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Home Opinion झारखंड में पेट्रोल-डीजल महंगा करने का मामला: पढ़े प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा की टिप्पणी

झारखंड में पेट्रोल-डीजल महंगा करने का मामला: पढ़े प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा की टिप्पणी

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झारखंड में पेट्रोल-डीजल महंगा करने का मामला: पढ़े प्रभात खबर के वरिष्ठ संपादक अनुज कुमार सिन्हा की टिप्पणी
अनुज कुमार सिन्हा

झारखंड सरकार ने हाल में कुछ कड़े फैसले लिये हैं. इनमें कुछ लोकप्रिय हैं (जैसे सी-सैट को खत्म करने का), तो कुछ अप्रिय-कठोर भी हैं, जिनका सीधा असर आम लोगों पर पड़नेवाला है. ऐसा ही एक फैसला है – झारखंड में वैट को फिक्स कर पेट्रोल-डीजल का दाम बढ़ाने का. झारखंड कैबिनेट का फैसला है.

इसे जिस दिन से लागू किया जायेगा, पूरे झारखंड में पेट्रोल 4.54 रुपये और डीजल 4.21 रुपये महंगा हो जायेगा. इस फैसले के बाद झारखंड में ट्रांसपोर्टिग के नाम पर हर चीज का दाम बढ़ेगा, टेंपो किराया बढ़ेगा, बस भाड़ा बढ़ेगा यानी आम जनता बोझ तले दबेगी. तेल का दाम जब बढ़ता है, तो व्यापारी, बस-ऑटो मालिक अपनी जेब से पैसा नहीं भरते, हर चीज का दाम बढ़ा कर जनता से वसूल लेते हैं, लेकिन जब तेल का दाम घटता है, तो बढ़े किराया कम नहीं किया जाता. यानी दोनों ओर से आम जनता पर मार पड़ती है. इसे नियंत्रित करने का मैकेनिजम नहीं है. कोई देखनेवाला नहीं है. झारखंड की जनता पहले से तबाह है, पीड़ित है. यह वह राज्य है, जहां मुख्यमंत्री कहते-कहते थक गये, लेकिन सिस्टम सुधर नहीं रहा. वे समस्याओं का हल निकालने के लिए समय तय करते हैं, लेकिन जिन्हें यह काम करना है, वे अफसर नहीं करते. ऐसी ही घटनाओं से सरकार की फजीहत होती रही है.

पहले बात हो पेट्रोल-डीजल पर. पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल सस्ता हो रहा है और झारखंड में महंगा. यह फार्मूला किसी की समझ में नहीं आ रहा. अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमत घटते-घटते 46-47 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गयी है. सितंबर 2014 में क्रूड ऑयल का दाम लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल था. यानी ठीक एक साल पहले की तुलना में आज दाम आधा से कम हो गया है.

जब दाम घटा, तो केंद्र ने एक्साइज डय़ूटी बढ़ा कर और राज्य सरकार ने वैट बढ़ा कर इसका पूरा लाभ आम जनता को लेने नहीं दिया. आंकड़े बताते हैं कि जिस पेट्रोल को झारखंड में अभी 60 रुपये (लगभग) में बेचा जा रहा है, उसका बेस प्राइस सिर्फ 29.28 रुपये है. केंद्र ने उस पर 17.46 रुपये प्रति लीटर का एक्साइज टैक्स लगा रखा है. जब तेल का दाम अंतरराष्ट्रीय बाजार में घटने लगा, तो राज्य ने भी वैट बढ़ा कर 22 फीसदी कर दिया. इससे एक लीटर में राज्य को 10.50 रुपये मिलने लगे, लेकिन राज्य को इतने से संतोष नहीं हुआ. अब पेट्रोल पर 15 रुपये और डीजल पर 12.50 रुपये वैट लगेगा. जनता की जेब काटने से जो आय होगी, उससे सरकार का खजाना भरेगा. इससे स्पष्ट है कि सरकार मौजूदा दर से कम पर पेट्रोल-डीजल नहीं बेचने देगी. यह सही है कि राज्य चलाने के लिए पैसा चाहिए और यह पैसा टैक्स से ही आ सकता है. राज्य में अनेक ऐसे क्षेत्र हैं, जहां से टैक्स कम आ रहा है. राज्य में बड़े पैमाने पर टैक्स की चोरी होती है. अगर यह चोरी बंद हो गयी और वह पैसा सरकार के खजाने में आने लगे, तो बगैर अतिरिक्त बोझ दिये सरकार का राजस्व बढ़ सकता है. बेहतर होता सरकार वैसे रास्ते तलाशती.

राज्य के बेतहाशा खर्च के असली कारणों को तलाशना होगा. दबाव में सरकार ने ऐसे-ऐसे फैसले लिये हैं, जिनसे सरकार पर आर्थिक भार बहुत बढ़ गया है. हड़ताल-धरना-प्रदर्शन और घेराव कर कभी शिक्षकों ने, तो कभी दूसरे कर्मचारियों ने वेतन बढ़वाया है. उस समय इस बात पर गौर नहीं किया जाता कि यह पैसा आखिर आयेगा कहां से? समय आ गया है जब अनुत्पादक खर्च को बंद किया जाये, कम किया जाये. एक कहावत है-जितनी चादर, उतना ही पैर फैलाइये. राज्य में आमद के स्त्रोत सीमित हैं, इसलिए खर्च पर कटौती कर रास्ता निकाला जा सकता है. राज्य में विधायकों-मंत्रियों की सुविधाएं लगातार बढ़ी हैं.
करोड़ों रुपये खर्च कर विधायकों-मंत्रियों के आवास की मरम्मत होती रही है. किसी ने अंकुश नहीं लगाया. एक-एक मंत्री के साथ जो काफिला चलता है, उसमें कटौती कर खर्च कम किया जा सकता है. सिर्फ मंत्री ही क्यों, अनेक अफसर ऐसे हैं, जिनके आवास पर अथाह पैसे खर्च किये जाते रहे हैं. सुविधा बढ़ाने की कोई सीमा नहीं होती. एक आम आदमी जब गाड़ी खरीदता है, तो 8-10 साल कम से कम चलाता है, क्योंकि वह अपने पैसे से खरीदता है. झारखंड में हर साल-दो साल में मंत्रियों या बड़े अफसरों को नयी-नयी गाड़ियां चाहिए. इसकी खरीद पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं.

पहले वाली गाड़ी से भी काम चलाया जा सकता था. राज्य के बारे में सभी को सोचना होगा, खास कर जनप्रतिनिधियों को. पैसे की बर्बादी को बंद करना होगा. एक-एक बनी हुई अच्छी सड़क को फिर से बनवाया जाता है. करोड़ों रुपये बेकार जाते हैं. इन सड़कों को बनवाने में पैसे खर्च होते हैं. अच्छी सड़कों को दाेबारा बनाने की अनुमति किसने दी, किसने योजना बनायी, इसके पीछे क्या कारण हैं (कहीं पैसा कमाना तो नहीं?), इसे देखना होगा. इस प्रकार का धंधा बंद करना होगा, तभी अनावश्यक खर्च घटेगा.


राजस्व भी बढ़ सकता है, लेकिन इसके लिए अफसरों को भयमुक्त हो कर उन जगहों पर हाथ लगाना होगा, जहां अवसर है. नीतिगत फैसले सरकार को लेने होंगे. रांची जैसे बड़े शहर के मेन रोड में भी अगर किसी की जमीन-मकान हो, तो उसे सिर्फ चार रुपये प्रति कट्ठा की दर से लगान देना होता है. यानी अगर 20 कट्ठा जमीन का लगान साल भर में सिर्फ 80 रुपये देना होगा. यह मजाक है. यही हाल है शहर के बाहर की जमीन का. खेत के लगान की दर पांच रुपये से 8 रुपये प्रति एकड़ (एक साल का) है. इस पर 150 फीसदी सेस. यानी अधिकतम 20 रुपये प्रति एकड़. यह वह क्षेत्र है, जहां कठोर निर्णय लिये जा सकते हैं.

अगर खेतों पर पहले ध्यान भले न दें, तो भी शहरों की जमीन के लगान बढ़ाने के पर्याप्त कारण हैं, लेकिन किसी भी सरकार ने इसे बढ़ाने की हिम्मत नहीं की. राजनीतिक कारणों से भी. हमें सुविधा चाहिए और पैसे भी न दें, यह उचित नहीं है. 35-40 साल पहले कॉलेज में जो फीस वसूली जाती थी (लगभग 12 से 15 रुपये), आज भी वही है. झारखंड में प्रवेश करते ही चेकनाका बनाया गया है. उन जगहों से करोड़ों रुपये की वसूली होती है, लेकिन वसूली गयी बड़ी राशि सरकारी खजाने में जमा न होकर अफसरों की जेब में जाता है. अगर ये सब पैसे सरकारी खजाने में ईमानदारी से अफसर जमा करने लगे, तो राज्य के पास साधन का अभाव नहीं होगा और उसे अलोकप्रिय फैसले नहीं लेने होंगे. अब समय आ गया है, जब अफसर-सरकार राजस्व बढ़ाने के नये स्त्रोत तलाशें, न कि बार-बार पेट्रोल-डीजल का दाम बढ़ाते रहें.

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