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विवादों से सिनेमा को नुकसान

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विवादों से सिनेमा को नुकसान

अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता है कि रोमन लिपि में मिली पटकथा से कई कलाकारों को परेशानी होती है. कहा जाता है कि भाषा से भाव बनता है. हर भाषा की एक लिपि होती है और उस लिपि का एक सौंदर्य बोध होता है. अगर आप देवदेवनागरी लिपि के शब्दों को रोमन में लिखते हैं, तो बहुत से शब्दों के अर्थ अलग हो जाते हैं और उनकी ध्वनि बदल जाती है.

उदाहरण के लिए, अगर आप लड़के लिखेंगे, तो ‘डी’ की ध्वनि अलग है और ‘ड़’ की अलग. जो कलाकार अंग्रेजी पृष्ठभूमि से आते हैं, उनके साथ उच्चारण को लेकर हम कई समस्याओं को लंबे समय से देख रहे हैं, लेकिन हमें यह भी समझना होगा कि हम हिंदी में जरूर फिल्में बनाते और दिखाते हैं, लेकिन बॉलीवुड केवल हिंदीभाषियों का उद्योग नहीं है. सिनेमा में मुख्य रूप से तीन घटक हैं- निर्माता, रचनाकार (लेखक) और दर्शक.

दर्शक निश्चित रूप से हिंदीभाषी हैं, लेकिन हिंदी सिनेमा बनानेवाले लोग भारत भर से हैं. कोई आंध्र प्रदेश से है, कोई केरल से है, कोई बंगाल से है, तो कोई गुजरात से है. इन्हें हिंदी भाषा भले न आती हो या ठीक से न आती हो, पर वे सिनेमा की भाषा जानते हैं.

चूंकि सिनेमा एक दृश्य-श्रव्य माध्यम है, तो उसकी भाषा सार्वभौमिक है. हमारे फिल्म उद्योग में हिंदी नहीं जाननेवाले चित्र निर्देशक हैं, कला निर्देशक हैं. ऐसे लोग हिंदी पढ़ना न जानते हों, पर हिंदी समझ लेते हैं. अब इस बहुभाषी सिनेमा उद्योग में अगर हम कहें कि केवल हिंदी में ही पटकथा होनी चाहिए, तो यह ठीक नहीं है.

मैं यह नहीं कह रहा हूं कि देवनागरी लिपि में पटकथा नहीं होनी चाहिए, जरूर होनी चाहिए, लेकिन जो लोग इस लिपि को नहीं पढ़ पाते हैं, उन्हें रोमन लिपि में भी इसे मुहैया कराया जाना चाहिए. आप यह कह सकते हैं कि अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त करें, पर हिंदी की अनिवार्यता लागू मत करें.

मैं अपनी पटकथा हिंदी में ही लिखता हूं और कभी-कभी ही ऐसा अनुरोध आता है कि अगर आप अंग्रेजी में भी इसे दे दें, तो ठीक रहेगा. मुझसे किसी ने पटकथा का पहला प्रारूप अंग्रेजी में नहीं मांगा है. एक बड़ी निर्माण कंपनी के प्रमुख केरल से हैं. उन्होंने कहा कि वे हिंदी पढ़ लेते हैं, बस थोड़ा समय अधिक लगता है, आप हिंदी में पटकथा दे दें. आगे जरूरत होगी, तो अंग्रेजी में भी करा लेंगे.

मैंने अमिताभ बच्चन और अनेक नामचीन कलाकारों के साथ काम किया है. बच्चन साहब को तो पटकथा देवनागरी में ही चाहिए. जब मैं ‘सरकार’ लिख रहा था, तो मेरी समस्या यह थी कि निर्देशक रामगोपाल वर्मा हिंदी लिपि नहीं पढ़ सकते. तो, मैंने अंग्रेजी में पटकथा दी थी. बच्चन साहब ने उसे देनागरी में करने के लिए एक व्यक्ति की सेवा ली थी, जिसके काम से मैं संतुष्ट नहीं था. मैंने उस पटकथा को उनके लिए स्वयं ही नागरी में लिख दिया.

बच्चन साहब हों या पंकज त्रिपाठी और नवाजुद्दीन जैसे कलाकार हों, उत्तर भारत से आनेवाले सभी कलाकार देवनागरी में लिखी पटकथा पसंद करते हैं. एक बड़े निर्देशक को देनागरी पढ़नी आती थी, तो उन्होंने कहा कि आप हिंदी में ही लिख दें.

कहने का अर्थ यह है कि जो हिंदी पढ़ सकते हैं, वे रोमन में पटकथा देने के लिए नहीं कहते हैं. फिल्म निर्माण कंपनियों में देश के अलग-अलग हिस्सों के लोग हैं और कई लोग विदेशों से पढ़ कर आये हैं. वहां कार्यरत सभी लोग तो लखनऊ, जयपुर या पटना से तो हैं नहीं. बंगाली, कन्नड़, तमिल आदि क्षेत्रीय सिनेमा में अधिकतर लोग स्थानीय भाषा के ही होते हैं, तो वहां रोमन में लिखने की आवश्यकता नहीं के बराबर होती है.

बॉलीवुड एक महासागर की तरह है. यहां तो विदेशी लोग भी विभिन्न विभागों में काम करते हैं. मेरा आकलन है कि किसी भी फिल्म यूनिट में आधे लोग गैर हिंदीभाषी होते हैं. हिंदी बनाम दक्षिण भारतीय भाषाओं को लेकर बहस भी अनावश्यक है. ऐसी बहसें न तो सिनेमा के हित में हैं और न ही हिंदी एवं अन्य भाषाओं के. सिनेमा की भाषा नहीं होती, संवाद की होती है.

हम लोग कई देशी-विदेशी भाषाएं नहीं जानते, पर उन भाषाओं में बनी फिल्मों को हम खोज-खोज कर देखते हैं. क्या हम ईरान, फ्रांस या इटली की फिल्मों को नहीं देखते! हमें बांग्ला नहीं आती, फिर भी हम सत्यजीत रे या ऋत्विक घटक की फिल्में देखते हैं. दक्षिण की सभी फिल्में हिंदी में डब होकर नहीं आतीं, तो क्या उनमें से कई फिल्मों को हम नहीं देखते! जिन फिल्मों के कथ्य, उद्देश्य और शैली की प्रशंसा होती है, उन्हें हम देखने की कोशिश करते हैं.

हाल में यह चर्चा भी चली है कि दक्षिण भारत की फिल्में हिंदी सिनेमा पर हावी हो रही हैं. यह एक चरण है और यह स्थायी नहीं है. जब कुल व्यवसाय को देखेंगे, तो कमाई के मामले में ‘दंगल’ बहुत आगे होगी. दक्षिण की फिल्में कुल कमाई का एक छोटा हिस्सा ही हिंदीभाषी क्षेत्रों से कमाती हैं. ‘द कश्मीर फाइल्स’ को देखें, आप उससे सहमत या असहमत हों, यह अलग बात है, पर फिल्म खूब चली है. जिस दिन हिट होने का सूत्र पकड़ में आ जायेगा, तो उस दिन सिनेमा का जादू ही खत्म हो जायेगा. (बातचीत पर आधारित).

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