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Home Opinion आपसी सहमति से तलाक शांतिपूर्ण समाधान है, पढ़ें डॉ ऋतु सारस्वत को लेख

आपसी सहमति से तलाक शांतिपूर्ण समाधान है, पढ़ें डॉ ऋतु सारस्वत को लेख

आपसी सहमति से तलाक शांतिपूर्ण समाधान है, पढ़ें डॉ ऋतु सारस्वत को लेख
तलाक

Marital Disputes : वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में बीते माह की 26 जून को केवी विश्वनाथन और एन कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने स्थानांतरण याचिका की सुनवाई के दौरान टिप्पणी करते हुए कहा, ‘वैवाहिक मामलों में हम पाते हैं कि मध्यस्थता की अवधारणा पर गलतफहमी है. जब हम मध्यस्थता की बात करते हैं, तो उन्हें लगता है कि हम उन्हें साथ रहने के लिए कह रहे हैं. हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे साथ हैं या अलग. हम बस मामले का समाधान चाहते हैं.’ शीर्ष न्यायालय की यह टिप्पणी वर्तमान संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है. उल्लेखनीय है कि 1984 का पारिवारिक न्यायालय अधिनियम- विशेष रूप से धारा नौ- मध्यस्थता के माध्यम से सुलह और निपटान को बढ़ावा देता है.


विवाह को अक्सर एक स्थिर समाज की नींव के रूप में देखा जाता है, पर जब यह साहचर्य के बजाय भावनात्मक और मानसिक पीड़ा का कारण बन जाये, तो विवाह विच्छेद आवश्यक हो जाता है. सामान्य तौर पर किसी भी समाज में, विवाह विच्छेद को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाता है. परंतु भारतीय समाज में वैवाहिक जीवन का निर्वहन जीवन और मरण का प्रश्न बन जाता है, जो स्वस्थ समाज के लिए सही नहीं है. मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, लगातार संघर्षों वाली खराब शादी स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव डाल सकती है. नेवाडा और मिशिगन विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं ने 373 विवाहित जोड़ों पर शोध किया और पाया कि वैवाहिक संघर्ष ने पति और पत्नी दोनों के स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया.

तमाम अध्ययन लगातार बता रहे हैं कि विषाक्त वैवाहिक संबंधों से बाहर निकलना ही बेहतर होता है, परंतु ऐसे विरले ही मामले सामने आते हैं जहां सहजता और सौहार्दपूर्ण विवाह विच्छेद हो. अक्सर पति अथवा पत्नी स्वयं को सही सिद्ध करने की जिद में अपने जीवनसाथी पर अनर्गल आरोप लगाते हैं. इससे एक-दूसरे के प्रति घृणा और बदला लेने की भावना बढ़ जाती है. नतीजा, वर्ष दर वर्ष एक-दूसरे को न्यायालय में घसीटा जाता है. इसी कारण समय-समय पर देश की विभिन्न अदालतें वैवाहिक विवादों पर मध्यस्थता का विकल्प देती हैं. ऐसे में यह मान लिया जाता है कि मध्यस्थता का तात्पर्य दंपतियों को साथ रखने के लिए दबाव बनाने की प्रक्रिया है. ऐसा नहीं है, क्योंकि शीर्ष न्यायालय ने विवाह में भावनात्मक और मानसिक स्वास्थ्य के महत्व पर जोर दिया है. शीर्ष न्यायालय का मानना है कि अनिच्छुक पति-पत्नी को मध्यस्थता के माध्यम से फिर से एक होने के लिए विवश करना हानिकारक हो सकता है. इसके बजाय शांतिपूर्ण और रचनात्मक समाधान की ओर आगे बढ़ना चाहिए.


आपसी सहमति से विवाह विच्छेद की अवधारणा अनावश्यक मुकदमेबाजी को कम करने और त्वरित समाधान सुनिश्चित करने के लिए आरंभ की गयी है. न्यायालय विवाह विच्छेद के साथ आगे बढ़ने से पहले जोड़ों को सुलह करने में मदद करने के लिए मध्यस्थता को दृढ़ता से प्रोत्साहित करते हैं. भले ही सुलह संभव न हो, मध्यस्थता अलगाव की शर्तों पर बातचीत करने में सहायता करती है, विशेष रूप से वित्तीय समझौतों और बच्चे की कस्टडी के संबंध में. बच्चों की कस्टडी एक और प्रमुख मामला है जो वैवाहिक विवादों में मध्यस्थता के महत्व को रेखांकित करता है. भारतीय अदालतें बच्चे के कल्याण को प्राथमिकता देती हैं, अक्सर संयुक्त अभिरक्षा (कस्टडी) या गैर-संरक्षक माता-पिता के लिए सहज मुलाकात के अधिकार को प्रोत्साहित करती हैं. गौरव नागपाल बनाम सुमेधा नागपाल (2009) मामले में, सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की कस्टडी व्यवस्था को बच्चे को भावनात्मक स्थिरता प्रदान करने के लिए संरचित किया जाना चाहिए, भले ही माता-पिता अलग हो जाएं. संबंधों के निरंतर टकराव और विषाक्त वैवाहिक संबंधों के निर्वहन के लिए अधिकांशत ‘बच्चों के हितों को संरक्षित’ करने की दलील दी जाती है. माना जाता है कि विवाह विच्छेद का सर्वाधिक नकारात्मक प्रभाव बच्चों पर पड़ता है. यह अधूरा सच है. यकीनन विवाह विच्छेद का परिणाम बच्चों के लिए सुखद नहीं होता, परंतु उससे कहीं अधिक दुखद माता-पिता का निरंतर टकराव देखते हुए उस वातावरण में जीवन निर्वाह करना होता है. अनेक शोध इस बात की पुष्टि करते हैं.


इस संबंध में इंग्लैंड और वेल्स में 6,500 पारिवारिक वकीलों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन ‘रेजोल्यूशन’ का सर्वेक्षण महत्वपूर्ण जानकारी देता है. सर्वेक्षण में 14 से 22 वर्ष के 514 किशोरों और युवा वयस्कों से पूछा गया कि क्या वे दुखी विवाह में साथ रहने के बजाय अपने माता-पिता के तलाक को पसंद करेंगे. सर्वेक्षण में शामिल 82 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे दुखी विवाहित माता-पिता के साथ रहने के बजाय कानूनी रूप से अलग हुए अभिभावकों के साथ रहना पसंद करेंगे. इसमें संदेह नहीं कि सुखद वैवाहिक संबंध न केवल दंपतियों, बल्कि उनकी संतानों और समाज के लिए बेहतरी लेकर आता है, परंतु इसका यह अर्थ नहीं है कि दो लोग तमाम विवादों के बाद भी एक साथ रहें. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि सौहार्दपूर्ण रूप से अलग होकर एक सम्मानजनक जीवन की ओर कदम रखा जाए.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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