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ओह! एक और ”निर्भया”

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अपराजिता मिश्रा

सामाजिक कार्यकर्ता

एक और बेटी को ‘निर्भया’ की मौत मरनी पड़ी. ‘निर्भया’ शब्द भले ही अदम्य साहस एवं संघर्ष का एहसास कराता हो, लेकिन क्या निर्भया की नियति ही लड़कियों की नियति है? पिछले दिनों, रांची की घटना ने हमें पुनः उसी चौराहे पर खड़ा कर दिया है, जहां स्त्रियां अपने को असुरक्षित, मजबूर एवं हारी हुई महसूस कर रही हैं. इस निर्मम घटना में वहशियों ने न सिर्फ एक लड़की के साथ बालात्कार किया, बल्कि हत्या कर उसे जला भी दिया.

हमें नहीं भूलना चाहिए की ये दरिंदे हमारे घरों से ही थे, हमीं ने उन्हें जन्म दिया, पाला-पोसा, लेकिन एक जिम्मेवार इंसान नहीं बना सके. आखिर हम किस समाज में रह रहे है, जहां काम-वासना से वशीभूत हो हम क्रूरता की सारी हदों को पार कर जाते हैं? हम किस विकास और प्रगति की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जहां आधी आबादी अपने को असुरक्षित महसूस करती हो?

इस घटना ने यह सोचने पर मजबूर किया है कि आज लड़कियां घरों के अंदर भी महफूज नहीं हैं. एक तरफ हम नारी स्वतंत्रता एवं समानता का दंभ भरते नहीं थक रहे, दूसरी तरफ रोज लड़कियां निर्भया की मौत मर रही हैं. इन घटनाओं ने सेक्स एजुकेशन, नारीवादी सोच एवं आंदोलनों तथा महिला सशक्तीकरण के सारे दावों को धता बताते हुए हमें इस बात पर सोचने के लिए मजबूर किया है कि क्या भारत की स्त्रियों की नियति में निर्भया होना ही है?

बुद्धिजीवियों एवं वैज्ञानिकों ने सेक्स को एक जैविक जरूरत बताया है, पर सवाल है कि क्या इस जरूरत को नारी-शरीर का शोषण कर ही बुझाया जा सकता है? यह कैसी काम-कुंठा है, जो किसी को अमानुषिक कष्ट पहुंचा कर ही बुझायी जा सकती है? प्यास लगने पर, किसी पुरुष को नाली का पानी तत्काल प्यास का साधन मानते नहीं देखा गया है, तो फिर सेक्स की भूख को मिटाने के लिए इतनी क्रूरता क्यों?

पिछली घटनाओं की तरह इस घटना की भी जांच होगी, आयोग बिठाये जायेंगे, किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को जिम्मेवार ठहराते हुए उन्हें उम्र कैद या मौत की सजा होगी. नारीवादी संगठन खुश होंगे एवं एक-दूसरे को शाबाशी देंगे. लेकिन क्या हम यह सुनिश्चित कर पायेंगे कि अब कोई और बेटी निर्भया नहीं होगी? अब डर लगने लगा है ‘निर्भया’ शब्द से. हमें तो हमारी सीधी-साधी बेटियां ही दे दो, जो सुकून से सांस ले सकें, अपने सपनों को जी सकें.

सवाल है कि कैसे यह शिकार-शिकारी का खेल बंद हो. क्या नये एवं सख्त कानूनों को बनाने से ही या नारी अधिकारों की नयी व्याख्या से हम उस समाज को बना पायेंगे, जहां लड़कियां उन्मुक्त होकर जी सकेंगी? क्या शिक्षा से इसे खत्म किया जा सकता है? क्या शिक्षा के द्वारा एक लड़की को इन अमानवीय एवं अमानुषिक मनोवृत्ति के खिलाफ खड़ा किया जा सकता है?

समस्या के मूल एवं गहराई को समझे बिना शायद ही हम इसका निदान खोज पायें. आज जरूरत समाज की सोच एवं मानसिकता में बदलाव लाने की है.

इन घटनाओं की धुरी नि:संदेह पुरुषों की पितृत्ववादी सोच, पुरुष प्रभुत्व, श्रेष्ठता एवं सेक्स के प्रति उनके नजरिये को जिम्मेवार ठहराती हों, पर इसमें हमारी सामाजिक भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता.

सेक्स यदि शारीरिक जरूरत है, तो इसके सही समय की जानकारी भी जरूरी है. कानून यदि सख्त है, तो सबूत मिटाने का प्रेरक भी इन घटनाओं को क्रूर रूप दे रहा है. आज जरूरत है ऐसे समाज के निर्माण की, जहां स्त्रियों एवं पुरुषों के बीच कोई दीवार न हो. आज जरूरत है पुरुषों को स्त्रियों के प्रति अपने नजरिये को बदलने की.

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