यही वजह है कि वह अब उठ करके खड़ा हो रहा है और आधुनिक तकनीकी हथियारों (सोशल मीडिया) से सबका मुकाबला कर रहा है. यह समझनेवाली बात है कि जब दलितों को न्याय नहीं मिलेगा, तो न्याय पाने का राजनीति ही केवल रास्ता नहीं है, बल्कि दूसरे बहुत से रास्ते भी हैं, जिनके जरिये वे न्याय पाने की कोशिश करेंगे. हालांकि, भीम सेना का जिस भावना के साथ उभार हुआ है, उसके लंबे समय तक बने रहने पर संदेह है, क्योंकि भावनाअों का बहुत जल्दी शमन हो जाता है. जिस प्रकार से दलित समाज को हाशिये पर डाला गया है, वह ऐसी भावनाओं के प्रस्फूटन का कारण तो बनेगा ही.
इस मामले में कांग्रेस बेहतर थी- कांग्रेस में लोकसभा स्पीकर दलित था, संस्कृति मंत्री दलित था, यूजीसी का चेयरमैन भी दलित रहा, कांग्रेस ने कई विश्वविद्यालयों के वाइस चांसलर दलितों को बनाया था, योजना आयोग में भी दलितों को जगह दी थी. लेकिन, इस मामले में भाजपा बिल्कुल ही दलित विरोधी है, यहां तक कि शेड्युल कास्ट आयोग भी खाली पड़ा हुआ है. यह हाशिये की पराकाष्ठा है, जो भाजपा दलित राजनीति के नाम पर कर रही है. भाजपा केवल दलितों का वोट लेना जानती है, उनको प्रतिनिधित्व देना नहीं. इसका प्रमाण यह है कि भाजपा में एक भी दलित प्रवक्ता नहीं है.
