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Home Opinion कॉप-30 से भी नहीं हुआ जीवाश्म ईंधन का हल

कॉप-30 से भी नहीं हुआ जीवाश्म ईंधन का हल

कॉप-30 से भी नहीं हुआ जीवाश्म ईंधन का हल
कॉप-30

COP-30 : पिछले दिनों ब्राजील के बेलेम में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन कॉप-30 संपन्न हुआ. सम्मेलन के अंत में दोहराया गया कि आने वाले समय में सभी देश मिलकर काम करेंगे, हालांकि यह संभव नहीं दिखता. क्योंकि सम्मेलन के अंतिम दिन जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से खत्म करने को लेकर जिस तरह की खींचतान हुई, उसने विभाजित दुनिया की तस्वीर सामने रख दी. सम्मेलन में आपाधापी और अनिश्चितता का आलम यह रहा कि जीवाश्म ईंधन से जुड़ी वैश्विक योजना का उल्लेख पहले ड्राफ्ट में किया गया था, पर आखिर में उसे संशोधित ड्राफ्ट से हटा दिया गया.


इस सम्मेलन की शुरुआत में यह उम्मीद बंधी थी कि इसमें भाग लेने वाले देश ग्लोबल वार्मिंग के खिलाफ किसी ठोस नतीजे पर पहुंचेंगे. पर देशों के हठी रवैये के कारण सम्मेलन वैश्विक तापमान वृद्धि के खिलाफ ठोस नतीजे पर पहुंचने में असफल रहा. इसके बावजूद सम्मेलन में हुई जलवायु वार्ता को कई मायनों में अभूतपूर्व कहा जा रहा है. सम्मेलन में मौजूद दुनियाभर के 194 देशों ने तमाम तरह के मतभेदों-तनावों और अमेरिका की गैरमौजूदगी के बीच एक ऐसे पैकेज पर सहमति जतायी, जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. जलवायु मुद्दे पर इसे ‘बेलेम पॉलिटिकल पैकेज’ की संज्ञा दी जा रही है.

उम्मीद भी की जा रही है कि यह पैकेज वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने की राह आसान करेगा. दरअसल, दुनियाभर के 194 देशों की जलवायु मुद्दे पर एकमत से बनी सहमति यह जाहिर करती है कि अब जलवायु मुद्दा वैश्विक नेतृत्व का सवाल नहीं रह गया है और न ही यह नैतिक मुद्दा रहा है. अब यह मुद्दा आर्थिक सुरक्षा और विकास का रास्ता भी बन चुका है. यही वह अहम कारण रहा जिसके चलते इस सम्मेलन में अप्रत्याशित रूप से एक नये तरह का आपसी सहयोगात्मक रवैया दिखाई दिया. इसमें दो राय नहीं है कि आज दुनिया गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है.

इसके बावजूद दुनिया के अधिकांश देश वैश्विक तापमान वृद्धि को दो डिग्री सेल्सियस के नीचे रखने और 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को लेकर उदासीन बने हुए हैं. दिनों-दिन तेजी से बढ़ता कार्बन उत्सर्जन और तापमान मानव अस्तित्व के लिए खतरा बनता जा रहा है. इसके पीछे विकसित देशों का कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने की अपनी प्रतिबद्धता पर खरा नहीं उतरना रहा है. होना यह चाहिए था कि विकसित देश निर्धारित अवधि से पहले ‘नेट जीरो’ लक्ष्य तक पहुंचने में कामयाब हो जाते. चूंकि विकसित देश ज्यादा कार्बन उत्सर्जन के दोषी हैं, इसलिए उनको यह अतिरिक्त जिम्मेदारी भी वहन करनी चाहिए थी, पर ऐसा नहीं हो सका.

दरअसल, कॉप-30 सम्मेलन इन तीन सवालों के बीच ही घूमता रहा कि- दुनियाभर के देश क्लाइमेट एक्शन को किस तरह आगे बढ़ाते हैं, तकनीक व राहत राशि उन देशों को दें जो इससे सर्वाधिक प्रभावित हैं व उनके पास इसे कैसे पहुंचाया जा सकता है, और जलवायु कार्रवाई किस तरह समग्रता में की जा सकती है. सम्मेलन का यह विमर्श भी सराहनीय कहा जा सकता है कि आयोजन में मौजूद देशों ने इसे स्वीकारा कि विकासशील देशों के हितों को महत्व देना समय की मांग है.


जलवायु परिवर्तन से प्रभावित गरीब व विकासशील देशों के लिए फंड के आवंटन को लेकर आयोजन में मौजूद देशों ने धनी देशों से अपील की कि वे 2035 तक विकसित देशों को गर्म होती दुनिया के हिसाब से ढलने के लिए दी जाने वाली राशि को कम से कम तीन गुना कर दें. सराहनीय रहा कि सम्मेलन में इस लेकर सर्वसहमति बन गयी. बेलेम में अधिकतर देशों ने जलवायु परिवर्तन के असर से निपटने में एकता दिखाने की कोशिश की, परंतु धनी और विकासशील देशों के बीच तेल, गैस और कोयले को लेकर उभरे मतभेद सुलझाये नहीं जा सके. जंगल की सुरक्षा का मुद्दा भी आम सहमति न हो पाने के चलते लटका ही रह गया. भारत की बात करें, तो उसका दृढ़ मत रहा कि विकसित देशों को तय अवधि से पहले ‘नेट जीरो’ लक्ष्य तक पहुंचना चाहिए.

विकसित देशों ने ज्यादा कार्बन उत्सर्जन किया है, तो अतिरिक्त जिम्मेदारी भी उन्हें ही उठानी चाहिए. उनको भारत से सबक लेना चाहिए जो अपने विकास कार्यक्रम और पर्यावरण संरक्षण पहल को साथ-साथ आगे बढ़ा रहा है. इसी कारण भारत 2070 की समय सीमा से पहले ही नेट जीरो का लक्ष्य प्राप्त कर लेगा. भारत ने आश्वस्त किया कि वह संशोधित एनडीसी 2035 तक समय पर घोषित कर देगा.


जीवाश्म ईंधन का मसला छोड़ दें, तो सम्मेलन का निष्कर्ष सकारात्मक रहा. इसमें ग्लोबल इंप्लीमेंटेशन एक्सेलरेटर की शुरुआत अहम कदम है. इसके तहत अगले दो वर्षों में देशों की जलवायु योजनाओं में और 1.5 डिग्री सेल्सियस लक्ष्य के बीच के अंतर को पाटने के लिए एक फास्ट ट्रैक शुरू किया जाना है. दूसरा प्रयास जस्ट ट्रांजिशन मैकेनिज्म से जुड़ा है. बेलेम से यह साफ संकेत दिया गया कि दुनिया की ऊर्जा की कहानी अब पहले जैसी नहीं रही, वह बदल रही है. दुनिया भले पहले से कहीं अधिक विभाजित है, पर जलवायु कार्रवाई पर बनी सहमति यह संकेत देती है कि साझा संकट साझा समाधान चाहते हैं. एकजुट होकर अभी भी बहुत कुछ किया जा सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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