[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion 125वीं जयंती पर विशेष : बंगाल की चेतना से राष्ट्रीय एकता के शिखर तक, पढ़ें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर खास लेख

125वीं जयंती पर विशेष : बंगाल की चेतना से राष्ट्रीय एकता के शिखर तक, पढ़ें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर खास लेख

0
125वीं जयंती पर विशेष : बंगाल की चेतना से राष्ट्रीय एकता के शिखर तक, पढ़ें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर खास लेख
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की तस्वीर, देवेश कुमार (ऊपर) डॉ निखिल आनंद (नीचे)

(लेखक: देवेश कुमार एवं डॉ निखिल आनंद) कोलकाता में 6 जुलाई 1901 को जन्मे डॉ मुखर्जी असाधारण प्रतिभा के धनी थे. उनके पिता सर आशुतोष मुखर्जी भारतीय शिक्षा-जगत के प्रतिष्ठित नामों में गिने जाते हैं. इसी बौद्धिक वातावरण ने उन्हें ज्ञान, अनुशासन और सार्वजनिक जीवन के प्रति उत्तरदायित्व का संस्कार दिया. मात्र 33 वर्ष की आयु में कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति बनना उनकी अद्वितीय शैक्षणिक क्षमता का प्रमाण था. उनके नेतृत्व में विश्वविद्यालय ने भारतीय भाषाओं, शोध और उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए. यह तथ्य उल्लेखनीय है कि राजनीति में सक्रिय होने से पहले ही वे राष्ट्रीय स्तर पर एक सम्मानित शिक्षाविद् के रूप में स्थापित हो चुके थे.

हालांकि इतिहास ने उनके लिए एक व्यापक भूमिका निर्धारित कर रखी थी. 1940 के दशक में जब देश विभाजन की ओर बढ़ रहा था, तब बंगाल का प्रश्न अत्यंत जटिल और संवेदनशील बन चुका था. मुस्लिम लीग की राजनीति और विभाजन की मांग के बीच यह आशंका वास्तविक थी कि संपूर्ण बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन सकता है. ऐसे समय में डॉ मुखर्जी ने बंगाल के उन क्षेत्रों को भारत में बनाये रखने के लिए निर्णायक राजनीतिक संघर्ष किया जो आज पश्चिम बंगाल के रूप में हमारे सामने हैं. इतिहासकारों के बीच इस बात पर मतभेद हो सकते हैं कि विभिन्न राजनीतिक शक्तियों की भूमिका कितनी थी, किंतु यह निर्विवाद है कि बंगाल के विभाजन और पश्चिम बंगाल के भारत में बने रहने के प्रश्न पर डॉ मुखर्जी ने अत्यंत प्रभावशाली भूमिका निभायी.

स्वतंत्र भारत के निर्माण में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा. वे देश की पहली केंद्रीय मंत्रिपरिषद में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने. औद्योगिक विकास और आर्थिक आत्मनिर्भरता के संबंध में उनके विचार दूरदर्शी थे. किंतु जब उन्हें लगा कि कुछ राष्ट्रीय प्रश्नों पर सरकार की नीतियों से उनका मूलभूत मतभेद है, तब उन्होंने पद की अपेक्षा सिद्धांतों को महत्व दिया और मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया. लोकतांत्रिक राजनीति में यह एक महत्वपूर्ण उदाहरण है कि सार्वजनिक जीवन में वैचारिक प्रतिबद्धता सत्ता से अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है.

इसी वैचारिक आग्रह ने उन्हें 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की ओर अग्रसर किया. जनसंघ केवल एक राजनीतिक दल नहीं था; वह भारत की सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उस धारा का राजनीतिक अभिव्यक्ति था जो राष्ट्रीय एकता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सांस्कृतिक आत्मविश्वास को समान महत्व देती थी. बाद के दशकों में यही वैचारिक परंपरा भारतीय जनता पार्टी के रूप में विकसित हुई. इसलिए भारतीय राजनीति में भाजपा के उदय और विस्तार को समझने के लिए डॉ. मुखर्जी के योगदान को समझना अनिवार्य है.

विशेष रूप से पश्चिम बंगाल की राजनीति में यह तथ्य और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है. लंबे समय तक कांग्रेस, वामपंथ और बाद में तृणमूल कांग्रेस के प्रभुत्व वाले राजनीतिक परिदृश्य में डॉ मुखर्जी की विरासत अपेक्षित रूप से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा नहीं बन सकी. किंतु पिछले एक दशक में बंगाल की राजनीति में आये परिवर्तन ने उनके विचारों को पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है. भाजपा की चुनावी सफलताओं ने यह संकेत दिया है कि बंगाल की राजनीति में अब राष्ट्रीय पहचान, सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक स्मृतियों से जुड़े प्रश्न भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर रहे हैं. इस परिवर्तन के वैचारिक स्रोतों को खोजा जाए तो उनमें डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीति और चिंतन का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है.

उनके जीवन का सबसे चर्चित अध्याय जम्मू-कश्मीर से जुड़ा हुआ है. स्वतंत्रता के बाद लागू विशेष संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर को अलग संविधान और अलग ध्वज प्राप्त था. डॉ मुखर्जी ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे.” यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय एकीकरण की उनकी अवधारणा का सार था. उनका मानना था कि भारत की विविधता का सम्मान करते हुए भी राष्ट्रीय संप्रभुता और संवैधानिक एकता सर्वोपरि रहनी चाहिए.

1953 में जम्मू-कश्मीर में प्रवेश के उपरांत उनकी गिरफ्तारी और बाद में हिरासत के दौरान 23 जून 1953 को उनकी संदेहास्पद स्थिति में मृत्यु ने उन्हें राष्ट्रीय एकता के लिए संघर्ष करने वाले प्रतीक पुरुष के रूप में स्थापित कर दिया. आने वाले दशकों में उनका यह प्रश्न भारतीय राजनीति में जीवित रहा. वर्ष 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार और गृह मंत्री अमित शाह की पहल पर अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधानों को समाप्त किया गया. अनेक पर्यवेक्षकों ने इसे डॉ मुखर्जी के उस स्वप्न की आंशिक पूर्ति माना, जिसके लिए उन्होंने निरंतर संघर्ष किया था. इसके बाद कश्मीर में राष्ट्रीय ध्वज की निर्बाध प्रतिष्ठा और श्री मोदी द्वारा लाल चौक पर तिरंगे को नमन करने जैसे प्रतीकात्मक क्षणों ने उस ऐतिहासिक विमर्श को पुनः जीवंत कर दिया, जिसके केंद्र में भारत की अखंडता और एक संविधान, एक ध्वज तथा एक राष्ट्रीय पहचान का विचार था.

हालांकि डॉ मुखर्जी की विरासत को केवल अनुच्छेद 370 के संदर्भ में सीमित कर देना उचित नहीं होगा. वे मूलतः एक ऐसे भारत की कल्पना करते थे जो आत्मविश्वासी हो, अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ा हो, शिक्षा और उद्योग में अग्रणी हो तथा राष्ट्रीय एकता के प्रश्न पर किसी प्रकार का समझौता न करे. उनका चिंतन राजनीतिक सीमाओं से परे जाकर राष्ट्र-निर्माण की व्यापक अवधारणा प्रस्तुत करता है. आज जब भारत वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है, तब उनके विचारों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है.

यह भी विचारणीय है कि बंगाल जैसे राज्य, जिसने भारत को अनेक महान विचारक, समाज-सुधारक और राष्ट्रवादी नेता दिए, वहां डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान पर अपेक्षित स्तर पर विमर्श अपेक्षाकृत सीमित रहा. हाल के वर्षों में इस स्थिति में परिवर्तन दिखाई दे रहा है. नयी पीढ़ी उनके जीवन को केवल एक राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि बंगाल और भारत के बीच एक वैचारिक सेतु के रूप में देखने लगी है.

डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि इतिहास केवल सत्ता से नहीं बनता, बल्कि विचारों, सिद्धांतों और साहसिक निर्णयों से भी निर्मित होता है. उन्होंने शिक्षा में उत्कृष्टता, राजनीति में सिद्धांतनिष्ठा और राष्ट्रजीवन में एकता को अपना मार्गदर्शक बनाया. आज, जब हम उनकी जयंती और पुण्यतिथि का स्मरण करते हैं, तब यह स्वीकार करना होगा कि वे केवल एक दल या विचारधारा के नेता नहीं, बल्कि आधुनिक भारत की राष्ट्रीय चेतना के महत्वपूर्ण शिल्पियों में से एक थे. उनकी विरासत भारतीय लोकतंत्र को यह संदेश देती है कि राष्ट्र की एकता, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता—इन तीनों का संतुलन ही भारत की वास्तविक शक्ति है.

(लेखक परिचय- श्री देवेश कुमार बिहार विधान परिषद् के सदस्य एवं मिजोरम भाजपा के प्रभारी हैं. डॉ निखिल आनंद भाजपा ओबीसी मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री हैं. दोनों ही पूर्व में पत्रकार रह चुके हैं.)

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel