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शास्त्रीय भाषाओं का विस्तार

संसदीय राजभाषा समिति ने अपनी 11वीं रिपोर्ट में अनुशंसा की है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों सहित सभी तकनीकी एवं गैर तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई का माध्यम अनिवार्य रूप से हिंदी और स्थानीय भाषाएं होनी चाहिए. इसमें यह भी कहा गया है कि अति आवश्यक होने पर ही अंग्रेजी में पढ़ाई होनी चाहिए तथा धीरे-धीरे हिंदी लागू करने का प्रयास किया जाना चाहिए. केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की अध्यक्षता वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को सौंप दी है.

इस रिपोर्ट में हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा बनाये जाने के लिए कोशिश करने का सुझाव भी दिया गया है. उल्लेखनीय है कि नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी यह प्रावधान किया गया है कि शिक्षा का माध्यम हिंदी और स्थानीय भाषाएं होनी चाहिए. स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी न्यायालयों, कार्यालयों, बैंकों और शैक्षणिक संस्थानों में अंग्रेजी का वर्चस्व है. इससे भारतीय भाषाओं का विस्तार तो प्रभावित होता ही है, राष्ट्रीय विकास भी बाधित होता है. इससे देश की बड़ी आबादी उपेक्षित और वंचित रह जाती है.

आज भी कई नौकरियों की चयन परीक्षा में हिंदी माध्यम का विकल्प नहीं है, जबकि अंग्रेजी भाषा का एक प्रश्नपत्र अनिवार्य रहता है. समिति ने इस व्यवस्था को हटाने का सुझाव दिया है. ऊपरी अदालतों में मुख्य रूप से अंग्रेजी में कामकाज होता है और निर्णय भी अंग्रेजी में लिखे जाते हैं. उनके हिंदी अनुवाद की अनुशंसा निश्चित ही स्वागतयोग्य है. हिंदी भाषी राज्यों में भी बैंकों और कार्यालयों में अंग्रेजी का चलन अधिक है, जबकि अधिकतर नागरिकों को उस भाषा का ज्ञान नहीं होता.

इस रवैये को बदलने की सलाह देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि अंग्रेजी में काम करने वाले अधिकारियों को चेतावनी दी जायेगी. वर्ष 1976 में गठित संसदीय राजभाषा समिति आम तौर पर अपनी रिपोर्ट हर पांच वर्ष में प्रस्तुत करती है. लेकिन 30 सांसदों (20 लोकसभा से और 10 राज्यसभा से) की वर्तमान समिति ने तीन साल के भीतर दो रिपोर्ट पेश की है. ताजा रिपोर्ट में कुल 112 सुझाव दिये गये हैं.

इससे यह स्पष्ट रूप से इंगित होता है कि सरकार और संसद भारतीय भाषाओं के उत्थान के लिए प्रतिबद्ध हैं तथा इस दिशा में ठोस पहल की जा रही हैं. हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा और कामकाज को बढ़ावा देने से ही अंग्रेजी के वर्चस्व से छुटकारा पाया जा सकता है. हिंदी भाषी राज्यों में भी हिंदी माध्यम उपेक्षित है. इन राज्यों में हिंदी की अनिवार्यता का सुझाव सराहनीय है. रिपोर्ट पर हिंदी थोपने का आरोप अनुचित है क्योंकि इसमें क्षेत्रीय भाषाओं को भी समुचित महत्व दिया गया है. आशा है कि राष्ट्रपति की ओर से सुझावों पर अमल के आदेश जल्दी ही जारी होंगे.

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