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Home Opinion गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार मानवीय पुकार है

गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार मानवीय पुकार है

गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार मानवीय पुकार है
हरीश राणा

Euthanasia : लगभग 12 वर्ष असीम और अव्यक्त पीड़ा के साथ जीवन जी रहे हरीश राणा अंततः गरिमापूर्ण और नैसर्गिक प्रक्रिया से 24 मार्च को इस असार संसार से विदा हो गये. यह हो पाया सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश के कारण, जिस बात का प्रावधान संविधान में नहीं है. गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन में रहने वाले बिस्तर पर पड़े बेबस हरीश राणा को हाल ही में देश की सर्वोच्च अदालत ने ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ (पैसिव यूथेनेसिया) की अनुमति देकर न केवल एक व्यक्ति की पीड़ा का अंत किया है, बल्कि चिकित्सा और कानून के इतिहास में एक नयी नजीर भी पेश की है. जीवन का अधिकार प्रकृति का सबसे अनमोल उपहार है, पर जब वही जीवन मशीनों के शोर और अंतहीन शारीरिक पीड़ा के बीच घुटने लगे, तो गरिमापूर्ण मृत्यु की मांग एक मानवीय पुकार बन जाती है.


सर्वोच्च न्यायालय के इस ऐतिहासिक आदेश के बाद अब अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु’ के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का प्रोटोकॉल तैयार कर रहा है. यह पहल आने वाले समय में उन अनेक परिवारों के लिए उम्मीद की किरण बनेगी जो अपने प्रियजनों को ‘परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट’, यानी ऐसी स्थिति में देख रहे हैं, जहां जीवन की संभावना शून्य है, पर मशीनों के सहारे सांसें चल रही हैं. भविष्य की चिकित्सा व्यवस्था में इस आदेश का गहरा प्रभाव पड़ने वाला है. जिस तरह वर्तमान में बड़े अस्पतालों में अंगदान के लिए विशेष समितियां गठित होती हैं, उसी तर्ज पर अब ‘निष्क्रिय इच्छा मृत्यु समिति’ बनाना अनिवार्य हो सकता है.

यह समिति केवल प्रशासनिक ढांचा भर नहीं होगी, बल्कि इसमें चिकित्सा विशेषज्ञों के साथ-साथ कानूनी और मानवीय पक्षों के जानकार भी शामिल होंगे. यह समिति पूरी पारदर्शिता के साथ यह तय करेगी कि यदि मरीज का बच पाना वैज्ञानिक रूप से संभव नहीं है, तो कब और किस तरह परिवार की सहमति से ‘सक्रिय इलाज’ को रोका जाये. अब तक ऐसी स्थितियों में डॉक्टर और परिजन कानूनी पेचीदगियों के डर से अनिर्णय की स्थिति में रहते थे, लेकिन एम्स द्वारा तैयार किया जा रहा प्रोटोकॉल इस प्रक्रिया को एक स्पष्ट दिशा देगा. इसे जल्द ही न्यायालय को भी सौंपा जायेगा, ताकि पूरे देश में एक समान मानक लागू हो सके.
चिकित्सा विज्ञान के आंकड़े भी इस संबंध में कठोर सत्य बयान करते हैं.

एम्स ट्रॉमा सेंटर द्वारा पंद्रह सौ से अधिक हादसा पीड़ितों पर किये गये एक अध्ययन के अनुसार, मस्तिष्क की गंभीर चोट वाले मरीजों में से केवल ग्यारह प्रतिशत ही इलाज के बाद कोमा से बाहर आ पाते हैं. शेष मरीजों के लिए वेंटिलेटर या कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरण केवल उनके शरीर के अंगों को सक्रिय रखते हैं, जबकि चेतना पूरी तरह लुप्त हो चुकी होती है. ऐसे में निष्क्रिय इच्छा मृत्यु का उद्देश्य जीवन को छीनना नहीं, बल्कि उस पीड़ा को समाप्त करना है, जिसका कोई अंत नजर नहीं आता. प्रोटोकॉल में स्पष्ट किया जायेगा कि किन परिस्थितियों में वेंटिलेटर, कृत्रिम पोषण और आइवी फ्लूइड जैसे उपकरणों को चरणबद्ध तरीके से हटाया जा सकता है. यहां यह समझना आवश्यक है कि ‘सक्रिय’ और ‘निष्क्रिय’ इच्छा मृत्यु के बीच एक बहुत पतली, लेकिन महत्वपूर्ण रेखा है.

सक्रिय इच्छा मृत्यु, जिसमें इंजेक्शन या घातक दवा देकर जान ली जाती है, भारत में पूरी तरह अवैध है. इसके विपरीत, निष्क्रिय इच्छा मृत्यु में केवल उन कृत्रिम साधनों को हटाया जाता है, जो प्राकृतिक मृत्यु को रोक रहे होते हैं. सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही इसे कड़ी शर्तों के साथ वैध माना था, लेकिन अब हरीश राणा मामले के बाद इसे धरातल पर उतारने की प्रक्रिया तेज हुई है. नये नियम के तहत मरीज को अंतिम सांस तक ‘सपोर्टिव केयर’ या ‘पैलिएटिव केयर’ मिलती रहेगी. इसका अर्थ है कि वेंटिलेटर हटाने के बाद भी मरीज को दर्द से राहत देने वाली दवाएं और बुनियादी देखभाल मिलती रहेगी, ताकि उसकी विदाई कष्टकारी न हो.


इस पूरे विमर्श का एक महत्वपूर्ण पहलू आर्थिक और सामाजिक भी है. कोमा या वेंटिलेटर पर लंबे समय तक रहने वाले मरीजों के कारण न केवल अस्पताल के संसाधनों पर दबाव पड़ता है, बल्कि गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट जाते हैं. कैंसर के एडवांस स्टेज वाले मरीजों के लिए भी यह प्रोटोकॉल एक वरदान साबित होगा. ऐसे समय में चिकित्सा विज्ञान का लक्ष्य मरीज को ठीक करना नहीं, बल्कि उसके जीवन के आखिरी पड़ाव को सम्मानजनक बनाना होना चाहिए. आने वाले समय में जब अस्पताल इन समितियों के माध्यम से निर्णय लेंगे, तो उसमें मरीज की मानसिक, आर्थिक और सामाजिक जरूरतों का समय-समय पर मूल्यांकन किया जायेगा.

यह समाज के लिए एक संवेदनशील मोड़ है. हमें यह स्वीकार करना होगा कि चिकित्सा विज्ञान की सीमाएं हैं और मृत्यु जीवन का एक अनिवार्य सत्य है. जब विज्ञान हार जाये, तब संवेदनाओं को रास्ता देना ही मानवता है. एम्स की यह पहल और कोर्ट का यह आदेश भविष्य में एक ऐसी व्यवस्था का निर्माण करेगा जहां तकनीक का उपयोग केवल जीवन को खींचने के लिए नहीं, बल्कि विदाई को गरिमापूर्ण बनाने के लिए भी किया जा सकेगा. यह कदम देश में स्वास्थ्य सेवाओं के मानवीयकरण की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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