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शतरंज के सबसे छोटे बादशाह गुकेश

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शतरंज के सबसे छोटे बादशाह गुकेश
Gukesh D

Chess Grandmaster: सपने हर कोई देखता है, पर सपने कुछ के ही साकार होते हैं. डोम्माराजू गुकेश ने 2013 में विश्वनाथन आनंद के मेगनस कार्लसन के हाथों विश्व चैंपियनशिप का खिताब खोने पर इस खिताब को भारत वापस लाने का सपना देखा था. सात साल की उम्र में उन्होंने शतरंज खेलने की शुरुआत की और अब वह चीन के डिंग लिरेन को हराकर यह सपना साकार करने में सफल हो गये हैं. गुकेश ने सबसे कम उम्र, 18 साल में यह खिताब जीतकर इतिहास रचा है. इससे पहले यह रिकॉर्ड पूर्व विश्व चैंपियन गैरी कास्पारोव के नाम था, जिसे उन्होंने 22 साल, छह महीने, 27 दिन में खिताब जीतकर बनाया था. जब गुकेश ने शतरंज में अच्छे परिणाम निकालने शुरू कर दिये थे, तब उनकी मां पद्मा ने उनसे कहा था कि तुम या तो कॉलेज जाने से पहले ग्रैंडमास्टर बन जाओ या अपनी पढ़ाई पूरी करो, फिर जो चाहे, करो. इसके बाद गुकेश सबसे कम उम्र में ग्रैंडमास्टर बनने के कर्जाकिन के रिकॉर्ड को तो नहीं तोड़ सके. पर वह 18 साल, सात माह, 17 दिन की उम्र में ग्रैंडमास्टर बन गये.

आमतौर पर शतरंज खिलाड़ी खेलते समय चेस इंजन का इस्तेमाल करते हैं, इसलिए खुद तेजी से फैसले लेने में पिछड़ जाते हैं. लेकिन गुकेश के शुरुआती कोच विष्णु प्रसन्ना ने उन्हें खुद फैसले लेने और समस्याओं का समाधान तेजी से करने के लिए चेस इंजन से दूर करने में बड़ी भूमिका निभायी. गुकेश के करियर को जब सही शेप मिल रही थी, तब कोविड में शतरंज टूर्नामेंटों के आयोजनों पर रोक ने उनकी प्रगति पर विराम लगा दिया. उस दौरान आनंद ने पूर्णकालिक खिलाड़ी रहने के बजाय मेंटर की भूमिका अपनानी शुरू की. गुकेश भी उनकी वेस्टब्रिज आनंद अकादमी में शामिल हो गये, जिसका फायदा उनके विश्व चैंपियन बनने के रूप में सभी के सामने है.

पिछला एक साल सही मायने में गुकेश के करियर को नयी ऊंचाइयां दिलाने वाला साल रहा है. इससे पहले शायद किसी ने भी उनके इतनी जल्दी चैंपियन बनने की कल्पना नहीं की थी. वह एक साल पहले फीडे रैंकिंग में 25 वें नंबर पर थे. यही नहीं, वह भारत के पहले चार खिलाड़ियों में भी शामिल नहीं थे. तब उनसे आगे रैंकिंग में आनंद, प्रगनानंदा, अर्जुन इरिगेसी और विदित गुजराती थे. उनके केंडीडेट टूर्नामेंट में खेलने की पात्रता हासिल करने पर भी उन्हें विश्व चैंपियन बनने का मजबूत दावेदार नहीं माना जा रहा था. पर इस किशोर ने सबसे कम उम्र में केंडीडेट टूर्नामेंट जीतकर सभी को चकित कर दिया. इससे पहले इसी साल वह भारत को शतरंज ओलंपियाड का पहली बार खिताब जिताने वाली टीम में शामिल रहे थे. उन्होंने इस सफलता के दौरान पहले बोर्ड का स्वर्ण पदक जीता था.

शतरंज अब सिर्फ दिमागी कौशल का खेल नहीं रहा है. इसके लिए खिलाड़ी को मानसिक मजबूती और तेजी से फैसले लेने की सोच विकसित करनी पड़ती है. इन कामों के लिए खिलाड़ी को टीम रखनी पड़ती है. गुकेश की टीम में विश्वनाथन आनंद तो मेंटर हैं ही, इसके अलावा ट्रेनर ग्रेजगोरज गजेवस्की, मेंट्रल स्ट्रेंथ कोच पैडी अप्टन, साथी खिलाड़ी पी हरिकृष्णा सहित आठ लोगों की टीम है. इस टीम की वजह से गुकेश में गजब का स्टेमिना और सहनशक्ति है. इस खूबी को ध्यान में रखकर ही गुकेश को लंबी बाजियां खेलने को कहा गया. यही वजह है कि ज्यादातर बाजियां 40 चालों से ऊपर खिंचीं. इस रणनीति की वजह से गुकेश ने कई बार ड्रॉ के प्रस्ताव को नकारा भी. इस सबके बावजूद इस मुकाबले के दौरान गुकेश के सामने कुछ मुश्किल क्षण आये. वह पहली ही बाजी हारने से बेहद निराश हो गये थे. उन्होंने विजेता बनने के बाद बताया कि इस बाजी के हारने के बाद वह अपने होटल में कमरे में जाने के लिए लिफ्ट में थे. तब आनंद ने उनसे कहा कि 2010 में टोपालोव से खिताबी मुकाबला खेलते समय मैं भी पहली बाजी हार गया था, उस समय मेरे पास 11 बाजियां बाकी थीं और तुम्हारे पास तो 13 बाजियां हैं. गुकेश ने कहा कि इस बात ने मुझे फिर से उत्साहित कर दिया. पर डिंग लिरेन ने उन्हें सातवीं और आठवीं बाजी में बहुत परेशान कर दिया था और उन्होंने इस बारे में मन में आये डर को ट्रेनर गजेवस्की को बताया भी. उनके दिमाग से डर निकालने के लिए गजेवस्की ने उन्हें समुद्र तट पर ले जाकर स्क्वैश खेला, तब जाकर उनका मन शांत हुआ.

भारतीय शतरंज की मौजूदा स्थिति के पीछे आनंद के पांच बार विश्व चैंपियन बनने का अहम योगदान है. पर अब गुकेश के मात्र 18 साल की उम्र में चैंपियन बनने से देश में युवाओं का इस खेल को अपनाने की तरफ आकर्षित होना लाजिमी है. भारत शतरंज में दबदबे की अपनी इस स्थिति का उसी तरह लाभ उठा सकता है, जिस तरह 1990 के दशक से पहले तक रूस लाभ उठाता रहा है. वैसे भी भारत के पास इस समय गुकेश के अलावा प्रगनानंदा, अर्जुन इरिगेसी और विदित गुजराती जैसे तमाम क्षमतावान खिलाड़ी हैं. पर भारत को दबदबा बनाने के लिए शतरंज को तमिलनाडु की तरह ही अन्य राज्यों में विकसित करना होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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