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भूख का हल हो

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भूख का हल हो

यह विडंबना ही है कि खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के बावजूद भारत उन देशों की सूची में है, जहां आबादी के एक हिस्से को पेट भर भोजन नहीं मिल पाता है. प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली सर्वोच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए रेखांकित किया है कि भूख और कुपोषण परस्पर संबद्ध हैं तथा यह सरकार की जिम्मेदारी है कि जिन्हें भोजन मयस्सर नहीं है, उन्हें खाना मुहैया कराये.

इसके लिए अदालत ने ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक रसोई की शृंखला बढ़ाने की जरूरत को रेखांकित किया है. केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया था कि देश में भूख से कोई मौत नहीं हुई है, पर खंडपीठ ने विभिन्न सर्वेक्षणों का हवाला देते हुए इसे मानने से इनकार कर दिया. असल में यह जानकारी राज्य सरकारों द्वारा दी गयी सूचना पर आधारित थी.

यह भी बेहद चिंताजनक है कि कई मामलों में राज्य सरकारें अपनी जवाबदेही से बचने के लिए सही तथ्य नहीं बताती हैं. इस रवैये में सुधार की जरूरत है. केंद्र सरकार को भी ऐसी सूचनाओं की पुष्टि कर लेनी चाहिए. अदालत ने कहा है कि चुनाव के समय राजनीतिक दल बड़े-बड़े लोकलुभावन वादे करते हैं. कई राज्यों में सामुदायिक रसोई योजना भी लागू है. ऐसे में पार्टियों को भोजन मुहैया कराने की योजनाओं के साथ अपने वादों को जोड़ना चाहिए.

हालिया वैश्विक भूख सूचकांक के अनुसार भारत में भूख की समस्या गंभीर है. उचित पोषण नहीं मिलने के कारण बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं. हालांकि शिशु मृत्यु दर में कमी आती जा रही है, पर कुपोषित बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी चिंताजनक है. कुछ समय पहले प्रकाशित केंद्र सरकार की राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण रिपोर्ट में बताया गया है कि 26 प्रतिशत बच्चे तथा 30 प्रतिशत से अधिक बच्चियां कुपोषित हैं.

वंचित वर्गों के लिए सामुदायिक भोजनालय खोलने के लिए राज्य सरकारों ने सहमति दी है, पर उनकी मांग है कि केंद्र सरकार खाद्यान्न के वर्तमान आवंटन में दो प्रतिशत की वृद्धि करे तथा रसोई चलाने के लिए आवश्यक मानव संसाधन के लिए वित्तीय प्रावधान करे. केंद्र सरकार खाद्यान्न का आवंटन बढ़ाने के लिए तैयार है, पर वित्तीय सहयोग देने में उसने असमर्थता जतायी है. केंद्र सरकार अपने स्तर पर 131 सामाजिक कल्याण योजनाएं चला रही है तथा अनेक कार्यक्रमों के तहत लाभार्थियों को धन भी हस्तांतरित किया है.

ऐसे में वित्तीय सहयोग के मुद्दे को विमर्श तथा वैकल्पिक उपायों से हल किया जा सकता है. सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार राज्य सरकारों को भूख, भूखमरी और कुपोषण से संबंधित सभी सूचनाएं अदालत को देनी चाहिए. साथ ही, केंद्र और राज्य सरकारों को प्रधानमंत्री पोषण शक्ति निर्माण योजना, राष्ट्रीय पोषण मिशन तथा अन्य कार्यक्रमों को बेहतर ढंग से लागू करने को प्राथमिकता बनाना चाहिए तथा सुनिश्चित करना चाहिए कि कोरोना काल में 80 करोड़ गरीबों को दिये जा रहे मुफ्त राशन का वितरण ठीक हो.

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