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Home Opinion प्रबंधन कौशल में नाकाम साबित हो रही है कांग्रेस

प्रबंधन कौशल में नाकाम साबित हो रही है कांग्रेस

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प्रबंधन कौशल में नाकाम साबित हो रही है कांग्रेस
कामाख्या मंदिर में प्रियंका गांधी

Congress Party : र्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस में कुछ भी अच्छा नहीं चल रहा. पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत से वंचित करने से कांग्रेस को जो बढ़त मिली थी, उसे उसने अपनी नादानियों से गंवा दिया है. पार्टी के बागी नेताओं के खिलाफ कार्रवाई करने में टालमटोल और मीडिया के साथ सामंजस्य न बनाना इसकी बड़ी वजहें हैं.

असम में चुनाव होने वाले हैं और वहां कांग्रेस कठिन चुनाव में फंसी हुई है. इसी कारण उसने वहां चुनाव की कमान अघोषित तौर पर प्रियंका गांधी वाड्रा को सौंप रखी है. उन्हें स्क्रीनिंग कमेटी, यानी टिकटों की वितरण समिति का प्रमुख, डीके शिवकुमार तथा भूपेश बघेल को पर्यवेक्षक और भंवर जितेंद्र सिंह को प्रभारी बनाया गया है. यानी वहां प्रियंका की पूरी टीम जुटी हुई है. ऐसे में, वहां जो भी नतीजे आयेंगे, उसकी जिम्मेदारी प्रियंका के मत्थे आयेगी. अगर कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा, तो यही कहा जायेगा कि उत्तर प्रदेश की तरह असम में भी प्रियंका विफल हो गयीं.


भाजपा के लिए असम का चुनाव सिर्फ सत्ता में वापसी तक सीमित नहीं है, उसके फोकस में प्रियंका को विफल साबित करना भी है. इस वजह से भाजपा वहां हरसंभव तरीके आजमा रही है. वह मतदाताओं के बीच यह संदेश भी देना चाहती है कि कांग्रेस में अफरातफरी का माहौल है. इसी के तहत मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस में सेंधमारी की हरसंभव कोशिशों में जुट गये हैं. यह बात समझ से परे है कि जब कांग्रेस का कोई नेता बागी तेवर दिखाने लगता है या उसके पाटी छोड़कर जाने का स्पष्ट संदेश मिल जाता है, तब भी उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती.

असम में कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष भूपेन बोरा ने 16 फरवरी को पार्टी से इस्तीफा दे दिया था. पर पार्टी आलाकमान ने इस्तीफा स्वीकार न कर उन्हें मनाने की कोशिश की. खुद राहुल गांधी ने उनसे फैसले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया. पर बोरा के इस्तीफे के अगले ही दिन हिमंता उनके घर पहुंच गये और फिर यह तय हुआ कि बोरा 22 फरवरी को भाजपा में औपचारिक रूप से शामिल होंगे. जब यह निश्चित हो गया था कि बोरा कांग्रेस में टिकने वाले नहीं हैं, तब भी पार्टी ने उन्हें निष्कासित क्यों नहीं किया? कांग्रेस केवल मूकदर्शक बनी रही. अगर उन्हें पहले ही निलंबित या निष्कासित कर दिया जाता, तो लोगों में यह संदेश जाता कि पार्टी ने उन्हें निकाल दिया और इसी कारण भाजपा का दामन थामना उनकी मजबूरी बन गया थी.


वरिष्ठ कांग्रेसी नेता मणिशंकर अय्यर की बयानबाजी से भी पार्टी नेतृत्व मुसीबत में है. कांग्रेस ने जो गलती बोरा के साथ की, क्या वही मणिशंकर अय्यर को लेकर नहीं कर रही? अय्यर बतौर कांग्रेस नेता बार-बार ऐसे बयान देते रहे हैं, जो भाजपा के लिए कांग्रेस पर हमला करने के हथियार बन जाते हैं. हाल ही में उन्होंने इंडिया गठबंधन के संयोजक पद के लिए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के नाम की पैरवी कर कांग्रेस व राहुल गांधी के लिए असहज स्थिति पैदा कर दी. इस पर एआइसीसी के मीडिया विभाग प्रमुख पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर लिखा कि अय्यर का पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस से कोई संबंध नहीं है और वह जो कुछ कहते-लिखते हैं, वह उनका निजी विचार है.

मणिशंकर अय्यर ने कोई पहली बार पार्टी लाइन से हटकर बयानबाजी नहीं की है. उनका बार-बार बयान देकर कांग्रेस नेतृत्व को परेशानी में डालना और फिर कांग्रेस प्रवक्ताओं का यह कहना, कि पिछले कुछ वर्षों से कांग्रेस से कोई संबंध नहीं है, भी समझ से परे है. अगर पार्टी का किसी नेता से कोई संबंध नहीं है, तो फिर उसे या उसके बयानों को ढोने का क्या मतलब है? कांग्रेस नेतृत्व अपने ऐसे नेताओं पर कड़ी कार्रवाई करने का साहस क्यों नहीं कर पाती कि दूसरा कोई नेता इस तरह की बयानबाजी करने से पहले दो बार सोचे? किस बात को पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के तौर पर बढ़ावा देना है और किसे अनुशासनहीनता मानना है, इसमें कांग्रेस का नेतृत्व अंतर नहीं कर पा रहा है.

कांग्रेस की इस पूरी विफलता की एक वजह मीडिया के साथ उसके सामंजस्य की कमी भी है. चुनाव के समय पार्टियों में भगदड़ मचना स्वाभाविक बात है. पर इससे संदेश यह जाता है कि कांग्रेस के खेमे में निराशा का माहौल है और उसके नेता इधर-उधर भाग रहे हैं. ऐसे में, मीडिया प्रबंधन बड़ा महत्वपूर्ण हो जाता है. राजनीति में नैरेटिव काफी मायने रखता है और इसमें मीडिया की अहम भूमिका होती है. लेकिन कांग्रेस मीडिया के किसी भी माध्यम के जरिये अपनी बात पूरी ताकत के साथ नहीं रख पा रही है.


एआइ इंपैक्ट समिट में यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं द्वारा कमीज उतारकर विरोध करने के मसले को भाजपा ने मीडिया और सोशल मीडिया का सहारा लेकर जिस तरह देश के ‘अपमान’ के साथ जोड़ दिया, उस पर भी कांग्रेस को विचार करने की जरूरत है. इस मामले में भी कांग्रेस हाथ पर हाथ धरे बैठे रही. इस घटनाक्रम ने भी दिखाया है कि कांग्रेस का मीडिया मैनेजमेंट कितना लचर है कि वह अपने जायज लोकतांत्रिक अधिकारों की बात भी सही तरीके से नहीं रख पा रही. ऐसे में, दूसरे ज्वलंत मसलों पर अपने विचार कैसे आगे बढ़ा पायेगी, यह सोचने वाली बात है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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