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Home Opinion स्वाधीनता आंदोलन की अलख जगायी थी गुरुदेव ने

स्वाधीनता आंदोलन की अलख जगायी थी गुरुदेव ने

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स्वाधीनता आंदोलन की अलख जगायी थी गुरुदेव ने

बंगाल में 25 बैशाख एक विशेष दिन होता है. गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर की जयंती के अवसर पर इस दिन शांतिनिकेतन के अलावा कई स्थानों पर आयोजन किये जाते हैं. अंग्रेजी साल के हिसाब से उनकी जयंती सात मई को मनायी जाती है. गुरुदेव को कई तरह से याद किया जा सकता है और ऐसा किया भी जाना चाहिए. यह प्रश्न भी हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि रवींद्रनाथ की महत्ता क्या केवल इस बात से है कि नोबेल पुरस्कार पाने वाले वे पहले एशियाई व्यक्ति हैं?

मूल बांग्ला से अंग्रेजी में अनूदित उनकी एक छोटी सी कृति ‘गीतांजलि’ के लिए विश्व का यह सबसे बड़ा पुरस्कार गुरुदेव को दिया गया था, जबकि उन्होंने कविता, गीत, कहानी, नाटक, निबंध आदि विधाओं में एक से बढ़कर एक रचनाएं दी हैं. एक मौलिक चित्रकार के रूप में उनकी चर्चा विश्वभर में हुई. ‘माडर्न रिव्यू’ में संपादक रामानंद चटर्जी के माध्यम से रवीन्द्रनाथ ठाकुर की रचनाओं की चर्चा पश्चिम में उन्हें 1913 में नोबेल पुरस्कार मिलने से पहले शुरू हो गयी थी.

फिर वह दिन आया, जब रवींद्रनाथ का कविता पाठ लंदन में चित्रकार विलियम रोदेनस्टाइन के घर पर हुआ. आयरिश कवि डब्ल्यूबी यीट्स से उनकी भेंट हुई. उसके कुछ ही समय बाद रवीन्द्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार देने की घोषणा की गयी. पराधीन भारत के आत्मविश्वास को जगाने के साथ राष्ट्रीय आंदोलन की गति तेज करने तथा 1905 के बंगाल विभाजन के समय से स्वदेशी आंदोलन की अलख जगाने में रवींद्रनाथ ठाकुर की भूमिका सर्वविदित है.

उनका बड़ा प्रयोग और बड़ी देन वे संस्थाएं हैं, जो उन्होंने शांतिनिकेतन एवं श्रीनिकेतन में स्थापित की थीं. एक संस्था औपनिवेशिक ढांचे से मुक्त शिक्षा से संबंधित थी, तो दूसरी संस्था का मकसद ग्रामीण भारत की श्रीवृद्धि करना था. एक बड़ा प्रश्न यह है कि यदि रवींद्रनाथ ठाकुर को नोबेल पुरस्कार न मिलता, तो भारत उनके महत्व को समझ पाता या नहीं. हम किसी के महत्व को समझने के लिए पश्चिम की मान्यता का इंतजार करते रहे हैं.

गुरुदेव की आत्मा शांतिनिकेतन के उस विद्यालय में बसती थी, जिसे उनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर ने शुरू किया था. भाई बालेंद्रनाथ के असमय चले जाने के बाद 1901 से महर्षि की तेरहवीं और सबसे कनिष्ठ संतान रवींद्रनाथ ने इस तपोवन सरीखे विद्यालय का प्रबंधन देखना शुरू किया.

अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के नाना आचार्य क्षितिमोहन सेन को किसी तरह मान-मनुहार करके रवींद्रनाथ सौ रुपये महीने के वेतन पर हिमाचल की मंडी रियासत से तब लेकर आये थे, जब शांतिनिकेतन में अन्य लोगों का वेतन औसतन बीस रुपये हुआ करता था. प्रसिद्ध इतिहासकार सर जदुनाथ सरकार को शांतिनिकेतन में पढ़ाने-लिखाने का तरीका जमा नहीं था.

रवींद्रनाथ ने उनकी चिट्ठी के जवाब में बस इतना ही कहा था कि आनंद उनके विद्यालय का मूल तत्व है. दो दशक की अवधि पार कर शांतिनिकेतन में विश्वभारती विश्वविद्यालय की स्थापना हुई. प्रथम विश्वयुद्ध समाप्त होने के बाद नोबेल पुरस्कार से विभूषित कवि से मिलने के लिए दुनियाभर के विद्वान शांतिनिकेतन आये और कुछ समय तक रहे. इनमें सिल्वां लेवी, विंटरनित्ज़, गुइसेप्पे तुच्ची, फार्मिकी आदि प्रमुख हैं.

विश्वभारती की स्थापना के बीस वर्ष बाद 1940 में गुरुदेव ने महात्मा गांधी से कहा कि अब इस संस्था को चला पाना उनके लिए कठिन है. वे परीक्षा के बोझ से दबे विद्यार्थियों को देखकर भी दुखी होते थे. मशीन की तरह एक निष्प्राण आनंदहीन संस्था वे नहीं चलाना चाहते थे. जब तक गुरुदेव रहे, शांतिनिकेतन रचनात्मकता का एक जीवंत केंद्र रहा.

सीएफ एंड्र्यूज के भुलक्कड़पन से लेकर पंडित हजारीप्रसाद द्विवेदी की छत फोड़ने वाली हंसी आश्रम में रस का संचार करती थी. दूसरी ओर, लियोनार्ड एमहर्स्ट और संतोषचंद्र मजूमदार जैसे कर्मठ कृषिविदों ने श्रीनिकेतन में प्राण फूंके. रवींद्रनाथ ने शांतिनिकेतन को ऋतुओं के उत्सव केंद्र में बदला था. हर ऋतु के इतने गीत लिखे कि छात्र-छात्राओं के कंठ से निकलकर वे आश्रम को प्रकृति से जोड़ते.

गुरुदेव के शिक्षा दर्शन का मूलमंत्र था कि मनुष्य से मनुष्य की दूरी और प्रकृति से मनुष्य की दूरी मिटनी चाहिए. वह संदेश मरुथल की नदी की तरह विलीन सा हो गया है. फिर भी गुरुदेव कहते थे-

‘जीबौने जौतो पूजा होलो ना शारा/जानि हे जानि ताओ/होयनी हारा.

…जे नोदी मोरुपथे हारालो धारा/जानि हे जानि ताओ/हौय नी हारा.’ अर्थात जीवन में जो प्रार्थना अधूरी छूट गयीं, जो फूल खिलने से पहले मुरझा गया, जो नदी मरुपथ में विलीन हो गयी, वह सब कुछ व्यर्थ नहीं गया. उसका भी अर्थ बना रहेगा.’ (लेखक ने शांतिनिकेतन में अध्ययन किया है. ये उनके निजी विचार हैं.)

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