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प्रयोगशालाओं को परेशानी

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प्रयोगशालाओं को परेशानी

Customs duty on chemicals : वर्तमान वित्त वर्ष 2024-25 के बजट में कई वस्तुओं पर आयात शुल्क या तो हटा लिया गया है या उनमें कटौती की गयी है. लेकिन प्रयोगशालाओं में इस्तेमाल होने वाले रसायनों पर बुनियादी सीमा शुल्क में भारी वृद्धि की गयी है. पहले यह शुल्क 10 प्रतिशत ही था, पर हालिया बजट में उसे बढ़ाकर 150 प्रतिशत कर दिया गया है. इससे तमाम तरह की प्रयोगशालाओं, शोध केंद्रों और विश्वविद्यालयों के अनुसंधान पर नकारात्मक असर पड़ सकता है.

शोध और अनुसंधान के केंद्रों के लिए बजट निर्धारित होता है, पर अधिक खर्च होने पर आवंटन बढ़ा भी दिया जाता है. रिपोर्टों के अनुसार, वित्तीय आवंटन मुहैया कराने वाली एजेंसियों ने प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिकों को सूचित कर दिया है कि रसायनों पर खर्च में बढ़ोतरी की स्थिति में उनका आवंटन नहीं बढ़ाया जायेगा. इस कारण कई प्रयोगशालाओं द्वारा रसायनों के ऑर्डर रद्द करने की खबर भी है. मामूली शोध कार्य के लिए भी रसायनों की आवश्यकता होती है.

ऐसे में सीमा शुल्क बढ़ाने से शोध और अनुसंधान में अवरोध पैदा हो सकता है. बड़ी प्रयोगशालाएं तो शायद किसी तरह धन की कमोबेश व्यवस्था कर भी लें, पर छोटी संस्थाओं को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है. हालांकि शिक्षण और शोध के लिए आवंटन में निरंतर वृद्धि हुई है, फिर भी इस खर्च के मामले में हम अनेक समकक्ष और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से पीछे हैं. रसायनों के दाम बढ़ने से शिक्षा में आवंटन बढ़ाने का दबाव भी बढ़ेगा. आइआइटी जैसे संस्थानों में रसायनों पर कुछ करोड़ रुपये हर साल खर्च होते हैं. हालिया वर्षों में देश के भीतर रसायन उत्पादन में वृद्धि हुई है, पर अभी भी बहुत से रसायनों के आयात की आवश्यकता बनी हुई है. वैज्ञानिक एवं औद्योगिक शोध विभाग में पंजीकृत सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध संस्थानों को सीमा शुल्क में कुछ वर्षों से छूट मिली हुई है.

कुछ दिन पहले ही इस छूट को मार्च 2029 तक बढ़ाने की अधिसूचना जारी की गयी है. केंद्र सरकार के संबंधित विभागों, धन मुहैया कराने वाली एजेंसियों, संस्थानों और वैज्ञानिकों में इस मुद्दे पर विचार-विमर्श हो रहा है. इस संबंध में जल्दी ही आधिकारिक स्पष्टीकरण अपेक्षित है. वैज्ञानिकों को आशा है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण सीमा शुल्क में भारी बढ़ोतरी के अपने प्रस्ताव पर पुनर्विचार करेंगी. शोध एवं अनुसंधान पर कम खर्च तथा संसाधनों के व्यापक अभाव के बावजूद भारत उन देशों की श्रेणी में है, जो शोध पत्र प्रकाशित करने तथा पेटेंट हासिल करने में अग्रणी हैं. देश में प्रयोगशालाओं की संख्या बढ़ायी जानी चाहिए, पर अगर शुल्क एवं कर बेतहाशा बढ़ाये जायेंगे, तो ऐसा हो पाना बेहद मुश्किल हो जायेगा.

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