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उत्सव में डूबे गांव-घर

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गिरींद्र नाथ झा
ब्लॉगर एवं किसान
यह उत्सव का महीना है. दीवाली के बाद भाईदूज और छठ की बारी है. खेतों से पकी धान की बालियां दुआर तक पहुंच चुकी हैं. दरअसल, किसान के लिए उत्सव के मायने फसल ही रहे हैं. अच्छी फसल मतलब शानदार उत्सव!
दीवाली की सुबह जब शहरों-महानगरों में लोगबाग प्रदूषण का रोना रोते हैं, तब मुझे गांव सबसे अधिक खींचता है. गांव-घर में पटाखों और फूलझड़ियों के बारूदों की गंध माटी की खुश्बू में खो जाती है. पोखर से आती स्वच्छ हवा प्रदूषण से हमें बचाती है. दीवाली के बाद की सुबह मुलायमियत होती है, उसकी वजह है ठंड का प्रवेश. दिन की धूप धान की बालियों की तरह लगती, एकदम मुलायम.
अब छठ की तैयारी शुरू हो चुकी है. गांव के बड़े तालाब के आसपास का माहौल पवित्रता का बोध कराता है. हमारे लिए छठ का अर्थ बचपन से ही धीरे-धीरे सर्द होती रात और ओस-ओस पिघलती सुबह रही है. दीवाली से लेकर छठ तक साफ-सफाई का माहौल बना रहता है. घर-दालान, आंगन-दुआर की लिपाई-पुताई होती रहती है. मंदिर से लेकर कुओं और गौशालों तक दीये जलते रहते हैं. यही वजह है कि इन दिनों हमारे गांव उल्लास और उमंग में डूबे हुए हैं.
उत्सव के इस महीने में सर्दी ने भी दस्तक दे दी है. खेतों को आलू और मक्का के लिए तैयार किया जा रहा है. ऐसे में खेत भी उत्सव के मूड में आ चुके हैं. धान की कटाई के बाद खेतों को अगली फसल के लिए सजाया जा रहा है, जैसे हमने दीवाली की शाम आंगन-दुआर को दीपों से सजाया था.
दीवाली की शाम हमने प्रकृति की पूजा की. गाम के सबसे पुराने बरगद पेड़ के नीचे हर किसी ने दीये जलाये. दीये की रोशनी से बूढ़ा बरगद भी उत्सव के मूड में आ गया था. जूट की खेती से पटसन बेचने के बाद जो संठी हमें मिलता है, उसका उपयोग भी दीवाली की शाम किया गया. अंगरेजी के ‘इको-फ्रेंडली’ शब्द का जिस तरह से पर्यावरण प्रेमी अपने लेखों में प्रयोग करते हैं, वह गांव में हमेशा से होता रहा है. आदिवासी टोले की दीवाली में तो हर चीज खेत की होती है, बाजार से कुछ भी खरीदा नहीं जाता है.
आदिवासी टोले में तीन दिन दीवाली मनायी जाती है. पहले दिन घरों की रंगाई-पुताई होती है. रात को मशाल रैली निकाली जाती है और गोबर के दीप जलाये जाते हैं. दूसरे दिन बहन-बेटियों सहित अन्य मेहमान आ जाते हैं. भोजन में दाल-चावल और मीठे को विशेष पकवान का दर्जा प्राप्त है. इस दिन पारंपरिक वाद्य यंत्रों ढोल, मांदल व बांसुरी का पूजन भी होता है और पूरी रात नाच-गाना किया जाता है. तीसरा दिन पशुधन पूजन के लिए तय है. इस दौरान आदिवासी समाज के लोग अपने घरों को खूबसूरत पेंटिंग से सजाते हैं.
इसके लिए वह सिर्फ प्राकृतिक तरीकों से प्राकृतिक रंगों का ही इस्तेमाल करते हैं. दीवारों को सजाने के लिए जंगली जानवर और पेड़-पौधों के चित्र बनाये जाते हैं.
आदिवासी समाज से हम काफी कुछ सीख सकते हैं. प्रकृति से प्रेम करना कोई संथालों से सीखे. मैंने तो इन्हीं से प्रकृति की गोद में इठलाना सीखा है. वैसे तो किसानी समाज में हर महीने में ही उत्सव समाया है, लेकिन अक्तूबर से लेकर दिसंबर तक हमेशा कुछ खास होता रहा है.
दीवाली के बीत जाने के बाद अब हम सब प्रकृति से सबसे नजदीक छठ पूजा की तैयारी में लग गये हैं. पोखर के आसपास की सफाई में सब जुट चुके हैं. दरअसल, गांव-घर की दुनिया हमें सामूहिकता का भी पाठ पढ़ाती है. हम सब यहां मिल कर उत्सव मनाते हैं. कोई एक अकेला आदमी कुछ नहीं करता, सब मिल कर करते हैं.
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