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Home Opinion स्मृति शेष : रंगमंच के बेजोड़ शिल्पकार थे आलोक चटर्जी

स्मृति शेष : रंगमंच के बेजोड़ शिल्पकार थे आलोक चटर्जी

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स्मृति शेष : रंगमंच के बेजोड़ शिल्पकार थे आलोक चटर्जी
आलोक चटर्जी

Alok Chatterjee : रतीय रंगमंच ने छह जनवरी, 2025 को रंगमंच के एक महान शिल्पकार ‘आलोक चटर्जी’ को खो दिया. वे रंगमंच के एक बेहतरीन अभिनेता, निर्देशक और शिक्षक थे. ‘डेथ ऑफ ए सेल्समेन’ और ‘नटसम्राट ‘ जैसे प्रतिष्ठित नाटकों के लिए प्रसिद्ध आलोक चटर्जी ने भारतीय रंगमंच को एक नयी ऊंचाई पर पहुंचाया. कला के प्रति उनके समर्पण ने न केवल दर्शकों का दिल जीता, बल्कि अगली पीढ़ी के कलाकारों को भी प्रेरित किया.


मध्य प्रदेश में जन्मे आलोक चटर्जी ने 1987 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी), नयी दिल्ली से स्नातक की उपाधि प्राप्त की. छात्र जीवन में ही अपने अद्वितीय अभिनय कौशल के कारण एनएसडी में सबका ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया. मीता वशिष्ठ और दिवंगत अभिनेता इरफान खान उनके सहपाठी रहे हैं. एनएसडी से स्नातक करने के बाद आलोक चटर्जी ने थिएटर की दुनिया में अपने सफर की शुरुआत की. उन्हे अभिनय की गहराई और भावनात्मक मजबूती के लिए जाना जाता था. उन्होने ‘ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम’ और बंशी कौल द्वारा निर्देशित ‘अंधा युग’ जैसे नाटकों में अपनी बहुमुखी प्रतिभा का प्रदर्शन भी किया.


एक अभिनेता और निर्देशक के रूप में सफल होने के साथ-साथ आलोक चटर्जी एक बेहतरीन शिक्षक भी थे. उन्होने पुणे के फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, एनएसडी और मुंबई स्थित अनुपम खेर के एक्टर प्रिपेयर्स में छात्रों को पढ़ाया. बाद के वर्षों में उन्होने भोपाल के मध्य प्रदेश नाट्य विद्यालय (एमपीएसडी) में बतौर शिक्षक के रूप में काम किया. उसके बाद इसी नाट्य विद्यालय के निर्देशक भी बने. उनके छात्र उन्हें शिक्षण कार्यों के दौरान बाहर से कठोर लेकिन अंदर से दयालु गुरु के रूप में याद करते हैं, जिन्होनें उन्हे अपनी पूरी क्षमता से रंगमंच के गुणों को खोजने के लिए प्रेरित किया. उनके छात्रों के अनुसार, ‘आलोक चटर्जी सर वॉइस एंड स्पीच विषय को बहुत सरल ढंग से समझाते थे और अभिनय विषय के बहुत अच्छे शिक्षक थे.’ उनके पास रंगमंच के ज्ञान का वृहद भंडार था. रंगमंच के किसी भी विषय पर वह लंबी ज्ञानवर्धक बातचीत करने की क्षमता रखते थे और साथ ही उस विषय के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश भी डालते थे.


आलोक चटर्जी का मानना था कि शहरों में नाटकों का अभ्यास करने के लिए रिहर्सल स्पेस की बहुत कमी है और जो हैं, उनका किराया इतना अधिक है कि आम रंगकर्मी उसका खर्चा नहीं उठा सकता. इसलिए वह किसी भी खाली स्पेस को नाटक के हिसाब से रिहर्सल स्पेस में परिवर्तित करने पर जोर देते थे, चाहे वह पार्क हो, नदी का किनारे या कोई और जगह हो. पर वह इस बात को भी स्वीकार करते थे कि कभी-कभी इन स्पेस की अपनी सीमा भी होती है, खासकर तब जब किसी वास्तविक नाटक का अभ्यास हो रहा हो और उस दौरान अगल-बगल से गाड़ियों का शोर आ रहा हो, तब रिहर्सल में अभिनेताओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. आलोक चटर्जी अपने फेसबुक अकाउंट के माध्यम से ‘अलोकनामा’ नामक वीडियो एपिसोड भी पोस्ट किया करते थे. जिसमे वह रंगमंच से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखते थे. उन्होंने ‘दोस्त ‘ नाम से एक थिएटर ग्रुप की भी स्थापना की थी.


आलोक चटर्जी को 2019 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. यह सम्मान रंगमंच में उनके उत्कृष्ट योगदान का प्रमाण है, जिसने भारतीय रंगमंच को समृद्ध किया. आलोक चटर्जी के निधन से भारतीय रंगमंच में जो खालीपन आया है, उसे भरना मुश्किल होगा, पर उनकी विरासत उनके छात्रों, उनके नाटकों और उनके द्वारा प्रेरित लोगों के माध्यम से जीवित रहेगी. वे केवल अभिनेता, निर्देशक नहीं थे, बल्कि एक कहानीकार भी थे, जिन्होने मंच को अपनी भावनाओं और जीवन के जटिल पहलुओं को चित्रित करने के लिए कैनवास बनाया. इस महान नायक को विदाई देते हुए हम उनकी कला और रंगमंच में योगदान का जश्न मनाते हैं. आलोक चटर्जी हमेशा भारतीय रंगमंच के इतिहास में एक प्रेरणा स्तंभ के रूप में याद किये जायेंगे. उनकी प्रतिभा और समर्पण का प्रकाश सदैव चमकता रहेगा.

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