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महामारी व मजदूरों की बदहाली

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महामारी व मजदूरों की बदहाली

डॉ अनुज लुगुन

सहायक प्रोफेसर, दक्षिण केंद्रीय विश्वविद्यालय, गया

anujlugun@cub.ac.in

मशहूर कवि गोरख पांडेय की एक कविता है- स्वर्ग से विदाई. यह कविता असंगठित मजदूरों की उस दुनिया की कविता है, जिसमें वे किसी एक अनजान जगह से उठकर आते हैं, शहर के किसी कोने में झोपड़ी डालते हैं और अपने हुनर एवं खून-पसीने से आलीशान इमारतों, बाग, ताल आदि खूबसूरत चीजों को बना देते हैं. फिर एक दिन जब सब कुछ तैयार हो जाता है और उनके मेहनत की जरूरत नहीं रह जाती है, तब वे फिर से किसी अंधेरे-अनजान दिशा में धकेल दिये जाते हैं.

गरीबी और लाचारी उन्हें पृथ्वी के एक कोने से दूसरे कोने में धकेलते रहती है. वे गठरी टांगे हुए अपने स्थायित्व की तलाश में भटकते रहते हैं. जब स्थिति सामान्य रहती है, तब समाज के सबसे निचली तह में इनकी जिंदगी गलते-घुलते रहती है. दुनिया को लगता है कि सब कुछ साफ और सुंदर है. लेकिन, जैसे ही स्थितियां प्रतिकूल होती हैं, सबसे निचली तह में दबे हुए अदृश्य लोग अचानक दिखने लगते हैं. प्राकृतिक आपदा-विपदा, युद्ध आदि स्थितियों में उनकी बदहाली समाज की ऊपरी सतह पर तैरने लगती है.

आज दुनिया को कोरोना नामक महामारी ने अपनी चपेट में ले लिया है. दुनियाभर में लाखों लोग संक्रमित हैं, हजारों लोग मारे जा चुके हैं और इसने दुनिया की अर्थव्यवस्था की जड़ों को हिला कर रख दिया है. इसका सबसे बुरा असर गरीबों और मजदूरों पर पड़ा है. कोरोना के हमले ने स्वास्थ्य चिंताओं के साथ हमारी सामाजिक-आर्थिक अव्यवस्था को भी उजागर कर दिया है.

महानगरों से अपने गांवों-कस्बों की ओर पैदल लौटते मजदूरों का जत्था भयावह संकट को दिखा रहा है. सिर पर गठरी उठाये, बाजू में मासूम बच्चों को समेटे, भूखे-प्यासे पैदल चल रहे लोगों का झुंड दिल दहला देनेवाला है. लॉकडाउन की वजह से यातायात सेवाएं पूर्ण रूप से बंद कर दी गयी हैं. बसों के चलने की छोटी सी सूचना पर केवल दिल्ली के आनंद विहार बस टर्मिनल पर दस हजार से भी ज्यादा मजदूर जमा हो गये.

आपदाएं या युद्ध मनुष्य द्वारा निर्मित व्यवस्थाओं को तहस-नहस कर देती हैं. मानव सभ्यता इस तरह की आपदाओं से संघर्ष करते हुए निर्मित हुई है. इस तरह की विपत्तियों का सामना करने के लिए ही सुदृढ़ व्यवस्था का निर्माण किया जाता है. आज जब हम हजारों की संख्या में बच्चों सहित लौटते मजदूरों को देख रहे हैं, तो यह सिर्फ महामारी के परिणामस्वरूप नहीं है, बल्कि हमारी सामाजिक-आर्थिक अव्यवस्था का भी परिणाम है. इन मजदूरों की सामाजिक स्थिति क्या है? क्या सामाजिक सुरक्षा के होते हुए इन्हें इन भीषण परिस्थितियों का सामना करना पड़ता? क्या इन्हें ढाई-तीन साल के बच्चों के साथ पैदल सैकड़ों किलोमीटर चलने की जरूरत पड़ती?

निस्संदेह हमारी सरकारों ने महामारी से बचाव और उसके प्रभाव से निपटने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां की हैं, लेकिन, मूलभूत सवाल है- नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा. गरीबों मजदूरों और कामगारों की बुनियादी समस्याओं के समाधान का सवाल. मजदूरों का महानगरों से पलायन, इस बात का उदाहरण है कि आजादी के इतने वर्षों बाद भी समाज के एक वर्ग की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है. उसके लिए न घर है, न भोजन है, न पैसा है और न ही अपने परिवार की सुरक्षा के लिए न्यूनतम व्यवस्था है. हर दिन यह अनिश्चितता में रहनेवाली जनता है.

यह मूलतः असंगठित क्षेत्र का मजदूर है, जो दिहाड़ी कमाता है, जो कारखानों में ठेके पर काम करता है, दूसरों के घरों में जाकर जो पोछा-बरतन का काम करता है. यह हजारों किलोमीटर दूर किसी अनजान शहर के सड़कों, फुटपाथों पर ठेले-खोमचे लगानेवाला वर्ग है. यही वर्ग रेल के जनरल डिब्बो में भेड़-बकरियों की तरह लद कर झुंड के झुंड हजारों किलोमीटर की यात्राएं करता है, जिसे हम आम दिनों में अपने सुविधा संपन्न एसी कोच में यात्रा करते हुए न कभी देख पाते हैं और न ही उनकी पीड़ा को महसूस कर पाते हैं.

आज जब लॉकडाउन की वजह से यातायात सेवाएं बंद हैं, तो यह वर्ग सड़कों पर पैदल चलता हुआ दिख रहा है. यह ट्रेड यूनियनों की संगठित सीमित राजनीतिक मांगों से बाहर रहनेवाला वर्ग है. यह वर्ग न केवल सुविधा संपन्न लोगों के लिए अपना पसीना बहाता है, यह अर्थव्यवस्था का बहुत मजबूत स्तंभ भी है. जब यह वर्ग निर्माण कार्य में लगा रहता है, तभी बहुत कम समय के लिए स्थायित्व में रहता है. कवि गोरख पांडेय के लिए यही उसका स्वर्ग है. वह उसका निर्माता है. राष्ट्रीय परिधि से बाहर इनका विस्तार अंतरराष्ट्रीय परिधि तक है. आज महामारी की वजह से श्रमिक वर्ग लगभग दुनिया के हर कोने में फंसा हुआ है.

सामाजिक सुरक्षा के अभाव का बड़ा कारण असमान आधारभूत संरचना का विकास है. समाजशास्त्रीय विचार से यह पूंजीवादी व्यवस्था का परिणाम है. यह बहुत बड़े पैमाने पर सस्ते श्रमिकों को पैदा करता है और उन्हें किसी एक ही केंद्र में धकेल देता है. यह केंद्र शहरों और महानगरों में बनता है, जहां दूर-दराज की जनता आजीविका की तलाश में पहुंचती है.

इसके साथ ही पूंजीवाद सामाजिक सुरक्षा को राज्य के हाथों से छीनकर बाजार को सौंप देता है. इस राष्ट्रीय आपदा में सरकार ने श्रमिकों के वेतन में कटौती न करने और छंटनी न करने का आदेश दिया है, लेकिन बहुत बड़ी आबादी है, जो इस दायरे से बाहर है. उसके लिए मुफ्त में राशन देने की व्यवस्था हो रही है, यह स्वागत योग्य कदम है. लेकिन क्या यह स्थायी व्यवस्था है? यह समाज के आधारभूत संरचना से जुड़ा हुआ सवाल है, जो किसी भी विपत्ति के समय फिर से आ सकता है. दुर्भाग्य यह है कि राजनीतिक अवसरवादिता ने इस दिशा में कभी गंभीरता से चिंतन ही नहीं किया है.

फिलहाल, इस वैश्विक महामारी से मिलकर लड़ने की जरूरत है. इसके लिए केवल सरकारी तंत्र के भरोसे बैठे रहना सामाजिक व्यवहार नहीं है. हम जहां हैं, जिस रूप में हैं, वहीं से अपनी सामाजिक जिम्मेदारी निभा सकते हैं. गरीबों वंचितों के साथ खड़े हो सकते हैं, लेकिन इसके साथ ही नागरिकों की सामाजिक सुरक्षा का सवाल भी बना रहे, ताकि भविष्य में कोई भी आपदा हमारी मनुष्यता को तहस-नहस न कर सके.

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