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Home Opinion उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास आधारित दृष्टिकोण जरूरी

उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास आधारित दृष्टिकोण जरूरी

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उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में विकास आधारित दृष्टिकोण जरूरी
सरेंडर करने वाले नक्सलियों की ट्रेनिंग

Naxalite Area : भारत में नक्सलवाद व उग्रवाद दशकों से राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक विकास और ग्राम स्तर की व्यवस्था के सामने एक गंभीर चुनौती रही है. दलित, वंचित समुदाय के अधिकारों व उत्थान के लिए वर्ग संघर्ष की एक शुरुआत ने देश, राज्य और पिछड़े भौगोलिक क्षेत्रों को विगत दशकों में विभिन्न रूपों में प्रभावित किया है और विकास की गति को स्थिर करने का प्रयास किया है.

पिछली कई सरकारों ने आर्थिक व सामाजिक तथा अन्य उपायों के संयोजन से इस समस्या के समाधान का प्रयास किया है. वर्तमान में जारी सरकारी आंकड़े और विशेषज्ञों के मत यह संकेत दे रहे हैं कि हिंसा संबंधित घटनाएं उल्लेखनीय रूप से कम हुई हैं. भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और विभिन्न गैर-सरकारी स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर 2014-2015 में उग्रवादी घटनाएं चरम पर थीं. यदि पूरे दशक की बात करें, तो इस अवधि में उग्रवादी हिंसा की कुल 7,744 घटनाएं हुईं. आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2025 के बीच न केवल उग्रवादी हिंसा की घटनाओं में कमी आयी है, बल्कि आम नागरिक और सुरक्षा बलों की तुलना में कहीं ज्यादा उग्रवादी मारे गये हैं.


वर्ष 2015 से पहले प्रतिवर्ष अमूमन 500 से ज्यादा हिंसा और प्रति हिंसा की घटनाएं दर्ज की जाती थीं, जो कम होकर 200 के आसपास रह गयी हैं. निःसंदेह, इससे साबित होता है कि चरमपंथियों के खिलाफ सरकार ने बेहद सटीक और प्रभावशाली रणनीति अपनायी है. इससे अब उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में अमन और शांति साफ दिखने लगी है. हालांकि, इसके साथ-साथ नयी चुनौतियां भी खड़ी हो रही हैं. इन चुनौतियों का जब तक सार्थक समाधान नहीं होगा, तब तक उग्रवाद की समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है.

उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में सर्वांगीण विकास सबसे बड़ी चुनौती है. इन क्षेत्रों में प्राकृतिक संसाधन जैसे खनिज, जंगल, जल और कृषि भूमि व्यापक रूप से उपलब्ध हैं. यदि इन संसाधनों का स्थानीय समुदायों के हित में उपयोग किया जाये, तो दीर्घकालिक आर्थिक समृद्धि संभव है. सरकारी तंत्र इन क्षेत्रों में बड़ी-बड़ी कंपनियों को आमंत्रित कर रही हैं, लेकिन स्थानीय संसाधनों के वितरण में जब तक स्थानीय समुदायों का हस्तक्षेप नहीं होगा, तब तक स्थायी शांति की कल्पना करना बेमानी है. संसाधनों की पारदर्शी साझेदारी और स्थानीय लोगों को भूमि व वन अधिकार देने से विकास की गति तेज होगी. क्योंकि उग्रवाद अपने उत्थान से पतन की अवस्था में पहुंचने तक शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक ताने-बाने को अपूरणीय क्षति पहुंचा चुका है. इस मामले में सरकार को बेहद सतर्कता से काम लेना होगा.


दूसरी बड़ी चुनौती शासन की है. इसके लिए सरकार ने कई स्तरों पर काम किया है, परंतु अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है. स्थानीय स्वशासन को मजबूत बनाना स्थायी शांति के लिए जरूरी है, क्योंकि इससे स्थानीय समुदायों में निर्णय लेने की शक्ति आती है. पंचायती राज संस्थाओं को अधिक अधिकार और वित्तीय शक्ति देकर शासन-सेवा के बीच की दूरी कम की जा सकती है. हालांकि सैद्धांतिक रूप से सरकार ने ग्राम पंचायती संस्थाओं को कई प्रभावशाली अधिकार दिये हैं, लेकिन व्यावहारिक तौर पर आज भी यहां नौकरशाही हावी है. जन सरोकार से टूटने की स्थिति ने धीरे-धीरे इसकी जड़ें कमजोर की हैं.

पांचवी अनुसूची के लिए सरकार ने पेसा लागू किया है, इसे और सशक्त बनाने की जरूरत है. उग्रवाद प्रभावित जिलों में शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, स्वरोजगार योजनाओं और युवाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करने से स्थायी शांति में मदद मिलने की पूरी संभावना है. यही नहीं, उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में स्थानीय बुनियादी सेवाएं भी कमजोर हैं. सड़क, बिजली, पानी, स्वास्थ्य केंद्र और मोबाइल व इंटरनेट सुविधा जैसी मूलभूत सेवाओं की उपलब्धता स्थानीय समुदायों के जीवन स्तर में सुधार लाती हैं, जिससे असंतोष को हतोत्साहित किया जा सकता है.


सत्ता के विकेंद्रीकरण की दिशा में की गयी पहल के तहत स्वशासन की संस्थाओं, पंचायती राज और ग्राम सभा को केंद्र बिंदु बनाकर विकास की गति को आगे बढ़ाने की जरूरत है. अफसरशाही को नियंत्रण में रखकर स्थानीय स्वशासन को विकास की धुरी बनाकर सरकार जनता के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करे. जनोन्मुखी शासन व्यवस्था की अवधारणा को बल देकर उग्रवाद को सदा के लिए नष्ट किया जाये. आत्मसमर्पण कर चुके या उग्रवाद प्रभावित युवाओं के पुनर्वास हेतु योजनाओं को मुख्यधारा से जोड़ना आवश्यक है.

जनता के हितों के लिए बेहतर विकल्प की परिकल्पना को साकार करने का यह उचित अवसर है. आज स्थितियां पहले से बेहतर नजर आती हैं और जब हिंसा कम होती है, तो विकास आधारित दृष्टिकोण और स्थानीय शासन तंत्र को भरोसेमंद रूप से संभाला जा सकता है. सरकार, नागरिक समाज और स्थानीय समुदायों को मिलकर ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिससे पूर्व में हिंसाग्रस्त प्रदेशों में स्थानीय निर्णय लेने की शक्ति विकसित हो, आर्थिक समृद्धि और सामाजिक स्थिरता सुनिश्चित हो सके.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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