-हरिवंश-
इस पुस्तक को उन्होंने लिखा 170 से 180 ई के बीच. ग्रीक में. ‘सेल्फ इंप्रूवमेंट’ (आत्म प्रगति) और ‘गाइडेंस’ (मार्गदर्शन) के लिए. जे.एस.मिल ने कहा, यह मारकूस के जीवन का निचोड़ और वेदवाक्य हैं. पहली बार 1558 में ज्यूरिक में यह छपी. वेटिकन लाइब्रेरी में एक पुरानी प्रति बची है. इसे शुरू से ही सरकारों, शासकों और आमजनों के लिए बहुमूल्य, महान और जरूरी साहित्य माना गया. मारकूस बार-बार कहते हैं, वर्तमान ही सब कुछ है. भविष्य के गर्भ में सब कुछ खत्म हो जाता है. समा जाता है. पर गौर करिए, आपसी द्वेष, ईर्ष्या, दुश्मनी और आशंका में बहुमूल्य जीवन के कितने अंश नष्ट होते हैं… और अंतत: ये सब चीजें भी लुप्त हो जाती हैं.
खत्म हो जाती हैं. दफन हो जाती हैं. वह मानते हैं, निरंतर इच्छाएं, स्थायी निराशा और दुख के मूल्य हैं. इस पुस्तक के लिए अंग्रेजी में कहा गया है, जिसका हिंदी पाठ हो सकता है, ‘उत्कृष्ट लहजे में अनंत प्रवृतियों का वर्णन’. द रिपब्लिक में प्लेटो ने कहा है, देश या मुल्क कभी खुश नहीं हो सकते, जब तक वहां शासक, दार्शनिक नहीं होते या दार्शनिक शासक नहीं बनते. मारकूस ने जीवन जीने की कला के सुझाव दिये हैं. अंतर्दृष्टि दी है. मुसीबत की घड़ी के लिए व्यावहारिक सुझाव दिये हैं. वह प्रैक्टीकल आइडियोलिस्ट दिखते हैं. गांधी की तरह. समाज में खुशी-खुशी साथ रहने, काम करने की तरकीबें बताते हैं. शासकों के लिए. दार्शनिकों के लिए भी. सामान्य लोगों के लिए भी. भारतीय मानक के अनुसार यह राजर्षि परंपरा की पुस्तक है.
राजर्षि यानी राजा जो ऋषि हो. भारत की यह परंपरा पुरानी रही है. राजगोपालाचारी ने एक जगह कहा है, राज चलानेवालों में जिज्ञासा नचिकेता जैसी हो, संकल्प ध्रुव जैसा हो, विश्वास प्रहलाद जैसा हो. बाद में राजा छल, कपट और धूर्तता का प्रतीक बन गया. तब भारत में कहा जाने लगा ‘राजान्ते नरक:’ यानी राजा को अंत में नरक में ही जाना है. इसलिए राजा के यहां का अन्न ग्रहण करना संन्यासी परंपरा में वर्जित था. राजा को आरंभ में उदात्त मानव मूल्यों का प्रतीक माना गया. यह उस दौर की पुस्तक है, जब निकिता खुश्चेव का यह कथन कि राजनेता वे होते हैं, जो उन जगहों पर पुल बनाने का वादा करते हैं, जहां नदियां ही नहीं होतीं, का मानस नहीं था. पश्चिमी मुहावरे में कहें तो मैक्यावेली और गांधी का द्वंद भी नहीं था.
गांधी जिन्होंने साधन और साध्य को एक माना. मैक्यावेली जिसने साध्य ही महत्वपूर्ण माना. इसके लिए छल, कपट और षडयंत्र को पावन साधन माना. वोल्टायर को याद करें, तो जीवित समस्त लोंगो के हम ऋणी हैं और इस धरती से विदा ले गये लोगों से भी. पर हम (मानव जात) सिर्फ और सिर्फ सच के प्रति संपूर्ण ऋणी हैं. यह पुस्तक एक शासक राजा, जो सव के प्रति ऋणी है, की कृति है. पुस्तक के 12 खंड हैं. छोटे-छोटे. पहले खंड में मारकूस ने उन सभी दार्शनिकों, गुरुओं और अग्रजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है, जिनसे उसने कुछ भी सीखा. जाना.
क्या राजकाज चलाने के लिए जानकारों की जरूरत नहीं होती? ऐरे – गैरों से काम चल सकता है? (साभार : पतझर में टूटी पत्तियां, लेखक – रवींद्र केलेकर). सुकरात की इसी परंपरा में पले बढ़े मानकूस. उन्हें पढ़ते हुए यक्ष और युधिष्ठिर के संवाद याद आते हैं. यक्ष के इतने कम, संक्षिप्त और दो टूक सवाल और युधिष्ठिर के सधे, छोटे, मार्मिक और आंख खोल देनेवाले जवाब. पुस्तक में मानव जीवन के बारे में मारकूस की टिप्पणी है, जिसका हिंदी तर्जुमा कुछ इस तरह होगा.
