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घटती जन्म दर की चुनौती

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घटती जन्म दर की चुनौती

जनगणना शुरू होने से पहले देश में आबादी पर आयी एक नयी वैश्विक रिपोर्ट चिंतित करने वाली है. यूएनएफपीए, यानी संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने ‘स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट, द रियल फर्टिलिटी क्राइसिस’ नाम से रिपोर्ट जारी की है, जिसमें जनसंख्या की संरचना, प्रजनन क्षमता और जीवन प्रत्याशा दर में अहम बदलावों के बारे में बताया गया है, जो बड़े जनसांख्यिकीय परिवर्तन का संकेत है. रिपोर्ट यह तो बताती है कि 2025 में 1.46 अरब की आबादी के साथ भारत दुनिया की सबसे आबादी वाला देश बना रहेगा. पर रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में प्रजनन दर घटकर 1.9 जन्म प्रति महिला पर पहुंच चुकी है. यह आंकड़ा 2.1 की प्रतिस्थापन दर से कम है. प्रतिस्थापन दर वह दर है, जो आबादी को बनाये रखने के लिए आवश्यक है. यानी अब भारतीय महिलाएं औसतन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जनसंख्या के आकार को बनाये रखने के लिए आवश्यक बच्चों से कम बच्चे पैदा कर रही हैं. जाहिर है कि भारत ‘हम दो, हमारे दो’ की नीति से नीचे चला गया है.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की नौजवान आबादी नौकरी की असुरक्षा और घर में सीमित जगह को बच्चे पैदा करने में बाधा के तौर पर देख रही है. बच्चे की भरोसेमंद देखभाल की कमी भी परिवार बढ़ाने में बाधा है. रिपोर्ट के मुताबिक, महिलाओं को अब भी प्रजनन से जुड़े स्वतंत्र फैसले लेने में बाधाओं का सामना करना पड़ता है. हालांकि, देश के विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में प्रजनन संबंधी असमानताएं भी बनी हुई हैं. जैसे, बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में प्रजनन दर उच्च है, जबकि दिल्ली, केरल और तमिलनाडु में प्रजनन दर प्रतिस्थापन दर से कम है. अभी तो भारत में युवा आबादी सबसे अधिक है. देश की आबादी में 0-14 वर्ष तक के आयु वर्ग के बच्चों की आबादी 24 फीसदी, 10-19 आयु वर्ग की आबादी 17 प्रतिशत और 10-24 आयु वर्ग की जनसंख्या 26 प्रतिशत है. जबकि देश की 68 प्रतिशत आबादी कामकाजी है. देश में बुजुर्गों की आबादी (65 वर्ष से अधिक) बेशक अभी सात प्रतिशत है, लेकिन जीवन प्रत्याशा में सुधार के साथ बुजुर्गों की आबादी बढ़ना तय है. ऐसे में, भविष्य में तब बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है, जब जन्म दर में कमी के कारण कामकाजी आबादी का आंकड़ा घटने लगेगा.

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