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क्या खुशियां खरीदी जा सकती हैं

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क्या खुशियां खरीदी जा सकती हैं

दुनिया के जाने-माने मनोवैज्ञानिक और नोबेल पुरस्कार विजेता डेनियल काह्नमैन के शोध ने विश्व मंच पर नयी बहस शुरू कर दी है. उन्होंने जीवन की खुशी और पैसे के संबंध पर शोध किया है. उन्होंने पहले कहा था कि जीवन में खुशी और धन का सीधा संबंध है. हाल में उन्होंने अपने निष्कर्षों को संशोधित करते हुए कहा है कि धन और खुशी के बीच का संबंध इतना सरल नहीं है.

उन्होंने कहा है कि यह जरूरी नहीं है कि अधिक धन से अधिक खुशी मिलती हो और केवल धन की कमी तनाव और दुख का एक बड़ा स्रोत हो. काह्नमैन का कहना है कि धन और खुशियों के रिश्ते को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन खुशियां केवल पैसे से खरीदी नहीं जा सकती हैं. वे मानते हैं कि केवल धन से पूर्ण संतुष्टि हासिल करना संभव नहीं है. वे धन के महत्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन आनंद और सुख के स्रोत धन से भिन्न भी हो सकते हैं. उनका कहना है कि यह भी सच है कि अधिकतर लोग आय बढ़ने से आनंदित होते हैं.

धन और खुशी को लेकर दार्शनिक, अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री पुरातन काल से ही जूझ रहे हैं. काह्नमैन ने 2010 के एक अध्ययन में खुशियों को पैसों से जोड़ कर दिखाया था. उनका निष्कर्ष था कि लोग अक्सर भावनात्मक चीजों को भी आय से जोड़ कर देखते है, लेकिन उन्होंने हाल में पाया कि अमेरिकी लोगों में 75 हजार डॉलर (लगभग 60 लाख रुपये) से ज्यादा कमाने के बावजूद स्थायी खुशी नजर नहीं आती है.

हमें यह भी समझना होगा कि अमेरिका की सामाजिक संरचना भारतीय समाज से भिन्न है. वहां समाज भौतिकवादी और पूंजीवादी व्यवस्था से संचालित है. वहां ऐसे लोगों की बड़ी संख्या है, जो मानते हैं कि पैसे से खुशियां खरीदी जा सकती हैं, पर भारतीय पारंपरिक दृष्टिकोण में पुरातन काल से कहा जाता रहा है कि पैसों से खुशियां नहीं खरीदी जा सकती हैं. डेनियल काह्नमैन को 2002 में नोबेल पुरस्कार मिला था.

इस शोध में उन्होंने यह रेखांकित किया था कि जोखिम, विशेष रूप से वित्तीय जोखिम, का सामना करते समय लोग कैसे निर्णय लेते हैं. अपनी बहुचर्चित पुस्तक ‘थिंकिंग, फास्ट एंड स्लो’ में उन्होंने दो अलग-अलग तरीकों से लोगों को खुशी का अनुभव करने के अपने निष्कर्षों का वर्णन किया है- स्वयं के अनुभव से खुशी और अनुभवों की स्मृतियों से खुशी. स्वयं का अनुभव करना हमारा वह हिस्सा है, जो तात्कालिक है और मौजूदा खुशी या दर्द का अनुभव करता है. दूसरा स्मृति वाला वह हिस्सा है, जो यह दर्शाता है कि अनुभवों को हमने कैसा महसूस किया और उसकी कैसी स्मृतियां हैं.

डेनियल काह्नमैन सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक दो प्रकार की खुशियों के बीच का अंतर है. एक हेडोनिक खुशी, जो सकारात्मक अनुभवों से हमें तत्काल खुशी महसूस होती है, जैसे स्वादिष्ट भोजन करना, मनोरंजक फिल्म देखना या यार-दोस्तों के साथ समय बिताना. दूसरी यूडेमोनिक खुशी, जो हमें उन गतिविधियों से हासिल होती है, जो हमारे मूल्यों, लक्ष्यों और आकांक्षाओं के साथ जुड़ी होती हैं.

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर स्टीवन पिंकर को दुनिया के शीर्ष बुद्धिजीवियों में गिना जाता है. वे डेनियल काह्नमैन को दुनिया का सबसे प्रभावशाली मनोवैज्ञानिक मानते हैं और कहते हैं कि उन्होंने व्यावहारिक अर्थशास्त्र और सामाजिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में क्रांति ला दी है. उनका संदेश साफ है कि यदि हम अपने व्यक्तिगत जीवन और एक समाज के रूप में बेहतर निर्णय लेना चाहते हैं, तो हमें अपने पूर्वाग्रहों का पता होना चाहिए.

पिंकर कहते हैं कि हमारे अपने मतभेद हैं. मुझे लगता है कि यह सही है कि मानव प्रकृति ने हमें कुछ सीमाओं में बांधा है, लेकिन ज्ञान- विज्ञान व शिक्षा ने हमारी अपनी कुछ सीमाओं को पार पाने में मदद की है. लेकिन भूटान जैसे देश भी हैं, जो भौतिकवाद से दूर नैतिक मूल्यों के आधार पर जीवन जीते हैं और खुश रहते हैं.

कई दशक पहले एक रिपोर्टर ने मुंबई एयरपोर्ट पर भूटान के राजा जिग्मे सिंग्ये वांगचुक से पूछा था कि आपके देश की जीडीपी इतनी कम क्यों है. इस पर उनका जवाब था कि हम जीडीपी से नहीं, जीएनएस (ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस) यानी खुशी के इंडेक्स से देश चलाते हैं. वर्ष 1972 में भूटान के सम्राट जिग्मे सिंग्ये वांगचुक ने ग्रॉस हैप्पीनेस इंडेक्स लागू किया था.

यहां सभी मंत्रियों की जिम्मेदारी है कि वे लोगों का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए काम करें. वहां हैपिनेस इंडेक्स को चार आधार पर मापा जाता है- सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण, पर्यावरण का संरक्षण, सतत विकास और बेहतर प्रशासन. कुछ दिन बाद, 20 मार्च को इंटरनेशनल हैप्पीनेस डे यानी अंतरराष्ट्रीय खुशियों का दिन है.

वर्षों से डेनमार्क, फिनलैंड और स्वीडन जैसे देश हैपिनेस इंडेक्स में अव्वल बने हुए हैं, जबकि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, चीन और रूस जैसे शक्तिशाली देश इस इंडेक्स में पहले 10 देशों में भी जगह नहीं बना पाते हैं. जब इस बात का आकलन किया गया, तो पाया गया कि ये छोटे देश भले ही सैन्य क्षमता संपन्न नहीं हैं, लेकिन सामाजिक सहयोग, शिक्षा और सेहत के मामले में दुनिया में अव्वल स्थान रखते हैं.

हमें अपने आर्थिक मॉडल पर भी विमर्श करने की जरूरत है. हम पश्चिम के मॉडल की नकल कर रहे हैं, लेकिन उससे उत्पन्न चुनौतियों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं. जब भारत में वैश्वीकरण का दौर शुरू हुआ था, तो इसके असर के बारे में गंभीर विमर्श नहीं हुआ. वैश्वीकरण के फायदे हैं, तो नुकसान भी हैं. यह संभव नहीं है कि आप विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति दें और आपकी संस्कृति में कोई बदलाव न आए.

कुछ समय पहले तक भारत में संयुक्त परिवार की व्यवस्था थी, जिसमें बुजुर्ग परिवार के अभिन्न हिस्सा थे. यह खंडित हो गयी. परिवार एकल होते गये- पति, पत्नी और बच्चे. यह पश्चिमी देशों का मॉडल है. इसमें माता-पिता, भाई- बहन, चाचा-ताऊ का कोई स्थान नहीं हैं. पश्चिमी देशों में परिवार की परिभाषा है- पति, पत्नी और 18 साल से कम उम्र के बच्चे. बूढ़े मां-बाप और 18 साल से अधिक उम्र के बच्चे परिवार का हिस्सा नहीं माने जाते हैं.

भारत में भी अनेक संस्थान और कंपनियां इसी परिभाषा पर काम करने लगी हैं. हमें पश्चिम के मॉडल की अंधाधुंध नकल करने की जरूरत नहीं है. हमारे मनीषी कह गये हैं कि तेते पांव पसारिए, जेती लंबी सौर यानी उतने ही पांव पसारिए, जितनी लंबी चादर हो. उधार लेकर घी पीने की परंपरा हमारी नहीं है.

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