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जलवायु की चिंता

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जलवायु की चिंता

मिस्र के शर्म अल-शेख में रविवार को शुरू हुए संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन पर पूरी दुनिया की निगाहें हैं. जलवायु परिवर्तन और धरती के तापमान में बढ़ोतरी के भयावह नतीजे हमारे सामने आने लगे हैं. यह वर्ष न केवल सर्वाधिक गर्म वर्षों में रहा, बल्कि दुनिया के बड़े हिस्से में भारी बाढ़, सूखे, भूस्खलन, जंगली आग, असमय और बहुत अधिक बारिश आदि का प्रकोप रहा.

यदि अब भी धरती के तापमान को नियंत्रित करने के ठोस उपाय नहीं किये गये, तो वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस पर रोकना तो दूर, इसे दो डिग्री सेल्सियस तक सीमित कर पाना लगभग असंभव हो जायेगा. वैसी स्थिति में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं की त्वरा और बारंबारता मनुष्य के अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा बन सकती हैं. संयुक्त राष्ट्र महासचिव अंतोनियो गुटेरेस समेत वैज्ञानिक एवं विशेषज्ञ इस पर चिंता जताते रहे हैं कि दुनियाभर के नीति-निर्धारकों, विशेष रूप से विकसित और विकासशील देशों के, की प्राथमिकता में जलवायु परिवर्तन नीचे आ गया है.

संतोष की बात है कि लोगों, खासकर युवाओं, में इस आपात मुद्दे को लेकर चिंता और जागरूकता बढ़ रही है. यह भी उल्लेखनीय है कि सरकारों, समाजों और उद्योगों के स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन व उपभोग बढ़ाने के लिए प्रयत्न हो रहे हैं. लेकिन चुनौती को देखते हुए यह सब पर्याप्त नहीं है. पिछले वर्ष ग्लासगो में आयोजित जलवायु सम्मेलन का मुख्य फोकस स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देना था. भारत समेत कई देशों ने अपने संकल्प और प्रतिबद्धता को विश्व समुदाय के समक्ष स्पष्टता से रखा था.

स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सम्मेलन में उपस्थित होकर यह घोषणा की थी कि भारत स्वच्छ ऊर्जा के तीव्र विकास के लिए प्रयासरत है और हमारी अर्थव्यवस्था 2070 तक पूरी तरह से उत्सर्जन मुक्त हो जायेगी. इस संबंध में भारत की उपलब्धि को वैश्विक स्तर पर सराहा भी गया है. लेकिन विकसित देश हमारे जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में उत्सर्जन में कमी के लिए वांछित निवेश में समुचित रुचि नहीं दिखा रहे हैं.

जलवायु संबंधी निवेश के बिना विकासशील देश अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं कर सकते हैं. जलवायु संकट का मुख्य कारण ऐतिहासिक रूप से विकसित देशों का औद्योगिक विकास और भारी ऊर्जा उपभोग है. विकासशील देश तो बीते कुछ दशकों से विकास यात्रा के सहभागी बने हैं. ऐसे में मिस्र के जलवायु सम्मेलन में इस संबंध में स्पष्ट निर्णय लेने होंगे तथा विकसित देशों को निवेश के लिए राशि उपलब्ध कराना होगा.

इसी से जुड़ा विषय जलवायु संकट से आ रही आपदाओं से हुए नुकसान की भरपाई के लिए वैश्विक कोष बनाने का है. ऐसे कोष के लिए संस्थागत और संरचनात्मक स्वरूप बनाने में भी देरी नहीं होनी चाहिए. आशा है कि इस सम्मेलन में कुछ ठोस निर्णय लिये जायेंगे.

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