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Home Opinion प्लास्टिक संधि पर सभी देशों को एकजुट होना चाहिए

प्लास्टिक संधि पर सभी देशों को एकजुट होना चाहिए

प्लास्टिक संधि पर सभी देशों को एकजुट होना चाहिए

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) के अनुसार, प्रति मिनट एक ट्रक प्लास्टिक कचरा समुद्र में समाहित हो जाता है. ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में प्लास्टिक की हिस्सेदारी 3.4 प्रतिशत से अधिक है. दुनियाभर में सृजित प्लास्टिक कचरे का मात्र 10 प्रतिशत ही रिसाइकिल किया जा सकता है. इसमें पाये जाने वाले रसायन मानवीय एवं पर्यावरणीय सेहत के लिए काफी खतरनाक बताये गये हैं. प्लास्टिक पर जरूरत से अधिक निर्भरता ने जैव विविधता पर ग्रहण लगा दिया है.

ऐसे में संयुक्त राष्ट्र संघ की पहल पर प्लास्टिक प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि को अंतिम रूप देने का प्रयास हो रहा है. अप्रैल के 23 से 29 तारीख के बीच कनाडा की राजधानी ओटावा में प्लास्टिक संधि को लेकर चौथे दौर की वार्ता भले ही बेनतीजा रही, पर उम्मीद की जा रही है कि वर्ष के अंत में दक्षिण कोरिया के बुसान शहर में इसके अंतिम मसौदे पर मुहर लग जायेगी.

वर्ष 2015 के पेरिस समझौते के बाद प्लास्टिक संधि पर्यावरण संरक्षण के लिए सबसे अहम अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता मानी जा रही है. यूएन के विशेषज्ञ समूह ने 2017 में प्लास्टिक प्रदूषण से निजात पाने के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि की सिफारिश की थी. पिछले आठ वर्ष से अलग-अलग वार्ताओं में इसके मसौदे पर बहस जारी है. प्लास्टिक संधि के कुछ प्रावधानों पर दुनिया दो खेमों में बंट गयी है. संधि में तकरार का सबसे बड़ा मुद्दा धरती को जहरीला बनाने वाले प्लास्टिक के उत्पादन में कटौती से जुड़ा है.

एक तरफ हाई एंबीशन कोएलिशन (एचएसी) है, जिसने प्लास्टिक प्रदूषण से निजात पाने में कचरे के निस्तारण के साथ इसके उत्पादन को सीमित करने की वकालत की है. दूसरी ओर ग्लोबल कोएलिशन फॉर सस्टेनेबल प्लास्टिक समूह है. इस समूह में भारत समेत रूस, ईरान, सऊदी अरब, चीन, क्यूबा और बहरीन जैसे देश शामिल हैं. इन देशों का कहना है कि विकासशील देशों के लिए प्लास्टिक उत्पादन में बाध्य होकर कटौती करना व्यावहारिक नहीं है.

यह समूह प्लास्टिक जनित प्रदूषण से निपटने के लिए स्वैच्छिक कदमों को प्रोत्साहित करने वाली संधि का पक्षधर है. इसमें प्लास्टिक के वैज्ञानिक निस्तारण के लिए तकनीक और वित्तीय आदान-प्रदान को वरीयता देने की मांग की गयी है. एशिया-पैसिफिक देशों का समूह इस मुद्दे पर एक राय रखता है. अफ्रीकी देशों के समूह ने भी बहुपक्षीय कोष बनाने की वकालत की है.

प्लास्टिक संधि के अंतिम मसौदे को मंजूरी न मिल पाने के पीछे अमेरिकी अड़चन भी वजह बनी है. दुनिया में सबसे अधिक प्लास्टिक खपत करने वाले अमेरिका की दलील है कि प्लास्टिक संधि पेरिस समझौते की तरह स्वैच्छिक बने. यानी देशों को प्लास्टिक जनित कार्बन प्रदूषण कम करने का लक्ष्य मिले. यहां उल्लेखनीय है कि अमेरिका पांच प्रतिशत से भी कम प्लास्टिक रिसाइकिल कर पाता है. प्लास्टिक उत्पादन का सीधा संबंध तेल और गैस उद्योग से जुड़ा है. इसमें इस्तेमाल होने वाले अहम पदार्थ कच्चे तेल एवं नेचुरल गैस से हासिल किये जाते हैं. इसी कारण पेट्रोकेमिकल लॉबी के साथ जीवाश्म ईंधन पर निर्भर देश प्लास्टिक संधि के सख्त प्रावधानों के खिलाफ हैं.

पेट्रोकेमिकल उद्योग के प्रतिनिधियों की मांग है कि प्लास्टिक के उत्पादन में कटौती की जगह उसकी रिसाइक्लिंग और वस्तुओं की डिजाइनिंग को टिकाऊ बनाया जाए. प्लास्टिक जनित प्रदूषण अब जिस स्तर पर पहुंच चुका है, ऐसी स्थिति में कड़े फैसले लेने ही होंगे. प्लास्टिक के उत्पादन में कटौती अहम विकल्प हो सकता है, परंतु विकासशील देशों के रोजगार परिदृश्य और उनकी सामाजिक परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा. प्लास्टिक संधि यदि अस्तित्व में आती है, तो दुनियाभर में सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा. प्लास्टिक के उत्पादन में कटौती हो, पर बेहतर होगा कि यह स्वैच्छिक और आम सहमति से हो. विकासशील देश प्लास्टिक के विकल्पों पर निवेश बढ़ा सकें, इसके लिए उन्हें तकनीक और आर्थिक सहयोग देना टाला नहीं जा सकता. यदि विकासशील और छोटे देशों को वित्तीय मदद और रिसाइक्लिंग टेक्नोलॉजी उपलब्ध हो, तो प्लास्टिक संधि कहीं अधिक कारगर होगी.

विकासशील देशों को भी प्लास्टिक कचरे के स्थायी समाधान के लिए विकल्पों की ओर बढ़ना होगा. भारत ने प्लास्टिक प्रदूषण पर रोक लगाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में कई नीतिगत कदम उठाये हैं. सिंगल यूज प्लास्टिक पर प्रतिबंध भी इनमें से एक है, परंतु ऐसी हर कवायद कुछ दिन चलने वाले अभियान और कागजों में कैद होकर रह जाती है. इपीआर (एक्सटेंडेड प्रोडक्शन रिस्पॉन्सबिलिटी) जैसी योजनाओं को यदि पारदर्शिता और सख्ती से लागू किया जाए तो इसके बेहतरीन परिणाम देखने को मिलेंगे. प्लास्टिक से पैदा होने वाले किसी भी कचरे का समाधान उपभोक्ता जागरूकता पर निर्भर करता है. पिछले कुछ वर्षों में भारत जिस तरह पर्यावरण अनुकूल जीवनशैली का अगुआ बनकर सामने आया है, ऐसे समय में प्लास्टिक जनित प्रदूषण पर रोक लगाने की दिशा में हमारे पास एक बड़ा अवसर है.           (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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