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पाकिस्तान का पैंतरा

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कुलभूषण जाधव की फांसी पर रोक लगाने के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के फैसले पर पाकिस्तान की प्रतिक्रिया देख कर यही कहा जा सकता है कि ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’.
पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के सलाहकार सरताज अजीज और गृह मंत्री चौधरी निसार खान ने इस प्रकरण में पाकिस्तानी कानून को प्राथमिकता देने की बात कही है. भारत और पाक दोनों ही वियेना कंन्वेंशन के हिस्से हैं और उनके बीच ऐसे मसलों के लिए द्विपक्षीय करार भी हो चुका है. अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पाक की दलीलों को खारिज कर चुका है तथा भारत की शिकायत पर भी मुहर लगा दी है. कुलभूषण जाधव के खिलाफ पाकिस्तान के पास सिर्फ एक ‘सबूत’ है, और वह है जाधव का जबरिया लिया गया इकबालिया बयान.
यह तो न्याय की बुनियादी जरूरत है कि आरोपित को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका दिया जाना चाहिए, पर पाकिस्तान एक भारतीय नागरिक को महज बदले की भावना में अंधे होकर मार देने पर उतारू है. सरताज अजीज और निसार खान के बयान अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में हार पर खीझ का नतीजा हैं. उन्हें ऐसी गैरजिम्मेवाराना बात कहने से पहले न्यायालय के अंतिम फैसले का इंतजार करना चाहिए था. अभी मामले की सुनवाई बाकी है. पाकिस्तानी मीडिया और जानकारों का एक बड़ा हिस्सा न्यायालय में पाकिस्तान की कमजोर दलील पर सवाल उठा चुका है.
कुलभूषण प्रकरण में पाकिस्तान न सिर्फ न्याय के स्थापित सिद्धांतों और प्रचलित व्यवहारों की अवहेलना कर रहा है, बल्कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय और संस्थाओं के प्रति असम्मान भी प्रदर्शित कर रहा है. हालांकि पाकिस्तान के इतिहास को देखते हुए उसका यह रवैया अचंभित नहीं करता है. एक तरफ वह आतंकवाद के विरुद्ध खड़े वैश्विक समुदाय का हिस्सा होने का दावा करता है, पर दूसरी तरफ दक्षिण एशिया में आतंकी संगठनों को समर्थन और संसाधन भी मुहैया कराता है. भारत-पाक सीमा और नियंत्रण रेखा पर वह लगातार युद्ध-विराम का उलांघन करता है. आतंकियों की घुसपैठ उसकी शह पर होती है. उसने अनेक भारत-विरोधी तत्वों को अपने यहां शरण दे रखा है.
भारत के अकाट्य सबूतों को वह नकारता रहता है. जाधव को न्याय दिलाना एक बड़ी चुनौती है, परंतु अब तक की घटनाएं हमारी उम्मीदों को हौसला देने के लिए काफी हैं. कुलभूषण मामले में उसके निंदनीय पैंतरे पर अंकुश लगाने के लिए न्यायिक लड़ाई के साथ कूटनीतिक दबाव की भी दरकार है. पाकिस्तान को अलग-थलग करने की भारतीय कोशिशों को तेज करते हुए बड़े देशों को भरोसे में लेने की जरूरत है.
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