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साइबर सुरक्षा की चिंताएं

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सबसे सुरक्षित लगता समय सबसे असुरक्षित दौर भी हो सकता है. डिजिटल होते भारत की सच्चाई इस उलटबांसी के बहुत करीब है. कंप्यूटर, लैपटॉप, टैबलेट, स्मार्टफोन जैसे संचार-संवाद के नये उपकरण, कई तरह के इंटरनेटी सर्च इंजन, सोशल मीडिया जैसे इंटरनेटी मंच या फिर हमारा-आपका डेबिट कार्ड-क्रेडिट कार्ड, सब-के-सब अपनी बनावट में बहुमुखी हैं. वे सिर्फ संवाद गढ़ने, भेजने या फिर सत्यापित करने के तुरंता साधन भर नहीं, बल्कि हमारे द्वारा व्यवहार की जा रही सूचनाओं का भंडारघर भी हैं. सूचना के उपकरणों पर किया जा रहा हर बरताव एक अदृश्य स्मृतिलेख बन कर उसमें दर्ज होता रहता है.

स्मृतियों के इस भंडारघर तक किसी अनाधिकृत के पहुंचने का अर्थ है आपकी निजी और सार्वजनिक जीवन की हर गतिविधि का उजागर हो जाना. ऐसा होते ही वित्तीय लेन-देन, इ-मेल का पुलिंदा और सोशल-मीडिया की अभिव्यक्तियां सब कुछ किसी और की मुट्ठी में चला जाता है. वह आपके संवाद को बदल सकता है, उसमें हेराफेरी कर आपकी साख को चोट पहुंचा सकता है, आपके शत्रु को भेज सकता है और इस तरह सार्वजनिक सुरक्षा के तंत्र में सेंध लगा सकता है. दर्ज सूचनाओं का इस्तेमाल आपके बैंक-खाते से रकम उड़ाने से लेकर ब्लैकमेल करने तक में किया जा सकता है. हालिया शोध बताते हैं कि डिजिटल होते हमारे कार्य-व्यवहार में सेंधमारी की घटनाएं बढ़ी हैं. नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो के मुताबिक, बीते एक दशक में साइबर क्राइम की घटनाओं में 26 गुना बढ़ोतरी हुई है. कुछ दिन पहले ही 32 लाख से ज्यादा डेबिट कार्ड की सूचनाएं एटीएम के जरिये ऑनलाइन करतब से चुरा ली गयी थीं. ऑनलाइन सेंधमारी के आगे और बढ़ने की आशंका है.

एसोचैम के एक अध्ययन के मुताबिक, बढ़ते डिजिटल लेन-देन के बीच ऑनलाइन फर्जीवाड़े में तकरीबन 65 फीसदी की बढ़त हो सकती है. हर अभिव्यक्ति और गतिविधि को एक संख्या या संख्याओं के खास समीकरण में बदल कर अदने से उपकरण में संचित करते हमारे समय की सबसे बड़ी जरूरत साइबर सुरक्षा है. सरकार को चाहिए कि वह इस जरूरत के मद्देनजर हर मोर्चे यानी बुनियादी ढांचे के विस्तार तथा वैधानिक संरचना में बदलाव से लेकर लोगों को जागरूक बनाने तक के अपने मिशन की गति को तेज करे.

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