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क्रूर न हों शिक्षक

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क्रूर न हों शिक्षक

शिक्षा के महत्व से हम सभी अच्छी तरह से परिचित हैं. इसी कारण शिक्षकों को समाज में बड़े आदर के साथ देखा जाता है. हमारी संस्कृति में शिक्षक को देवतुल्य माना जाता है. लेकिन कुछ समय से शिक्षकों के क्रूर व्यवहार से संबंधित खबरें विचलित करती हैं. ऐसा देश के कई राज्यों में हो रहा है. कहीं शिक्षक छात्र को पीटकर अधमरा कर दे रहा है, कहीं छत से फेंक दे रहा है, कहीं कैंची और धारदार हथियार से हमले की घटनाएं भी हुई हैं.

कुछ मामलों में तो बच्चों की जान भी गयी है. हमारे कानूनी प्रावधान साफ निर्देश देते हैं कि शिक्षक किसी भी स्थिति में और किसी भी तरह से छात्रों को प्रताड़ित नहीं कर सकते हैं. माता-पिता के अलावा बच्चे सबसे अधिक समय तक शिक्षकों के संपर्क में ही रहते हैं. यदि दोनों के बीच में भरोसा नहीं होगा, तो पढ़ाई तो प्रभावित होगी ही, बच्चे के मानसिक और बौद्धिक प्रगति भी कुंद हो जायेगी.

यह कहा जाना चाहिए कि सभी शिक्षक छात्रों के साथ क्रूरता का व्यवहार नहीं करते, आदर्श शिक्षकों की संख्या बहुत अधिक है, लेकिन आये दिन आने वाले समाचार यह इंगित कर रहे हैं कि छात्रों, जिसमें बहुत छोटे बच्चे भी शामिल हैं, के साथ शिक्षकों के खराब रवैये की समस्या बढ़ती जा रही है. कुछ दिन पहले दिल्ली में पांचवी कक्षा के एक छात्रा को एक शिक्षिका ने कैंची से घायल किया और उसे पहली मंजिल से धक्का दे दिया.

बच्ची गंभीर स्थिति में अस्पताल में है. दो दिन पहले कर्नाटक में चौथी कक्षा के छात्र को उसके शिक्षक ने धक्का दे दिया, जिससे बच्चे की मृत्यु हो गयी. ऐसी सभी घटनाओं में गवाहों ने बताया है कि इस तरह के व्यवहार आम होते जा रहे हैं. शिक्षकों द्वारा बच्चों के यौन शोषण की हर साल सैकड़ों घटनाएं होती हैं. हिंसक प्रताड़ना, धमकाना, यौन शोषण करना ऐसे अपराध हैं, जो बच्चों के समूचे जीवन पर असर करते हैं.

शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में प्रमुखता से बताया जाता है कि उन्हें छात्रों के साथ कैसे व्यवहार करना है, अच्छी पढ़ाई के साथ बच्चों के व्यक्तित्व विकास में कैसे सहयोग करना है. अब तो बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित पहलुओं के बारे में जानकारी दी जाने लगी है. शिक्षा विभाग और विद्यालय प्रबंधन को विशेष रूप से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके शिक्षकों का व्यवहार ठीक रहे. यदि कोई शिकायत आती है, तो उसे सामान्य घटना मानकर अनदेखा करने या उसकी सतही जांच कराने का चलन बंद होना चाहिए. स्कूल का नाम बचाने के लिए भी शिक्षकों की करतूतों पर परदा डाला जाता है. माता-पिता को भी सचेत रहने की आवश्यकता है.

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