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जलवायु मुद्दे पर सहयोग

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जलवायु मुद्दे पर सहयोग

पिछली डेढ़ सदी में पर्यावरण को हुए मानवजनित नुकसान की भरपाई का कोई मुकम्मल उपाय नहीं है. फिर भी साझा कोशिशों से हम पर्यावरण के प्रति पुनर्विचार, पुननिर्माण और पुनर्स्थापना की दिशा में बढ़ सकते हैं. जलवायु परिवर्तन का प्रभाव विनाशकारी होने लगा है. ग्लेशियरों का पिघलना, सूखा, बादल फटना, अत्यधिक गर्मी और सर्दी, इस ग्रह के जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों में घिर जाने का स्पष्ट संकेत है.

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने और 2050 तक नेट जीरो के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साझा वैश्विक प्रयासों की अहमियत पर बल दिया है. भारत दौरे पर आये अमेरिकी जलवायु-विशेष प्रतिनिधि जॉन कैरी ने भी साझा प्रयासों को महत्वपूर्ण बताया है. जॉन कैरी ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश और व्यापार संभावनाओं का जिक्र करते कहा है कि भारत बैट्री और सोलर पैनल के लिए दुनिया का सबसे बड़ा बाजार बन सकता है.

उन्होंने कहा कि सीओपी-26 सम्मेलन की अगुवाई में अमेरिका सभी देशों से जलवायु मसले पर साझा प्रयास का आग्रह करता है. भारत ने 2030 तक 450 गीगावॉट नवीकरणीय ऊर्जा हासिल करने का लक्ष्य तय किया है. इसके लिए वित्त और तकनीकी निवेश महत्वपूर्ण है, जिसमें अमेरिका विशेष भूमिका निभा सकता है. दोनों देश तीन स्तरों पर साझा प्रयास को आगे बढ़ा सकते हैं.

इस दशक में उत्सर्जन को कम करने के लिए साझा प्रस्ताव को विकसित करने पर जोर देना होगा. हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा लक्ष्य को हासिल करने के लिए अमेरिका ने विभिन्न स्तरों पर सहयोग का प्रस्ताव दिया है. इससे परिवहन, इमारतों और उद्योग क्षेत्र में स्वच्छ ऊर्जा का मार्ग प्रशस्त होगा. वित्त जुटाने में अमेरिका भारत के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण कर सकता है. इससे नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में पूंजी आकर्षण, नवाचार और तकनीक हस्तांतरण बढ़ेगा. साथ ही निवेश और व्यापार के लिए द्विपक्षीय सहयोग बढ़ेगा. तीसरा, अनुकूलन और लचीलापन लाने हेतु दोनों देश क्षमता निर्माण के लिए काम करेंगे, जिससे जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को मापने और प्रबंधित करने की राह आसान होगी. महामारी के बाद स्वच्छ ऊर्जा को लेकर निवेशकों का सकारात्मक रुख बना है.

आइपीसीसी की हालिया रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने चेताया है कि जलवायु संकट के दुष्प्रभावों से बचने और जरूरी कदम उठाने के लिए दुनिया के पास मात्र 12 वर्ष का ही समय शेष बचा है. हालांकि, अब तक कई देशों का रुख संतोषजनक नहीं रहा है. दुनिया जलवायु संकट की गंभीर चुनौती का सामना करने जा रही है.

यह न तो राजनीति का विषय है और न विचारधारा का, यह विज्ञान और गणित का संकेत है कि क्या घटित हो रहा है और क्या होने जा रहा है. ग्रीन हाउस गैसों से इस ग्रह का तापमान बढ़ रहा है, समुद्र का रसायन विज्ञान बदल रहा है और बदलने की यह दर उस स्तर पर है, जहां पहुंचने में लाखों वर्ष लगे हैं. इसलिए, कोई देश अकेले कुछ नहीं कर सकता, लेकिन दुनिया चाहे, तो बदलाव ला सकती है. इसके लिए सबको समाधान की दिशा में सोचना और प्रयास करना होगा.

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