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Home Opinion जयंती विशेष : विष्णु प्रभाकर को सरल भाषा विरासत में मिली थी

जयंती विशेष : विष्णु प्रभाकर को सरल भाषा विरासत में मिली थी

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जयंती विशेष : विष्णु प्रभाकर को सरल भाषा विरासत में मिली थी
विष्णु प्रभाकर

Vishnu Prabhakar : प्रख्यात साहित्यकार विष्णु प्रभाकर की जन्मस्थली मीरापुर (मुजफ्फरनगर) में मैं यह मालूम करने की कोशिश कर रहा हूं कि यहां कितने लोग प्रभाकर जी को जानते हैं. पिछली बार जब प्रख्यात कवि शमशेर बहादुर सिंह के गांव ‘एलम’ और दलित साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर ओमप्रकाश वाल्मीकि के गांव ‘बरला’ गया था, तो यह देखकर बहुत दुख हुआ था कि उनके गांव में ही लोगों ने उनका नाम नहीं सुना था. इसके विपरीत, मीरापुर में यह देखकर प्रसन्नता हो रही है कि यहां के लोगों ने प्रभाकर जी का नाम सुना है. हालांकि, नयी पीढ़ी के लोगों ने उनका नाम ज्यादा नहीं सुना है. विष्णु प्रभाकर का जन्म 21 जून, 1912 को उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जनपद के मीरापुर कस्बे में हुआ था.


मीरापुर के बारे में उन्होंने स्वयं आत्मकथा के पहले खंड ‘पंखहीन’में लिखा है. बारह वर्ष की उम्र में वे पढ़ने के लिए मीरापुर से अपने मामा के पास हिसार चले गये थे. बाद में उन्होंने अपना मकान सत्यप्रकाश गोयल और ब्रजेश्वर शरण गोयल को दान में दे दिया था. आज इस स्थान पर सत्संग भवन बना हुआ है. मेरी विष्णु प्रभाकर जी से एक ही बार मुलाकात हो पायी, वह भी बीमारी की हालत में. कई वर्ष पहले जब मैं उनसे मिलने दिल्ली गया, तो उन्हें बताया कि मैं उनकी जन्मभूमि से आया हूं, वे बहुत प्रसन्न हुए. मैंने उनसे पूछा कि पुराने समय और आज के समय में कैसा बदलाव महसूस करते हैं. उन्होंने कहा कि पुराने समय में समाज के सामने कुछ आदर्श थे. उस समय त्याग और बलिदान जैसे मूल्यों ने हमारी पीढ़ी में संस्कार पैदा किये. पर आज हमारे नैतिक मूल्यों में गिरावट आयी है. त्याग की भावना न होने के कारण आज हमारे अंदर धैर्य की कमी है. इसका असर सारे समाज पर पड़ा है.


उनका व्यक्तित्व जितना सहज और सरल था, वे उतनी ही सहज और सरल भाषा में लिखते भी थे. कहते थे कि सहज, सरल भाषा मुझे धरती से विरासत में मिली है. शायद इसलिए पाठकों ने उन्हें खूब प्यार दिया. विष्णु जी ने कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी एवं संस्मरण जैसी विधाओं में विपुल लेखन किया. वे कहते थे- ‘मेरे कहने का ढंग सपाट हो सकता है, इसलिए मेरे आलोचक मुझे सृजक नहीं मानते. मुझे कोई आपत्ति नहीं है, पर उदात्त की तड़प कहीं न कहीं मुझे परेशान किये रहती है.’ उन्हें स्वयं पर भरोसा था, इसलिए वे आलोचकों की कटु टिप्पणियों से कभी परेशान नहीं हुए. उन्हें आलोचकों ने नहीं, बल्कि पाठकों ने ही बड़ा कथाकार बनाया. उनकी कहानियां तात्कालिक प्रश्नों से मुठभेड़ करते हुए भी सार्वकालिक प्रश्नों से जूझती हुई नजर आती हैं. निसंदेह ‘आवारा मसीहा’ ने उन्हें प्रसिद्धि दी. इसके साथ ही उनकी कहानी ‘धरती अब भी घूम रही है’ और उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ बहुत लोकप्रिय हुए.

यह विडंबना ही है कि विष्णु जी की रचनाधर्मिता को मुख्यतः इन तीनों रचनाओं के आलोक में देखा जाता है, जबकि उनका विपुल रचना संसार यह सिद्ध करता है कि उन्होंने प्रेम, स्त्री, गरीबी, आर्थिक दुश्चक्र और देश विभाजन की त्रासदी को लेकर अनेक मार्मिक रचनाएं लिखीं. कहानियों की तरह ही उनके उपन्यासों का फलक भी बड़ा है. वर्ष 1992 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ को 1993 में साहित्य अकादेमी सम्मान प्राप्त हुआ. यह स्त्री-पुरुष संबंधों पर लिखा गया एक महत्वपूर्ण उपन्यास है. ‘आवारा मसीहा’ के बाद उन्हें सबसे ज्यादा प्रसिद्धि ‘अर्द्धनारीश्वर’ से ही मिली. दरअसल, विष्णु जी के शुरुआती दौर में उनके उपन्यास ‘निशिकांत’ की बहुत चर्चा हुई. विष्णु जी को नाटकों में भी बड़ी सफलता मिली.
शरतचंद्र की जीवनी ‘आवारा मसीहा’ लिखने में उन्होंने स्वयं को झोंक दिया. विष्णु जी ने जिस समर्पण के साथ यह जीवनी लिखी है, वह बहुत कम लेखकों में दिखाई देती है. अंततः यह जीवनी ही विष्णु जी की पहचान बन गयी. यह केवल जीवनीभर नहीं है, साहित्य का गौरव ग्रंथ है. इस ग्रंथ में अनेक स्तरों पर सृजनात्मकता के विभिन्न आयाम देखने को मिलते हैं. शायद इसलिए यह ऐतिहासिक महत्व की कृति बन गयी है.

यह एक ऐसी कृति है जिसने बांग्ला पाठकों से अधिक हिंदी पाठकों को शरत के निकट लाने का काम किया है. इसकी लोकप्रियता अब भी बरकरार है. संस्मरण और यात्रा वृत्तांत में भी उनका मन खूब रमा. एक ओर उन्होंने डूबकर सुंदर और प्रभावी संस्मरण लिखा, तो दूसरी ओर सजीव और रोचक यात्रा वृत्तांतों के माध्यम से पाठकों को तृप्त किया. उन्होंने जमकर बाल साहित्य भी लिखा. कह सकते हैं कि उन्होंने बाल साहित्य को एक नयी ऊंचाई दी. शायद बहुत कम लोग जानते होंगे कि उन्होंने कविताएं भी लिखीं. उनकी कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं रहा. विष्णु जी ऐसे स्वाभिमानी लेखक थे, जो ताउम्र अपने आदर्शों और जीवन मूल्यों के साथ आगे बढ़ते रहे. एक ऐसा लेखक जो अहंकार, प्रचार और बनावट से दूर सादगी से जिया. आज के साहित्यकार विष्णु जी से प्रेरणा ले सकते हैं. सचमुच, विष्णु प्रभाकर एक सच्चे और आदर्श साहित्यकार थे.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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