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Home Opinion हेट स्पीच के मौजूदा कानूनों पर अमल हो

हेट स्पीच के मौजूदा कानूनों पर अमल हो

हेट स्पीच के मौजूदा कानूनों पर अमल हो
सुप्रीम कोर्ट

Hate Speech Laws : चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के चुनावों में बंपर मतदान से लोकतंत्र में मतदाता, यानी गणदेवता फिर सर्वोपरि साबित हुए हैं. लेकिन वोट हासिल करने और ध्रुवीकरण के लिए जातिवाद, क्षेत्रवाद या सांप्रदायिक आधार पर सोशल मीडिया में भड़काऊ और नफरती भाषणों का प्रसार संवैधानिक विधि के खिलाफ है. इस बारे में सर्वोच्च न्यायालय का नया फैसला बहुत ही दिलचस्प है, जिसके अनुसार हेट स्पीच को आपराधिक कानून में परिभाषित ही नहीं किया गया है. वर्ष 2018 में तहसील पूनावाला मामले में नफरती भाषणों से भीड़ की हिंसा को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को दिशानिर्देश दिये थे.

उसके बाद 2023 में आजम खान मामले में संविधान पीठ ने मंत्रियों के नफरती भाषण की जवाबदेही तय करने की बात कही थी. सर्वोच्च न्यायालय के नये फैसले में अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग वाली याचिकाओं को निरस्त कर दिया है. न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ के अनुसार, उन नेताओं के बयानों से सांप्रदायिक हिंसा या अशांति फैलने के सबूत नहीं मिले हैं. उसके साथ हेट स्पीच के खिलाफ दिशानिर्देशों की मांग वाली याचिका को भी निरस्त करते हुए जजों ने कहा कि नये कानून की बजाय मौजूदा कानूनों को सही तरीके से लागू करने की जरूरत है.


इस फैसले की तीन बड़ी बातें हैं. पहला, विधि आयोग ने आपराधिक कानून संशोधन बिल, 2017 के माध्यम से हेट स्पीच को परिभाषित करने और सख्त दंड के लिए 153-सी और 505-ए की दो नयी धाराएं जोड़ने की अनुशंसा की थी. जजों के अनुसार, आइपीसी या बीएनएस और सीआरपीसी या बीएनएसएस में बदलाव के लिए संसद को ही अधिकार हासिल है. अदालत कानून की व्याख्या कर सकती है, पर वह सरकार को नया कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती. दूसरा, यदि पुलिस मुकदमा दर्ज न करे, तो ललिता कुमारी फैसले और सीआरपीसी कानून के अनुसार मजिस्ट्रेट के पास अर्जी लगायी जा सकती है. तीसरा, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय जैसी संवैधानिक अदालतें अनुच्छेद 32 या 226 के तहत कानून व्यवस्था से जुड़े मामलों का माइक्रो मैनेजमेंट नहीं कर सकती हैं.

यूरोपियन यूनियन ऑफ ह्यूमन राइट्स के आर्टिकल 10 और हैंडीसाइड बनाम यूनाइटेड किंगडम मामले में हेट स्पीच के निर्धारण के लिए तीन टेस्ट दिये गये हैं. उसके अनुसार, भारत में हेट स्पीच से जुड़ी संवैधानिक दुविधाओं के छह पहलुओं को समझा जा सकता है. पहला, संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (ए) में अभिव्यक्ति की आजादी का मौलिक अधिकार है, लेकिन अनुच्छेद 19 (2) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, नैतिकता आदि की सीमाएं और अपवाद हैं. धर्म, जाति, वर्ण, जन्म स्थान आदि के आधार पर कट्टरता या सांप्रदायिकता फैलाने वाले नफरती भाषणों को अभिव्यक्ति की आजादी के तहत संवैधानिक संरक्षण नहीं मिल सकता.

वर्ष 1950 में सर्वोच्च न्यायालय ने ब्रज भूषण मामले के फैसले में पब्लिक ऑर्डर को सार्वजनिक और देश की सुरक्षा से जोड़ा था. पर 1966 में राम मनोहर लोहिया मामले में नेताओं की अभिव्यक्ति की आजादी को उदार तरीके से संरक्षित करने का फैसला आया. दूसरा, पुलिस, अधिकारी, विधायक, सांसद, मंत्री और जज कानून के शासन से बंधे हैं. पुलिस और कानून व्यवस्था राज्यों का विषय है. पंजाब में आप के सांसदों के दल बदलने के साथ ही उनके खिलाफ पुलिस ने मामले और छापेमारी शुरू कर दी. ऐसा हाल पक्ष-विपक्ष शासित सभी राज्यों में है.


वोटों के ध्रुवीकरण और चुनावी लाभ के लिए नेता उन्मादी और नफरती भाषण देते हैं. सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों के खिलाफ पुलिस समुचित कार्रवाई नहीं करती. जबकि राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ राजद्रोह जैसी संगीन धाराओं में एफआइआर दर्ज होने के साथ गिरफ्तारी होने से सरकारी खर्चों पर अदालतों में बेवजह की मुकदमेबाजी बढ़ती है. तीसरा, नफरती भाषणों का प्रसार व्हाट्सएप और सोशल मीडिया से होता है. पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में आइटी एक्ट का विश्लेषण ही नहीं हुआ है.

वर्ष 2015 में श्रेया सिंघल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आइटी एक्ट की धारा 66 ए को रद्द कर दिया था. उसके बाद संसद से नया कानून न बनने से अराजकता बढ़ रही है. सोशल मीडिया से नफरत फैलाने के मामलों में खुली छूट या सख्त धाराओं में मुकदमा दर्ज करने का फैसला थानों की बजाय सियासी आधार पर होने के बढ़ते ट्रेंड से हेट स्पीच का मर्ज तेजी से बढ़ रहा है. चौथा, चुनावों को सही तरीके से संचालित करने के लिए अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को अनेक अधिकार हैं. पर नफरती भाषण देने वाले नेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई और पार्टियों की मान्यता रद्द करने के लिए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत चुनाव आयोग को समुचित अधिकार नहीं हैं. इन विसंगतियों का फायदा उठाकर नेता लोग नफरती भाषण को सोशल मीडिया व आइटी सेल से फैलाकर चुनावी फसल काटने में पारंगत हो गये हैं.


पांचवां, सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसले तीन या पांच जजों की संविधान पीठ के हैं. उसके बावजूद नेताओं के नफरती भाषणों के खिलाफ राज्यों की पुलिस ठोस कार्रवाई नहीं करती. दो जजों की पीठ के नये फैसले को अनुपालन के लिए सभी उच्च न्यायालयों में भेजा गया है. इस फैसले की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में कानूनों और विधि आयोग की रिपोर्ट का विश्लेषण है. लेकिन संविधान की प्रस्तावना की समानता और भाईचारे के आदर्श को सफल बनाने के लिए फैसले में ठोस आदेश पारित नहीं हुए. इसलिए सर्वोच्च न्यायालय के नये फैसले से जमीनी स्तर पर बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं है.

छठा, फैसले में संविधान सभा में डॉ आंबेडकर के भाषण को उद्धृत करते हुए कहा गया है कि संविधान की सफलता भावी सरकारों की मंशा और आचरण से निर्धारित होगी. न्यायमूर्ति संजय करोल और आगस्टीन जार्ज मसीह की पीठ के नवीनतम फैसले के अनुसार, पुलिस यदि एफआइआर दर्ज न करे, तो सीधे हाई कोर्ट जाने की बजाय पुरानी सीआरपीसी या बीएनएसएस, 2023 के तहत वैकल्पिक कानूनी रास्तों का पालन अनिवार्य है. लेकिन पुलिस और जिला अदालतें कानून के अनुसार जिम्मेदारी पूरी करने में विफल रहे, जबकि लोगों का बेवजह उत्पीड़न हो, तो दोषियों को दंड मिलना चाहिए. कानून के शासन को विफल बनाने और सिस्टम को ध्वस्त करने वाले दोषियों को उच्च या सर्वोच्च न्यायालय से दंड नहीं मिलता. इस वजह से नफरती भाषणों के साथ अराजकता के मर्ज का तेजी से बढ़ते जाना गण, गणतंत्र और गणदेवता सभी के लिए खतरनाक है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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