[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion हरदम रुपैया-पैसा!

हरदम रुपैया-पैसा!

0
हरदम रुपैया-पैसा!

रविभूषण, वरिष्ठ साहित्यकार

ravibhushan1408@gmail.com

शीर्षक का पहला शब्द प्रमुख है- ‘हरदम’. ‘रुपया’ को ‘रुपैया’ कहने की अर्थ-ध्वनि में एक प्रकार की हिकारत है. रुपैया-पैसा जीवन में महत्वपूर्ण है, पर हरदम नहीं. छह दशक से भी पहले की एक कहानी ‘तीसरी कसम’ (फणीश्वरनाथ रेणु) के अंत में हीराबाई ने हिरामन के ‘दाहिने कंधे पर’ हाथ रख कर और अपनी थैली से रुपये निकालते हुए कहा था- ‘एक गरम चादर खरीद लेना.’ रुपये से चादर खरीदी जाती है, पर ‘मन’? ‘प्रेम’? कबीर ने कहा था- ‘प्रेम न बाड़ी उपजे, प्रेम न हाट बिकाय / राज परजा जेहि रुचै, सीस देई ले जाय.’ हीराबाई ने इसके पहले भी खाने के लिए पैसे देना चाहा था. हिरामन का जवाब था, ‘बेकार मेला-बाजार में हुज्जत मत कीजिए. पैसा रखिए.’ हिरामन को रुपये-पैसे से अधिक मोह क्यों नहीं है?

‘तीसरी कसम’ कहानी द्वितीय पंचवर्षीय योजना (1956-61) के पहले वर्ष में लिखी गयी थी, जो संशोधित रूप में पटना से प्रकाशित ‘अपरंपरा’ में प्रकाशित हुई थी. पहली योजना से यह एकदम भिन्न थी. पहली योजना में ‘कृषि’ पर ध्यान था. इसमें सार्वजनिक क्षेत्र के विकास और तीव्र औद्योगीकरण पर बल था. भारत में औद्योगिक पूंजी के विकास में इसका महत्व है. ‘पूंजी’ के इतिहास में औद्योगिक पूंजी के पहले की अवस्था वाणिज्यिक पूंजी की है. कहानी में ‘महाजन’, ‘सौदागर’, ‘व्यापारी’ और ‘कंपनी’ का उल्लेख है. ‘महाजन’ और ‘सौदागर’ में अंतर है. महाजनी पूंजी और सौदागरी पूंजी भी एक नहीं है.

‘महाजन’ रुपये का लेन-देन करनेवाला साहूकार है और ‘सौदागर’ तिजारत करनेवाला व्यापारी है. प्रेमचंद के यहां ‘महाजन’ है और रेणु के यहां ‘सौदागर’ भी है. जमाना बदल रहा है. बदले जमाने की समझ हिरामन को है, पर वह जमाने के साथ नहीं है. भारत आज नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में है और यह व्यवस्था अब प्रश्नांकित है. कहानी में हिरामन दो बार ‘जा रे जमाना’ कहता है. कहानी के आरंभ में महाजन का मुनीम है, अंत में सौदागर. हीराबाई कहती है- ‘महुआ घटवारिन को सौदागर ने जो खरीद लिया है.’ रेणु समयानुसार बदलती अर्थव्यवस्था को देख-समझ रहे थे. कहानी में ‘सौदागर’ स्त्री को खरीद रहा है.

स्त्री पण्य पदार्थ हो रही है. महुआ घटवारिन को ‘सौदागर’ ने उसकी सौतेली मां से खरीदा था. महुआ का नाव से पानी में छपाक से कूदना उसका प्रतिरोध है. महुआ घटवारिन की कथा में सौदागर ने महुआ को ‘बाल पकड़ कर घसीटा’ था. सौदागर की ऐसी निर्दयी मानसिकता सौदागरी-प्रथा में सदैव नहीं रह सकती थी. हीराबाई को जिस सौदागर ने खरीदा, वह अधिक समझदार है. अब सौदागर का मैनेजर है और कंपनी की देखभाल मैनेजर के जिम्मे है. भारत में जो ईस्ट इंडिया कंपनी आयी थी, उसके मालिक यहां नहीं आये थे. ईस्ट इंडिया कंपनी से आज की बहुराष्ट्रीय कंपनियों तक कंपनी का एक ही प्रकार का रूप, रंग व ढंग नहीं रहा है.

‘तीसरी कसम’ में तीन कंपनियां हैं. दो नौटंकी कंपनी हैं और एक सर्कस कंपनी है. कहानी में कई बार ‘कंपनी’ की चर्चा है. सर्कस कंपनियों और नौटंकी कंपनियों में अंतर है. एक ओर ‘कंपनी’ की औरत को ‘पतुरिया’ और ‘रंडी’ कहनेवाले लोग हैं और दूसरी ओर ‘कंपनी’ की औरत को ‘सिया-सुकुमारी’ समझनेवाले भी. कंपनी एक, औरत एक, पर उसके संबंध में दृष्टियां भिन्न हैं. बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वागत में पलकें बिछानेवाले भी हैं और इसे भारत की नयी गुलामी से जोड़नेवाले भी हैं. ‘तीसरी कसम’ में एक ओर ‘पैसे-पैसे का हिसाब जोड़ने वाला’ पलटदास है और दूसरी ओर पैसे को सब कुछ न समझनेवाला हिरामन भी.

यह नोट करना चाहिए कि कहानी में धुन्नीराम और लहसनवां ने पलटदास को ‘छोटा आदमी’ और ‘कमीना’ कहा है. हमेशा रुपये-पैसे में जीनेवाले को भारतीय समाज में ‘बड़ा आदमी’ कभी नहीं माना गया. उसे ‘कमीना’ कहना, पूरी पूंजीवादी व्यवस्था को दी जानेवाली गाली है. जमाना बदल रहा है, रेणु की नजर तीखी है. उनमें बदले जमाने के प्रति न कोई आकर्षण है, न कोई सम्मोहन. कहानी में ‘बक्सा ढोने वाला आदमी… कोट-पतलून पहन कर साहब बन गया है.

’ एक कंपनी छोड़कर दूसरी कंपनी में जाना आज बहुत साधारण बात है. जहां आर्थिक लाभ हो, वहां सब जा रहे हैं. समाज बदल रहा है, संस्कृति बदल रही है. हीराबाई मथुरा कंपनी छोड़कर रौता कंपनी में बैलगाड़ी से आयी थी. अब वह ट्रेन में सवार होकर फिर मथुरा कंपनी में लौट रही है. ‘मैं फिर लौट कर जा रही हूं मथुरा मोहन की कंपनी में. अपने देश की कंपनी है.’ आज अपने देश की कंपनी छोड़कर विदेश की कंपनी में नौकरी करनेवालों की संख्या बढ़ रही है.

कंपनी की औरत पर कब तक विश्वास किया जाए? हिरामन दो बार कहता है- ‘कंपनी की औरत, कंपनी में गयी.’ ‘तीसरी कसम’ का यह पाठ आज के संदर्भ में अधिक महत्वपूर्ण है. हिरामन के ‘चित्त में वित्त का वास’ (बीस-पच्चीस वर्ष पहले इसी समाचार पत्र में इस पक्तियों के लेखक का स्तंभ) नहीं है. कहानी में एक साथ बैलगाड़ी और ट्रेन हैं. अब तो महामारी भी हवाई यात्रा से पहुंचती है. हीरामन ने क्या सिर्फ हीराबाई से ही कहा था- ‘हरदम रुपैया-पैसा! रखिए रुपैया!’ या वह हम सबसे कह रहा है?

ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel