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कुप्रबंधन का शिकार भारतीय रेलवे

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कुप्रबंधन का शिकार भारतीय रेलवे
अरविंद कुमार सिंह
वरिष्ठ पत्रकार एवं पूर्व सलाहकार, भारतीय रेलवे
कुछ समय पहले पूर्वोत्तर भारत की लमडिंग बदरपुर रेल परियोजना का उद्घाटन रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने रिमोट से दिल्ली से किया. रिमोट से उद्घाटित होनेवाली यह पहली परियोजना नहीं है, बल्कि रेल मंत्री अधिकतर परियोजनाओं का उद्घाटन इसी विधि से करते रहे हैं.
अगर रेल मंत्री जनता के बीच जाकर उसके सरोकारों से जुड़ता है, तो उसे नयी जानकारियां मिलती हैं और शिकायतों का निस्तारण होता है. सुरेश प्रभु ने रेल मंत्री बनने के बाद आम मुसाफिरों की सुविधाओं से लेकर काफी काम किया है, लेकिन सच्चाई यह भी है कि रेलवे पहले से कहीं अधिक चुनौतियों से घिर रहा है.
संदेह नहीं कि भारतीय रेलवे इस देश की जीवन रेखा है. कम किराये में रोज ढाई करोड़ से अधिक मुसाफिरों को गंतव्य तक पहुंचानेवाला भारतीय रेलवे माल ढुलाई में भी अमेरिका, चीन और रूस के साथ एक बिलियन टन के विशिष्ट क्लब में शामिल हो चुका है.
विश्व की सबसे बड़ी रेल प्रणाली भारतीय रेलवे 17 क्षेत्रीय और 68 मंडलों में विभक्त है. यह रोज औसतन 19,710 गाड़ियां चलाता है, जिसमें 12,335 सवारी गाड़ियां हैं. रेलवे परिसंपत्तियों को बदलने के साथ यात्री व माल यातायात के बेहतर संचालन के लिए जो किया जाना था, नहीं किया गया है. इसलिए रेलवे में भारी अराजक स्थिति है. रेलगाड़ियों का समयपालन बिगड़ रहा है और खान-पान की गुणवत्ता, सेवाएं प्रभावित हो रही हैं.
भारतीय रेलवे का दुर्भाग्य है कि यह कई वर्षों से तमाम रेल मंत्रियों की प्रयोगशाला बन गया है.जितने मंत्री आते हैं, उनमें कई अपने तरीके से नये प्रयोग करते हैं. लोक लुभावनी घोषणाएं करते हैं. सुरक्षा के खतरों को जानते हुए नयी गाड़ियां चला देते हैं. इस नाते सवारी गाड़ियों का घाटा हर साल बढ़ता जा रहा है. आठ हजार से ज्यादा रेलवे स्टेशनों में 58 स्टेशनों की सालाना आय 50 करोड़ रुपये से ज्यादा है. स्टेशनों की आमदनी के लिहाज से उनको सात श्रेणियों में बांटा हुआ है. लेकिन, सबसे नीचे के 4,274 स्टेशनों के साथ 77 प्रतिशत छोटे स्टेशनों पर अभी भी बुनियादी सुविधाओं का भारी अभाव है.
रेल मंत्री ने बजट में भावी योजनाओं के लिए चार लक्ष्यों के साथ पांच साल की कार्ययोजना तय कर 8 लाख 56 हजार करोड़ रुपये से अधिक निवेश का ताना-बाना बुना, ताकि नेटवर्क विस्तार, आधारभूत संरचना का विकास और बेहतर यात्री सुविधाएं खड़ी की जा सकें. इसके लिए पीपीपी से लेकर विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक और दूसरे दरवाजे खटखटाये गये. पांच साल में डेढ़ लाख करोड़ रुपये के कर्ज की प्रतिबद्धता एलआइसी ने की है. रेलवे को इससे सालाना 30,000 करोड़ रुपये मिलेंगे. नये उपायों को लेकर शंकाएं हैं और माना जा रहा है कि रेलवे कर्ज में फंसने जा रहा है.
2016-17 में सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने से रेलवे पर वेतन और पेंशन बिल में सालाना 40 हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ने जा रहा है. अपने संसाधनों के बूते रेलवे वेतन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की दशा में नहीं है. वहीं यात्री सेवाओं पर बढ़ते घाटे ने उसकी कमर तोड़ दी है.
इन संकटों से उबरने के लिए उसे भारी राशि चाहिए. रेलवे ने वित्त मंत्रालय से जो मदद मांगी थी, वह खारिज हो चुकी है. छठे वेतन आयोग के लागू होने के बाद रेलवे की भयावह वित्तीय स्थिति किसी से छिपी नहीं रही है. 1950 के बाद से भारतीय रेल में यात्री और माल परिवहन 16 गुना बढ़ा है. वहीं रेल लाइनों का विस्तार 25 फीसदी से भी कम हुआ है.
उसके सामान्य कार्यकारी व्यय बढ़ते हुए 1.05 लाख करोड़ रुपये से अधिक पर आ गये हैं. ईंधन की लागत भी बढ़ कर 28,767 करोड़ रुपये सालाना तक पहुंच गयी है, लेकिन आमदनी उस रफ्तार से नहीं बढ़ी है. इस पर ध्यान देने के बजाय बुलेट ट्रेन पर रेलवे 98,000 करोड़ रुपये की लागत लगाने जा रहा है. जापान सरकार 81 प्रतिशत परियोजना लागत वहन करेगी. यह भी कर्ज ही है, जिसके साथ 30 प्रतिशत उपकरण जापानी कंपनियों से खरीदने की शर्त जुड़ी हुई है.
आज रेल परिसंपत्तियों पर भारी दबाव है और लंबित परियोजनाओं के लिए करीब पांच लाख करोड़ रुपये से अधिक की जरूरत है.
अकेले प्राथमिकता के कामों के लिए 2.08 लाख करोड़ की रकम चाहिए. बढ़ते मुसाफिरों की जरूरतों के लिहाज से नेटवर्क विस्तार बेहद जरूरी है. वित्तीय तंगी से रेल पथ नवीकरण तक में लगातार कमी आ रही है और अभी भी 5,300 किमी रेलपथ पर नवीकरण किया जाना है. लेकिन, चालू साल में लक्ष्य केवल 2,500 किमी का रखा गया है.
एक बड़ी चिंता रेलवे में कर्मचारियों की संख्या का लगातार घटते जाना है. 1991 में 18.7 लाख रेल कर्मचारी थे, जो अब घट कर 13 लाख से कम हो गये हैं. दो लाख पचासी हजार पद खाली पड़े हैं, जिसमें से डेढ़ लाख तो बेहद जरूरी संरक्षा श्रेणी से हैं. रेलवे सुरक्षा बल में भी काफी पद खाली हैं. रेलगाड़ियां बढ़ रही हैं और स्टाफ घट रहा है, जिससे अव्यवस्थाएं और बढ़ रही हैं.
यात्री सेवाओं की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है. साफ-सफाई, समयपालन, संरक्षा, टर्मिनलों की गुणवत्ता, गाड़ियों की क्षमता, यात्रियों की सुरक्षा गंभीर मसले हैं. पीपीपी के जरिये निजी निवेश से सेवाओं की गुणवत्ता को बेहतर बनाने की दिशा में खास प्रगति नहीं हो पायी. निजी क्षेत्र के लिए रेल डिब्बों और कोचिंग डिपो की मशीनी धुलाई और साफ-सफाई के ठेके दिये गये
खान-पान का बड़ा हिस्सा निजी कंपनियों के पास चला गया, लेकिन इससे शिकायतें और भी बढ़ती जा रही हैं. पचास-साठ के दशक में विभागीय खान-पान सेवा आरंभ की गयी थी, लेकिन 1992 से नीति बदलते हुए कहा गया कि आगे विभागीय सेवा नहीं खुलेगी. आज देश की तमाम लंबी दूरी की गाड़ियों में कैटरिंग सेवा नहीं है. रेलवे की 212 जोड़ी गाड़ियां 1,000 किमी से अधिक सफर करती हैं, जिसमें मुसाफिरों को घर से खाना ले जाना पड़ता है.
इसी तरह रेलवे की आरक्षण सेवाओं में सुधार तो हुआ है, लेकिन अनारक्षित श्रेणी के मुसाफिरों के लिए आज भी रेल का सफर आसान नहीं है. मध्य वर्ग की दुश्वारियां तो कम हुई हैं, लेकिन टिकट काउंटरों पर आम लोगों की भीड़ कम होने का नाम नहीं ले रही है.
एक बड़ी चुनौती अभी भी सुरक्षा और संरक्षा की है. हालांकि, रेलवे का दावा है कि सुरक्षा और संरक्षा मद में भारी सुधार आया है.
साल 2002 में जो दुर्घटनाएं 0.44 प्रति मिलियन ट्रेन किमी थी, वो घट कर अब 0.13 हो गयी हैं. लेकिन यह संरक्षा रिकाॅर्ड भी पूर्व रेल मंत्री नीतीश कुमार के कार्यकाल में सृजित 17,000 करोड़ रुपये की संरक्षा निधि की बदौलत हासिल हुई. आज कब, कौन गाड़ी शिकार बन जाये, कहा नहीं जा सकता है. खराब ट्रैक, असुरक्षित डिब्बे और बरसों पुराने बने रेलवे पुलों के साथ रेलवे कैसे सुरक्षित यात्रा का दावा कर सकता है.
हमारी ज्यादातर ट्रेनें बिना पहरेदार के चलती हैं. पांच सालों में यात्रियों के खिलाफ आपराधिक घटनाओं में 15 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. आरपीएफ रोज 2,200 और जीआरपी रोज 1,275 गाड़ियों की पहरेदारी कर रही है, लेकिन कई राज्यों में अपराध बढ़ते जा रहे हैं. किसी भी पक्ष की तरफ ध्यान दिया जाये, भारतीय रेल में अव्यवस्था बढ़ रही है, जिससे निपटने के लिए कई स्तर पर बड़े प्रयास की जरूरत है.
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