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नयी पीढ़ी में जोर पकड़ती नकली शादी, पढ़ें क्षमा शर्मा का लेख

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नयी पीढ़ी में जोर पकड़ती नकली शादी, पढ़ें क्षमा शर्मा का लेख
नकली शादी

Fake marriage : एक समय लोग विदेश जाने के लिए वहां के किसी नागरिक से झूठी शादी करते थे. वहां रहते थे, फिर नागरिकता मिलने के बाद अलग हो जाते थे. इनमें स्त्री-पुरुष, दोनों शामिल थे. गत वर्ष पंजाब के बारे में ऐसी खबरें आयी थीं कि वहां लड़के उन लड़कियों से शादी कर लेते हैं, जो विदेश जाने की योग्यता रखती हों. फिर वे चाहते हैं कि वे लड़कियां उन्हें बुला लें, लेकिन बहुत-सी लड़कियां वहां जाकर लड़कों और उनके परिवार वालों का फोन तक उठाना बंद कर देती हैं.


लेकिन आज अपने देश में युवाओं के बीच एक नया ट्रेंड देखने में आ रहा है. इसे फेक मैरिज का नाम ही दिया गया है. इसमें न असली दूल्हा होता है, न असली दुल्हन. इन्हें एक प्रतियोगिता के तहत चुना जाता है. इनमें फेरे नहीं होते, न कोई पंडित इस अवसर पर होता है, लेकिन रस्में वही होती हैं. हल्दी, मेहंदी, संगीत, नाच-गाना, सजावट, दावत. इसके लिए महंगे बैंक्वेट हॉल, रिसोर्ट, बड़ी छतें, होटल बुक किये जाते हैं. यहां बहुत से लोग इकट्ठा होते हैं. वे भी दूल्हा-दुल्हन के रिश्तेदार होने का नाटक करते हैं. इन सबका आयोजन भी ईवेंट मैनेजमेंट कंपनियां करती हैं.


इन्हें तरह-तरह के नाम दिये जाते हैं. जैसे कि स्कैम संगीत, फेक इंडियन वेडिंग या जुम्मे की रात आदि. मजेदार यह है कि ऐसी शादियों में शामिल होने के लिए पांच सौ रुपये से तीन हजार रुपये के टिकट भी रखे जाते हैं. इन्हें शादी थीम पार्टी कहा जाता है या नकली शादी वीकएंड. ऐसी शादियां दिल्ली, मुंबई, पुणे समेत बहुत से शहरों में होने लगी हैं. ऐसी नकली शादियों में लोग टिकट लेकर भी क्यों जाना चाहते हैं? इसका कारण बताया जाता है कि लोग अपनी शादी पर जो महंगे कपड़े बनवाते हैं, वे उन्हें शायद ही कभी पहन पाते हैं. ऐसी शादियां उन्हें महंगे कपड़े पहनने का मौका देती हैं. हालांकि यह तर्क गले नहीं उतरता, क्योंकि वे कपड़े तो असली शादियों में भी पहने जा सकते हैं.


इन नकली शादियों में जो लोग आते हैं, वे खूब सज-धज कर, बालों में गजरे लगा कर आते हैं. ब्यूटी पार्लर्स की भी चांदी हो जाती है. संगीत में लोग अपने पुराने महंगे कपड़ों के साथ फिल्मी संगीत पर खूब नाचते-गाते हैं. चाट-पकौड़ी और तरह–तरह के स्वादिष्ट भोजन और पेय का आनंद उठाते हैं. ऐसी एक शादी में लहंगा पहन कर छह सौ महिलाएं आयी थीं. लोगों को चकित करने के लिए अनेक प्रकार की घटनाएं आयोजित की जाती हैं. जैसे कि ऐसी एक शादी में पुलिस ने रेड की थी और सारे अतिथि घबरा गये थे, लेकिन वे पुलिस वाले नकली थे. अमेरिका के एक अखबार में भी एक बार ऐसी खबर छपी थी कि वहां दक्षिण एशियाई देशों के रहने वाले छात्र-छात्राएं विवाह की थीम को आधुनिक पार्टियों के जरिये सेलिब्रेट कर रहे हैं.

इन शादियों में जाने के लिए लोग बाकायदा हवाई यात्राएं कर रहे हैं, महंगी साड़ियां और जेवर खरीद रहे हैं. और तो और, ऐसे गोलगप्पों का भी आनंद लिया जाता है, जिनमें शराब भरी होती है. नयी पीढ़ी का मानना है कि इसमें कुछ बुरा भी नहीं है. जिन युवाओं के पास आनंद मनाने का कोई मौका नहीं बचा है, उन्हें अगर इनमें आनंद मिल रहा है, तो ऐसा क्यों नहीं किया जाना चाहिए? कहते हैं कि पहले कनाडा में ऐसी नकली शादियां शुरू हुईं. कनाडा से ही भारत में इस तरह की नकली शादियों की शुरुआत हुई.


युवाओं को ऐसी शादियां अच्छी लगती हैं, क्योंकि इनमें वे रिश्तेदार नहीं आते, जो असली शादियों में किसी आफत की तरह होते हैं और हर बात पर नुक्ताचीनी करते हैं. ऐसी शादियों के आयोजक मानते हैं कि यह व्यापार और पैसा कमाने का बेहतरीन अवसर है. ऐसी शादियां जितनी होंगी, व्यापार उतना ही बढ़ेगा. इन शादियों में आने वाले और इनके आयोजक और व्यापार के अवसरों की बात करने वाले अक्सर जेनरेशन जी के लोग हैं, जिन्हें हर वक्त कुछ नया चाहिए. जाहिर है कि वही लोग ऐसी शादियों का आनंद उठा सकते हैं, जिनकी जेब में भरपूर पैसे हों.


आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में जब हजारों लोग बिना कोई कारण बताये नौकरी से निकाले जा रहे हैं, तब यह चिंता होती है कि आखिर जेन जी इस बारे में अभी तक क्यों नहीं सोच रही. जिन नौकरियों के जरिये वे पैसे कमा रहे हैं, बचाने की जगह उसे खूब खर्च कर रहे हैं, इसके बारे में आर्थिक विशेषज्ञ लगातार चेता रहे हैं. वे कह रहे हैं कि यह पीढ़ी भविष्य की चिंता नहीं करती. हर वक्त किसी नये के पीछे भागती है. अच्छी भली गाड़ी होते हुए भी नयी चाहिए, क्योंकि इंस्टाग्राम पर फोटो लगानी है, रील बनानी है. यही हाल तमाम महंगे उत्पादों का है. विशेषज्ञ कह रहे हैं कि जब तक नौकरी बची हुई है, पैसे बचाइए. भविष्य सुरक्षित कीजियए. दिखावे में कुछ नहीं रखा है. भूल जाइए कि अब नौकरी पर साल साठ वर्ष तक रहेंगे. पैंतालीस की उम्र नया साठ है, लेकिन यह भी तो सच है कि अक्सर दूसरों की दी सलाह तभी समझ में आती है, जब वाकई कोई मुसीबत आ जाती है.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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