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दल-बदल कानून पर पुनर्विचार की जरूरत

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दल-बदल कानून पर पुनर्विचार की जरूरत
रितब्रत बनर्जी

Anti-defection law : पश्चिम बंगाल में चल रहा राजनीतिक घटनाक्रम यह संकेत देता है कि दल-बदल विरोधी कानून पर आज फिर से विचार करने की आवश्यकता है. इसके पीछे कुछ कारण हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक है. पश्चिम बंगाल राज्य विधानसभा से तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के नव निर्वाचित विधायकों में से दो-तिहाई से अधिक के दल-बदल करने और लोकसभा में भी तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई से अधिक सांसदों के दल-बदल कर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआइ) में विलय कर लेने के बावजूद दल-बदल की वैधता पर बहस अगर जारी है, तो इसी से इस मामले की गंभीरता समझी जा सकती है. चुनावी नतीजा घोषित होने के बाद दल बदलने वाले तृणमूल कांग्रेस के विधायक और सांसद दल-बदल विरोधी कानून के तहत अयोग्य घोषित होंगे या नहीं, इस पर सवाल उठ रहे हैं.

प्रश्न यह भी उठ रहा है कि पार्टी में विभाजन आखिर किसे माना जाये. क्या यह केवल निर्वाचित विधायकों और सांसदों से ही संबंधित है या फिर पार्टी संगठन में विभाजन को भी इसमें शामिल किया जायेगा. ये दरअसल कानूनी प्रश्न हैं, जिनका उत्तर कानून की व्याख्या पर ही निर्भर करता है. लेकिन पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बाद तेजी से घटी राजनीतिक घटनाएं निश्चित रूप से एक बड़े मुद्दे पर आत्ममंथन की मांग करती हैं. वह मुद्दा है जनादेश की पवित्रता का, मतदाताओं के वोट की पवित्रता का, और जिस उम्मीदवार को मतदाताओं ने चुना, वह चुनाव के बाद यदि विरोधी राजनीतिक दल में शामिल हो जाता है, तो क्या हो.


यह बिल्कुल सही है कि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस से अलग होने वाले नव निर्वाचित विधायकों की संख्या दो-तिहाई से अधिक है, जो तकनीकी रूप से बिना अयोग्यता के पार्टी विभाजन के लिए आवश्यक है. पर इससे इतर चुनावी जनादेश की पवित्रता पर भी विचार करने की आवश्यकता है. बड़ा प्रश्न यह है कि चुनावी नतीजे के बाद नेताओं का मूल पार्टी छोड़कर दूसरी पार्टी के साथ चले जाने से क्या उन मतदाताओं के साथ धोखा नहीं हो रहा, जिनमें से बड़ी संख्या में लोगों ने पार्टी के आधार पर ही चुनाव में वोट दिया था? अपने देश में बड़ी संख्या में मतदाता चुनावों में उम्मीदवारों को नहीं, बल्कि राजनीतिक पार्टियों को वोट देते हैं. उनके लिए उम्मीदवारों की तुलना में राजनीतिक पार्टियों का महत्व अधिक है. पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजे के बाद जिन विधायकों ने दल-बदल किया, वे दरअसल कुछ ही दिन पहले तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव जीतकर आये थे. इस वर्ष हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को बड़ा झटका लगा, जहां उसे केवल 80 सीटें मिलीं और 40.1 प्रतिशत वोट मिले. जबकि भाजपा ने 207 सीटें जीतीं और उसने 45.8 प्रतिशत वोट हासिल किये.


इसमें कोई संदेह नहीं कि विधायकों और सांसदों के दल-बदल की स्थिति पहले के दौर की तुलना में बेहतर हुई है, जब कोई कानून नहीं था और जनप्रतिनिधि बिना सोचे-समझे रातों-रात पार्टी बदल लेते थे. लेकिन सच बात तो यह है कि अब भी स्पष्ट नहीं है कि पार्टी में विभाजन किसे कहा जाये. इसलिए इस पर स्पष्ट परिभाषा की आवश्यकता है. इस अस्पष्टता को इसलिए भी दूर किया जाना चाहिए, क्योंकि हाल के वर्षों में दल-बदल से जुड़े अधिकांश प्रश्न इसी कारण विवादित रहे हैं कि पार्टी में विभाजन आखिर किसे माना जाये. हर बार जब दल-बदल होता है, तब यह सवाल उठता है कि क्या अलग समूह बना लेना पर्याप्त है या फिर कानून के तहत उस समूह का किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में विलय अनिवार्य है. तृणमूल कांग्रेस के जिन विधायकों ने दल-बदल किया, उन्होंने एक अलग समूह बनाया है और किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में अपना विलय नहीं किया है. जबकि तृणमूल के लोकसभा सांसदों ने अयोग्यता से बचने के लिए एनसीपीआइ, यानी नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया में अपना विलय कर लिया.

सवाल यह है कि क्या वर्तमान कानून के तहत दोनों स्थितियां वैध हैं. इस मुद्दे पर स्पष्टता अत्यंत आवश्यक है कि किसी अन्य राजनीतिक पार्टी में विलय करना अनिवार्य होना चाहिए या फिर अलग समूह के रूप में बने रहना भी स्वीकार्य हो सकता है. वास्तविकता यह है कि ऐसे मामलों में स्पीकर द्वारा निर्णय लेने में कोई एकरूपता नहीं रही है कि दल-बदल वैध है या नहीं. कुछ मामलों में निर्णय जल्दी लिया जाता है, जबकि कुछ मामलों में स्पीकर द्वारा फैसला लेने में काफी समय लग जाता है. इस असमानता को देखते हुए स्पीकर द्वारा दल-बदल से जुड़े मामलों पर निर्णय लेने के लिए कानून में एक निश्चित समय सीमा तय करने पर विचार करना उचित होगा. दल-बदल के मामले में अयोग्यता से बचने के लिए दो-तिहाई सदस्यों की आवश्यकता एक उचित शर्त प्रतीत होती है.

हालांकि, छोटे राजनीतिक दलों में जहां विधायकों और सांसदों की संख्या कम होती है, वहां यह शर्त अप्रासंगिक हो जाती है. लेकिन बड़ा प्रश्न यह है कि एक राजनीतिक पार्टी से चुने जाने के बाद दूसरी राजनीतिक पार्टी में चले जाने की स्थिति में व्यक्तिगत मतदाता के वोट की पवित्रता का क्या होगा. ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जब जनप्रतिनिधियों ने उस राजनीतिक पार्टी में शामिल होकर दल-बदल किया, जिसके खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ा था. इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या दल-बदल करने वाले जनप्रतिनिधि वास्तव में जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं. यह स्थिति तब और भी गंभीर हो जाती है, जब हम यह पाते हैं कि चुनाव जीतने के कुछ ही दिनों में या कुछ सप्ताहों के भीतर ही दल-बदल हो जाता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में हाल की घटनाओं में देखा गया.


दल-बदल विरोधी कानून को बने 41 वर्ष हो चुके हैं. वर्ष 2003 में इसमें एक संशोधन किया गया था, जब एक-तिहाई की शर्त को हटाकर दो-तिहाई कर दिया गया था. मेरा मानना है कि इस कानून को और प्रभावी बनाने के लिए किन बदलावों की आवश्यकता है, इस पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए. यह भी सोचा जा सकता है कि क्या इस कानून में ऐसा कोई प्रावधान होना चाहिए कि जैसे ही कोई निर्वाचित प्रतिनिधि दल बदले, तो उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त हो जाये और उस सीट पर उपचुनाव अनिवार्य हो. इससे नेताओं में व्यक्तिगत लाभ या हित के लिए दल-बदल करने की प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकता है. निश्चित रूप से यह आसान निर्णय नहीं होगा, लेकिन इस पर विचार तो किया ही जा सकता है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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