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दहेज उत्पीड़न मामला और सुप्रीम कोर्ट का फैसला

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दहेज उत्पीड़न मामला और सुप्रीम कोर्ट का फैसला
दहेज उत्पीड़न कानून के दुरुपयोग पर रोक

Dowry Harassment Case : विवाहित महिलाओं के साथ ससुराल में क्रूरता के मामलों में गिरफ्तारी के दुरुपयोग को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट का नया फैसला लागू हो, तो लाखों परिवारों को मुकदमेबाजी के क्लेश से राहत मिल सकती है. देश की 18 हजार से ज्यादा अदालतों में 4.45 करोड़ मुकदमों में 75 फीसदी से ज्यादा, 3.34 करोड़, आपराधिक मुकदमे हैं. वर्ष 1983 में आइपीसी में धारा-498-ए जोड़ी गयी थी, जिसका मुख्य उदेश्य पत्नी को क्रूरता, दहेज उत्पीड़न और घरेलू हिंसा से बचाना था. पर पुलिस की निरंकुशता और अदालतों के रूटीन आदेशों की वजह से दहेज और महिला उत्पीड़न के बढ़ते मामले समाज में बेचैनी और तनाव बढ़ा रहे हैं. पिछले तीन दशकों में हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों के बावजूद इस कानून का बढ़ता दुरुपयोग गंभीर सवाल खड़े करता है.


संविधान में जीवन की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों का सर्वाधिक महत्व है, जिसके अनुसार गलत तरीके से गिरफ्तारी असंवैधानिक है. सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति वेंकेटचलैया की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में गिरफ्तारी के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त फैसला दिया था. उसके अनुसार अपराधियों को पकड़ने के लिए गिरफ्तारी का कानूनी अधिकार हासिल है. पर हर मामले में रूटीन गिरफ्तारी गैरकानूनी है. वर्ष 2008 में चंदर भान मामले में 498-ए कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के अनुसार दिल्ली पुलिस ने अपने अधिकारियों के लिए सख्त दिशानिर्देश जारी किये थे.


पिछले महीने जून में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 के तहत विशिष्ट शक्तियों का इस्तेमाल कर 23 वर्ष पुराने मामले को रद्द कर दिया था. उस मामले में पीड़ित महिला पुलिस अधिकारी थी, जिस पर पुलिस की शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप लगे थे. उसके बाद नये फैसले में प्रधान न्यायाधीश की दो जजों की बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जून, 2022 के दिशानिर्देशों को लागू करने का आदेश दिया है. इसके अनुसार 498-ए के मामलों में एफआइआर के दो महीने तक गिरफ्तारी नहीं होगी. इस दौरान जिला परिवार कल्याण समिति में मध्यस्थता के माध्यम से मामले के समाधान का प्रयास होगा. इनमें युवा वकील, विधि छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता, रिटायर जज और महिला सदस्य होंगे.


इस मामले में पत्नी ने, जो कि आइपीएस अधिकारी हैं, 15 से ज्यादा शिकायतें और मुकदमे दर्ज कराये थे, जिस कारण पति और ससुर को 100 दिन से ज्यादा जेल में रहना पड़ा. उसके जवाब में पति और तीसरे पक्ष की ओर से 13 से ज्यादा मुकदमे दर्ज कराये गये. अनुच्छेद-142 की विशिष्ट शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए जजों ने देश में चल रहे सभी मुकदमों को निरस्त कर दिया. कोर्ट ने पति पक्ष को पुलिस सुरक्षा देने, भविष्य में होने वाली मुकदमेबाजी पर रोक लगाने के साथ आइपीएस पत्नी को माफीनामा लिख कर देने का भी आदेश दिया. आर्थिक हैसियत वाले लोगों को बड़े वकीलों के दम पर सुप्रीम कोर्ट से राहत मिल जाती है. पर गरीबों के हिस्से में जेल और मध्यमवर्गीय परिवारों के हिस्से में लंबी मुकदमेबाजी का सिलसिला लगातार जारी है.

संविधान के अनुच्छेद-141 के तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले बाध्यकारी होने के बावजूद अधीनस्थ न्यायालयों में उनका पालन नहीं हो रहा. नये आपराधिक कानूनों में भी सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के अनुसार जरूरी प्रावधान न होने से तस्वीर बदलने की उम्मीद कम है. अनुच्छेद-143 के संदर्भ में संसद और सरकार के अधिकारों की बात हो रही है. पर महत्वपूर्ण मामलों में सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के अनुसार संसद से कानूनी बदलाव न होने से पुलिस में भ्रष्टाचार और जिला अदालतों में अराजकता बढ़ रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य के 2014 के फैसले में कहा था कि गिरफ्तारी के मामलों में पुलिस अधिकारियों को सीआरपीसी की धारा-41 के अनुसार एहतियात बरतने की जरूरत है. सुप्रीम कोर्ट में आदर्श गोयल की दो जजों की पीठ ने राजेश शर्मा बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में जुलाई, 2017 में अहम फैसला दिया था, जिसके अनुसार 498-ए से जुड़े अधिकांश मामले फर्जी होते हैं और सिर्फ 15.6 फीसदी मामलों में ही सजा हो पाती है.

उस फैसले के अनुसार नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी को मार्च, 2018 तक अपनी रिपोर्ट पेश करनी थी. पर आठ वर्ष बाद सुप्रीम कोर्ट के नये फैसले में उस पर कोई चर्चा नहीं है. पुलिस को मनमाने तौर पर एफआइआर दर्ज करने और गिरफ्तारी का अधिकार है. ट्रायल कोर्ट में भी रूटीन तरीके से लोगों को पुलिस और न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता है. पुराने निर्णयों की तरह यह नया निर्णय किताबों में गुम न हो जाये, इसके लिए सरकार, संसद और सुप्रीम कोर्ट, सभी को ठोस कदम उठाने की जरूरत है. गलत गिरफ्तारी के लिए पीड़ितों को हर्जाना मिले, जमानत की अर्जी और एफआइआर रद्द की मांग वाली याचिकाओं पर जल्द फैसला हो, जिला स्तर पर विधिक सहायता केंद्रों को प्रभावी तौर पर सक्रिय किया जाये, इन सब को सुनिश्चित करने के लिए संसद से कानून में बदलाव हों. उसके बाद ही गलत और फर्जी मुकदमों से पीड़ित लोगों को सही न्याय मिलेगा. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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