ने इस तरह एक खिलाड़ी को आउट किया था, पूरी दुनिया की मीडिया उसके खिलाफ हो गयी थी. इस तरह के आउट को सही बता कर आईसीसी ने अश्विन की बात पर मुहर लगा दी है.

हाल के समय में यह समस्या भी बढ़ी है कि निर्धारित समय में पारियां खत्म नहीं हो रही हैं. इसका लाभ कई टीमों को मिलता था. कई बार होता है कि कोई बल्लेबाज अपनी लय में है, पर दूसरी टीम फील्डर बदलने में समय लगाने लगती है. यह सीधे तौर पर बल्लेबाज की लय तोड़ने की कोशिश है. अब नियम यह है कि अगर कोई टीम निर्धारित समय में पारी खत्म नहीं करती है, तो अतिरिक्त समय में उसके एक फील्डर को अंदर कर दिया जाता है.

यह नियम एशिया कप में अपनाया भी गया था. पहले मैच फीस आदि काटने का चलन था, जिससे टीमों को असर नहीं पड़ता था, पर अब समय अधिक लेने पर इस व्यवस्था से हार-जीत पर असर पड़ने लगा है. अब इम्पैक्ट प्लेयर को लाने की बात भी हो रही है, जैसा फुटबॉल में होता है. इसके तहत बारहवें खिलाड़ी को कभी भी मैदान में उतारने की अनुमति मिल सकती है.

बॉल चमकाने का पुराना इतिहास रहा है. पाकिस्तान टीम पर बहुत समय से आरोप लगता रहा है कि रिवर्स स्विंग कराने के लिए एक साइड में चमक खत्म कर दी जाती है और दूसरी ओर इसे रखा जाता है. इसी तरह बॉल को खुरचने का मामला भी सामने आता रहता है. आपको याद होगा कि इस आरोप में एक बार दक्षिण अफ्रीका में सचिन तेंदुलकर पर पाबंदी भी लगायी गयी थी. इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए आइसीसी ने साफ किया है कि आप बॉल में थूक भी नहीं लगा सकते हैं.

आम तौर पर क्रिकेट के नियम बल्लेबाजों की हिमायत में होते हैं, तो गेंदबाज अलग-अलग तरीके से अपने को प्रभावी बनाने की कोशिश करते हैं. अब यह देखना होगा कि इस नये नियम को व्यावहारिक तौर पर कैसे और किस हद तक लागू किया जाता है. अगर बॉल में रफनेस है, ओस है, तो बॉलर तो उसे साफ करेगा ही. कई लोग पसीने से भी गेंद चमकाने की कोशिश करते हैं. हमें याद रखना चाहिए कि ‘बॉल बनाने’ की विधा उतनी ही पुरानी है, जितना पुराना क्रिकेट का खेल है. (बातचीत पर आधारित).

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