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Home Opinion एफसीआरए के नये नियम देंगे पारदर्शिता, पढ़ें डॉ मयंक मुरारी का आलेख

एफसीआरए के नये नियम देंगे पारदर्शिता, पढ़ें डॉ मयंक मुरारी का आलेख

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एफसीआरए के नये नियम देंगे पारदर्शिता, पढ़ें डॉ मयंक मुरारी का आलेख
एफसीआरए के नये नियम, एआई फोटो

FCRA New Rules: केद्र सरकार ने विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) के तहत गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ), धर्मार्थ ट्रस्टों, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों के लिए विदेशी वित्तपोषण संबंधी नियमों को और अधिक सख्त एवं पारदर्शी बनाया है. हाल ही में गृह मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचनाओं और संशोधनों का उद्देश्य विदेशी धन के उपयोग में जवाबदेही बढ़ाना तथा यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी सहायता का उपयोग केवल घोषित उद्देश्यों के लिए ही हो. पहले एफसीआरए पंजीकरण प्राप्त करने वाले संगठन स्वयं को सामाजिक, शैक्षणिक, धार्मिक, सांस्कृतिक या आर्थिक गतिविधियों से जोड़कर पंजीकरण करा सकते थे. लेकिन नये नियमों के अनुसार अब प्रत्येक संगठन को स्पष्ट रूप से यह बताना होगा कि वह विदेशी धन का उपयोग किन विशिष्ट उद्देश्यों के लिए करेगा.

इससे सरकार को जहां धन के उपयोग की निगरानी करने में आसानी होगी, वहीं यह सुनिश्चित भी किया जा सकेगा कि विदेशी सहायता का किसी भी तरह दुरुपयोग न हो. हालांकि, कुछ सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों का यह मानना है कि इस नयी व्यवस्था से संगठनों का कार्यगत लचीलापन तुलनात्मक रूप से कम हो सकता है. इसके अलावा बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप योजनाओं में त्वरित परिवर्तन करना भी पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है.

नये नियमों का एक महत्वपूर्ण पहलू भौगोलिक सीमा निर्धारण भी है. अब एफसीआरए पंजीकरण केवल उन्हीं राज्यों या केंद्र शासित प्रदेशों के लिए मान्य होगा, जिनका उल्लेख आवेदन में किया गया है. यदि कोई संगठन भविष्य में अपने कार्यक्षेत्र का विस्तार करना चाहता है, तो उसे फिर से अनुमति लेनी होगी. पहले संगठन अपने कार्यक्षेत्र की जानकारी तो देते थे, लेकिन उनका पंजीकरण किसी विशेष राज्य तक सीमित नहीं होता था. इस बदलाव से सरकार को विदेशी वित्तपोषित गतिविधियों की क्षेत्रवार निगरानी करने में सुविधा होगी.

दूसरी ओर, कई राज्यों में कार्य करने वाले संगठनों के लिए यह नयी व्यवस्था अतिरिक्त प्रशासनिक प्रक्रिया और चुनौतियां पैदा कर सकती है. गृह मंत्रालय ने ‘प्रमुख पदाधिकारी’ की परिभाषा का भी विस्तार किया है. अब इसमें केवल अध्यक्ष या सचिव ही नहीं, बल्कि ट्रस्टी, निदेशक, साझेदार तथा संगठन के संचालन और प्रबंधन पर प्रभाव रखने वाले अन्य व्यक्तियों को भी शामिल किया गया है. इसके साथ ही नेतृत्वकारी पदों पर विदेशी नागरिकों की नियुक्ति को लेकर भी अतिरिक्त प्रतिबंध लगाये गये हैं. सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी प्रभाव और नियंत्रण की संभावनाओं को कम किया जा सकेगा. जबकि कुछ विशेषज्ञ इसे नागरिक समाज संगठनों की स्वायत्तता पर अंकुश के रूप में देखते हैं.

नये नियमों की सबसे अधिक चर्चा धार्मिक गतिविधियों से संबंधित प्रावधानों को लेकर हो रही है. सरकार ने स्पष्ट किया है कि धार्मिक शिक्षा, धार्मिक परंपराओं का संरक्षण, धर्मशास्त्रीय अध्ययन और धार्मिक सभाओं जैसी गतिविधियां जारी रह सकती हैं, पर विदेशी धन का उपयोग धर्मांतरण से जुड़े कार्यों के लिए नहीं किया जा सकेगा. यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 तथा सर्वोच्च न्यायालय के प्रसिद्ध रेव स्टेनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977) फैसले की भावना के अनुरूप माना जा रहा है. उस निर्णय में न्यायालय ने कहा था कि धर्म का प्रचार करने का अधिकार किसी अन्य व्यक्ति को धर्मांतरित करने का अधिकार नहीं देता.

सरकार का मानना है कि यह प्रावधान विदेशी वित्तपोषण के माध्यम से होने वाले धर्मांतरण को रोकने में मददगार साबित होगा. हालांकि, नागरिक अधिकार समूहों का कहना है कि इस प्रावधान की व्याख्या और क्रियान्वयन में संतुलन और सावधानी आवश्यक होगी, ताकि वैध धार्मिक एवं सामाजिक गतिविधियां प्रभावित न हों. इन संशोधनों का एक उद्देश्य ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्य करने वाले संगठनों के बीच पारदर्शिता बढ़ाना भी है. डिजिटल युग में वित्तीय लेन-देन और सामाजिक गतिविधियों के बेहतर रिकॉर्ड रखने पर जोर दिया गया है. इससे विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग का अधिक सटीक आकलन संभव होगा.

इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के उल्लंघनों के लिए दंड प्रावधानों में भी संशोधन किये गये हैं. सरकार का मानना है कि कठोर दंड व्यवस्था नियमों का पालन सुनिश्चित करने में मदद करेगी. पर कई संगठनों का तर्क है कि इससे अनुपालन संबंधी लागत और प्रशासनिक बोझ बढ़ सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इन नियमों का प्रभाव सभी संगठनों पर समान रूप से नहीं पड़ेगा. बड़े और संसाधन-संपन्न संगठन नयी प्रक्रियाओं और तकनीकी जरूरतों को अपेक्षाकृत आसानी से पूरा कर सकेंगे. इसके विपरीत छोटे और जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों के सामने अधिक चुनौतियां होंगी. खासकर आदिवासी क्षेत्रों, ग्रामीण इलाकों, महिला सशक्तीकरण, मानवाधिकार, सामाजिक न्याय और शिक्षा के क्षेत्र में काम करने वाले अनेक संगठन सीमित संसाधनों के साथ कार्य करते हैं.

एफसीआरए के नये नियम एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा करते हैं-पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए नागरिक समाज की स्वतंत्रता को कैसे संरक्षित रखा जाये? सरकार का दृष्टिकोण है कि विदेशी धन से संचालित गतिविधियों की निगरानी लोकतांत्रिक शासन और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए आवश्यक है. वहीं नागरिक समाज संगठनों का मानना है कि अत्यधिक नियंत्रण उनकी स्वतंत्रता और विकास कार्यों की क्षमता को सीमित कर सकता है. निस्संदेह, एफसीआरए के नये नियम देश में विदेशी वित्तपोषण के नियमन को एक नये चरण में ले जाते हैं. उद्देश्य-आधारित पंजीकरण, भौगोलिक सीमाएं, धर्मांतरण पर स्पष्ट रोक, व्यापक प्रकटीकरण और कड़े दंड सरकार की बढ़ती निगरानी व्यवस्था को दर्शाते हैं.

ये प्रावधान पारदर्शिता और जवाबदेही को मजबूत कर सकते हैं, लेकिन साथ ही छोटे और जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों के सामने नयी चुनौतियां भी पेश करते हैं. आने वाले समय में इन नियमों की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सरकार पारदर्शिता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए नागरिक समाज संगठनों की सकारात्मक भूमिका को किस प्रकार प्रोत्साहित और संरक्षित करती है. एक उत्तरदायी, पारदर्शी और सहभागी समाज के निर्माण के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन और विश्वास आवश्यक है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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