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सरकार के लक्ष्य बदलने की वजह

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पवन के वर्मा
लेखक एवं पूर्व प्रशासक
विपक्षी नेताओं में नीतीश कुमार संभवत: पहले ऐसे नेता थे, जिन्होंने नोटबंदी के पीछे की मंशा का समर्थन किया. कोई भी सरकार अगर कालाधन और भ्रष्टाचार को कम करने के लिए कोई कदम उठाती है, तो उसे इसके लिए कम-से-कम संशय का लाभ तो मिलना ही चाहिए. हालांकि, जदयू की तरफ से बराबर यह बात कही जाती रही कि इतने बड़े कदम के लिए तैयारी नाकाफी रही. यह भी कहा गया कि कालेधन पर नकेल के लिए इसके बाद बेनामी संपत्ति, सोना-चांदी और विदेशों से आनेवाले बेहिसाब नकदी पर चोट जरूरी है.
दिलचस्प है कि अब सरकार खुद अपने लक्ष्य को बदल रही है. इससे पहले आठ नवंबर को प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि विमुद्रीकरण कालेधन की समानांतर अर्थव्यवस्था पर चोट करेगी, इससे फर्जी नोट प्रचलन से बाहर होंगे और आतंकियों को होनेवाली फंडिंग व कालेधन के बीच बना रिश्ता टूटेगा. उन्होंने यह कभी नहीं कहा कि इस कार्रवाई का मकसद डिजिटल अर्थव्यवस्था की रचना है.
मकसद में इस बदलाव की वजह क्या है? यदि सरकार की यही मंशा थी कि नकदी लेनदेन को कम या खत्म किया जाये, तो इसके लिए विमुद्रीकरण के जरिये कुल मुद्रा के 86 फीसदी को प्रचलन से बाहर करना कहीं से भी बेहतर योजनागत विकल्प नहीं था. बेहतर यह होता कि बैंकिंग व्यवस्था को पहले दुरुस्त कर लिया जाता और इस दौरान लोगों को भी लेनदेन में नकदी के कम इस्तेमाल के फायदे के प्रति जागरूक किया जाता.
ऐसे देश में जहां बैंकिंग नेटवर्क खासतौर पर ग्रामीण इलाकों में सघन नहीं है और जहां नकदी में काफी सारा ईमानदार लेनदेन चलता है, अचानक नोटबंदी का फैसला किसी आपदा को न्योतने जैसा है. देश में करीब दो लाख एटीएम हैं, जिनमें महज 37 हजार ग्रामीण अंचलों में हैं. आलम यह है कि ग्रामीण भारत में लोगों के पास या तो बैंक खाते ही नहीं हैं या फिर उन्हें बैंक शाखाओं तक जाने के लिए चलना पड़ता है. यही नहीं, असंगठित क्षेत्र में काम करनेवाली बड़ी आबादी रोज मिलनेवाली नकद दिहाड़ी पर निर्भर है. ऐसे में विमुद्रीकरण जैसी कार्रवाई लोगों की परेशानी ही बढ़ायेगी.
यह समझना दिलचस्प है कि सरकार ने क्यों नोटबंदी को बदले लक्ष्य के साथ जोड़ कर देखना शुरू किया. इसमें कोई संदेह नहीं कि नकदी के प्रचलन को कम करने से भ्रष्टाचार कम करने में मदद मिलेगी. मैंने इस बात को पहले भी कहा और फिर दोहराता हूं कि हमारे जैसे देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे मारक कार्रवाई तकनीक का निष्पक्ष हस्तक्षेप है. पर, वित्तीय लेनदेन को पारदर्शिता की तरफ ले जाना एक प्रक्रिया है, जिसके लिए समयबद्ध योजना की दरकार है, न कि विमुद्रीकरण जैसे त्रासद फैसले की.
असल में सरकार के नोटबंदी के लक्ष्य को बदलने के पीछे बड़ी वजह यह है कि इसको लागू कराने में तमाम स्तर पर कई कमियां-विफलताएं सामने आयीं. सिवाय इसके कि आम लोगों, खासतौर पर किसानों-मजदूरों की परेशानी बढ़ाने के, इस कार्रवाई से बड़े पैमाने पर कालाधन बाहर निकालने का सरकार का लक्ष्य भी नहीं सधा.
हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, नोटबंदी के जरिये प्रचलन से बाहर किये गये 15.5 लाख करोड़ रुपये में से 13 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोट बैंकों में वापस जमा हो चुके हैं. अभी दिसंबर आखिर तक का समय बचा है. साफ है कि बड़े पैमाने पर कालेधन को सफेद करने का जुगाड़ काम कर रहा है, जबकि इसके उलट अपनी गाढ़ी कमाई के महज कुछ हजार रुपयों के लिए लोग कतारों में लगे हैं.
हालात को देखते हुए ही सरकार ने भी पूरे देश में आयकर के छापे तेज किये हैं. इससे कर चोरी के जरिये जमा किये गये तीन-चार लाख करोड़ रुपये को बाहर निकाल कर सरकार दिखायेगी कि यह नोटबंदी का हासिल है.
पर, इससे न तो रिजर्व बैंक को सरकार को कोई बड़ी राशि सौंपने में मदद मिलेगी और न ही सरकार को अपनी कल्याणकारी योजनाओं के लिए धन मिलेगा. कुछ धन कर जुर्माने और वीडीएस स्कीम के जरिये जरूर मिलेंगे, पर बाकी मामलों को कानूनी तौर पर निपटाना थकाऊ प्रक्रिया है. इसमें भी ले-देकर कुछ हजार करोड़ रुपये भले सरकार के हाथ लग जायें, पर इसके एवज में सरकार ने एक लाख करोड़ रुपये नये नोटों की छपाई और उसे बाजार में लाने में पहले ही खर्च कर दिये हैं.
संक्षेप में यह कि कालेधन के खिलाफ प्रधानमंत्री मोदी की यह कार्रवाई गलत आकलन और कमजोर क्रियान्वयन के कारण एक विफल कदम साबित होने जा रही है. इस कार्रवाई से बड़ा नुकसान भी हुआ है.
आम लोग तो लगातार तकलीफ उठा ही रहे हैं. इससे उत्पादन, उपभोग और विकास में कमी के कारण अर्थव्यवस्था पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा. सरकार को नोटबंदी के इस हासिल की समझ भलीभांति है. इसलिए उसने इसके लक्ष्य को बदल कर कैशलेस अर्थव्यवस्था की रचना कर दी. भाजपा नेतृत्व भले इसे अपना चालाक पैंतरा माने, लेकिन देश की जनता सब कुछ बखूबी समझ रही है और समय आने पर वह इसे जाहिर भी करेगी.
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