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पाकिस्तान के साथ अमेरिका की गलबहियां, पढ़ें प्रभु चावला का आलेख

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पाकिस्तान के साथ अमेरिका की गलबहियां, पढ़ें प्रभु चावला का आलेख
ट्रंप और मुनीर

America ties with Pakistan : कुछ घटनाएं इतिहास में दो बार घटित होती हैं: पहली बार कॉमेडी के रूप में और दूसरी बार प्रहसन के रूप में. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को दोनों रूपों में देखा गया है. रियलिटी टीवी के मेजबान से टैरिफ तानाशाह बने ट्रंप ने विगत 30 जुलाई को भारतीय निर्यात पर 25 फीसदी टैरिफ का आर्थिक बम फोड़ा, दूसरी ओर लगातार वह झूठ बोलते रहे कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम करवाया है. नयी दिल्ली की पीठ में छुरा भोंकने के एवज में उन्होंने इस्लामाबाद से दोस्ती की. उन्होंने जो आर्थिक कदम उठाये हैं, वे अमेरिका के नहीं, खुद उनके हित में हैं.

पाकिस्तानी जनरल सैयद आसिम मुनीर अहमद शाह के साथ ट्रंप की सुनियोजित साजिश कायरता में लिपटी है, जो भारत को दु:स्वप्नों के पुराने दौर में ले गयी है. वर्ष 1971 के बांग्लादेश युद्ध को याद कीजिए, जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने भारत को धमकाने के लिए एयरक्राफ्ट कैरियर यूएसएस इंटरप्राइज भेज दिया था. मगर इंदिरा गांधी टस से मस नहीं हुई थीं. इतिहास उन्हें याद रखता है, जो मुश्किल दौर में भी अपनी रीढ़ तनी हुई रखते हैं. इस बार इतिहास खुद को प्रहसन के रूप में नहीं, चेतावनी के रूप में दोहरा रहा है. लाल टाई वाले ट्रंप निक्सन ही हैं और अमेरिका फिर पाकिस्तान के साथ खड़ा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार अमेरिका टैरिफ और ट्वीट्स के साथ पाकिस्तान के साथ खड़ा है, जबकि भारत पहले की तरह अपने रुख पर अडिग है.


पिछले सप्ताह ट्रंप ने अमेरिका में 87 अरब डॉलर के भारतीय निर्यात पर टैरिफ मिसाइल दागी, जिससे उसके महत्वपूर्ण कारोबारी साझेदार भारत को सात अरब डॉलर के घाटे की आशंका है. विगत फरवरी से अब तक ट्रंप ने आठ बार कहा है कि भारत अमेरिकी उत्पादों पर बहुत ज्यादा शुल्क लगाता है. और अब तो रूस और भारत की अर्थव्यवस्थाओं को मृत बताकर उन्होंने अति ही कर डाली है. ट्रंप ने एक कहानी यह भी बनायी कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है. उन्होंने यह भी दावा किया कि भारत अमेरिका के साथ बगैर टैरिफ के व्यापार करने पर सहमत हो गया है, जिसका विरोध जयशंकर ने यह कहते हुए किया कि किसी सौदे पर सहमति तभी बन सकती है, जब वह दोनों पक्षों के लिए लाभकारी हो. नये अमेरिकी टैरिफ मोदी और ट्रंप के बीच बने भरोसे की दोस्ती के विरुद्ध हैं, जो 2017 में व्हाइट हाउस में ट्रंप-मोदी की गलबहियों, 2020 में अहमदाबाद में नमस्ते ट्रंप के आयोजन और फिर मोदी के अमेरिकी दौरे के जरिये विकसित हुई थी.

वर्ष 2024 में द्विपक्षीय व्यापार 120 अरब डॉलर तक पहुंच गया था. विगत फरवरी में ट्रंप के जवाबी टैरिफ से बचने के लिए मोदी ने टैरिफ में कटौती की पेशकश की थी और 2030 तक आपसी व्यापार को बढ़ाकर 500 अरब डॉलर तक ले जाने की बात कही थी. लेकिन पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान ट्रंप का रवैया बदल गया. अमेरिकी राष्ट्रपति झूठे ही यह श्रेय ले रहे हैं कि उन्होंने भारत-पाक संघर्ष रुकवाया. उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में हुई बहस का जवाब देते हुए कहा कि किसी विदेशी नेता ने भारत को निर्देश नहीं दिया.


ट्रंप की देहभाषा, मुनाफाखोरी की प्रवृत्ति और बीमार मानसिकता का झूठ उन्हें लोकतंत्र के संरक्षक के बजाय वैश्विक दादा ही ज्यादा साबित करता है. और उनकी नीति अमेरिका फर्स्ट की नहीं, ट्रंप फर्स्ट की है. पाकिस्तान की तरफ उनका झुकाव आतंक के ढांचों को नयी ताकत दे रहा है. इससे 1970 के दौर की अमेरिकी नीति की पुनरावृत्ति हो रही है: भारत को अलग-थलग करो, पाकिस्तान से दोस्ती गांठो और शांति बहाली का बहाना करो. लेकिन आज का भारत दब्बू देश नहीं है. यह करीब 3.9 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र और ग्लोबल साउथ की आधारशिला है. भारत के 1.4 ट्रिलियन डॉलर का बाजार और ग्लोबल साउथ का नेतृत्व अमेरिकी राष्ट्रपति के टैरिफ वार के निशाने पर है. मोदी के ‘2047 में विकसित भारत’ का लक्ष्य स्वायत्तता मांगता है, किसी की अधीनता नहीं. अंकटाड के मुताबिक, ट्रंप के टैरिफ विकासशील देशों को अंतत: क्षेत्रीय गठबंधनों की ओर ले जायेंगे. भारतीय फार्मास्युटिकल्स और कपड़े एशिया व यूरोप का रुख कर सकते हैं. ट्रंप के तेवर की ग्लोबल साउथ में तीखी प्रतिक्रिया हो सकती है तथा भारत के नेतृत्व में ब्रिक्स देश अमेरिकी वर्चस्ववाद के खिलाफ खड़े हो सकते हैं. अकेला भारत नहीं, ब्रिक्स भी उभर रहा है, आसियान पूरे घटनाक्रम पर नजर रखे हुए है और यूरोप नये सिरे से चीजों को समायोजित कर रहा है. अगर ट्रंप का यह रवैया जारी रहा, तो भारत ब्रिक्स के साथ रिश्ते मजबूत करेगा और अमेरिका को एक महत्वपूर्ण दोस्त के खोने का अफसोस करना पड़ेगा.


ट्रंप की टैरिफ धोखाधड़ी कूटनीति के वेश में उन पर भरोसा करने वालों को धोखा देने की दुष्प्रवृत्ति है. ट्रंप का तर्क है कि भारत उनके हर्ले डेविडसन और हैम पर भारी शुल्क लगाता है. ट्रंप के दुस्साहसी रवैये से भले उनकी मजबूत छवि बनी हो, लेकिन उन्होंने भारत, जापान, कनाडा, यहां तक कि नाटो से भी अपने रिश्ते खराब कर लिये हैं. ट्रंप के झूठ और टैरिफ से उनका साम्राज्य भले मजबूत हो रहा हो, लेकिन यह दोस्तों के साथ धोखा है. उनके आर्थिक प्रसारवाद ने चौदह देशों पर 25 से 40 फीसदी तक टैरिफ लगाया है. ट्रंप के निरंकुश तौर-तरीकों के कारण अमेरिकी मदद से संचालित शिक्षाविदों, प्रशासनिक अधिकारियों, कॉरपोरेट दिग्गजों और संभ्रांत सामाजिक कार्यकर्ताओं के वे अंतरराष्ट्रीय समूह कमजोर पड़ सकते हैं, जो दुनियाभर के प्रमुख आर्थिक और कूटनीतिक फैसलों को प्रभावित करते हैं. वाशिंगटन को नयी दिल्ली का संदेश यह होना चाहिए कि भारत को दबाया, खरीदा या धमकाया नहीं जा सकता. अपने 1.4 अरब उपभोक्ताओं और 120 अरब डॉलर के व्यापारिक दांव वाला भारत सम्मान का अधिकारी है. मोदी की संसदीय विजय भारत की दृढ़ इच्छाशक्ति के बारे में बताती है. मोदी की यह जीत उस विजेता को आखिरकार मात देगी, जिसकी दगाबाजी वैश्विक स्थिरता को खतरे में डाल रही है. इसलिए श्रीमान ट्रंप, निक्सन की भूमिका निभाते रहिए. लेकिन कृपया मत भूलिए कि भारत की स्मृति क्षणिक नहीं है. भारत प्रतिरोध करता है. वह उठ खड़ा होगा और जब वैश्विक अस्थिरता की यह धूल जम जायेगी, तब दुनिया को दिखाई पड़ेगा कि कौन दोस्त था और कौन धोखेबाज.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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