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Home Opinion OROP : सैनिकों का सम्मान

OROP : सैनिकों का सम्मान

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यह एक अच्छी खबर है कि मोदी सरकार ने पूर्व सैनिकों की निराशा दूर कर दी है. वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) की पूर्व सैनिकों की मांग मान लेने के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर के एलान के साथ जो कुछ गलतफहमियां पैदा हुई थीं, उम्मीद करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रविवार को हरियाणा में दिये गये भाषण से दूर हो जायेंगी. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट कहा है कि वीआरएस के नाम पर जवानों में भ्रम फैलाया जा रहा है.

ओआरओपी का लाभ सिपाही, नायक सहित हर पेंशनधारी जवान को मिलेगा. इसमें सेना के नियमों के अनुसार वीआरएस लेनेवाले और अंग-भंग होने के कारण मजबूरन नौकरी छोड़नेवाले भी शामिल होंगे. इससे पहले खबर आयी थी कि वीआरएस लेनेवालों को ओआरओपी का लाभ नहीं मिलेगा. इस पर जंतर-मंतर पर आंदोलनरत पूर्व सैनिकों ने निराशा जताते हुए कहा था कि इससे 46 फीसदी पूर्व सैनिक ओआरओपी के लाभ से वंचित रह जायेंगे. प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि पूर्व की सरकार ने इसके लिए 500 करोड़ रु पये का बजट रखा था, जबकि इसमें 8 से 10 हजार करोड़ रु पये का खर्च आयेगा. इसे लागू करने के लिए एक कमिटी बनायी गयी है, लेकिन यह वेतन आयोग जैसी कोई दीर्घकालिक कमेटी नहीं होगी. उम्मीद है कि ओआरओपी के कुछ बिंदुओं पर कायम मतभेद भी यह कमेटी दूर कर लेगी. देश में करीब 25 लाख रिटायर्ड सैन्यकर्मी हैं.

इनमें बड़ी संख्या ऐसे कर्मियों की है, जो युवावस्था में ही सेवा से विमुक्त हो गये हैं और पेंशन ही उनके परिवार की जीविका का मुख्य आधार है. हालांकि पूर्व सैनिकों के लगातार संघर्ष के बावजूद, सरकारें पिछले चार दशकों से ओआरओपी की मांग टाल रही थीं. दो साल पहले, सितंबर, 2013 में, हरियाणा में ही तब भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि सत्ता में आने पर उनकी सरकार ओआरओपी पर तुरंत अमल करेगी. इससे पूर्व सैनिकों एवं उनके परजिनों में उत्साह का संचार हुआ था. आखिर यूपीए सरकार ने भी अपनी चला-चली की बेला में, फरवरी 2014 में, ओआरओपी लागू करने की घोषणा कर दी थी और इसके लिए अंतरिम बजट में 500 करोड़ रुपये का प्रावधान भी कर दिया था. अप्रैल-मई में हुए लोकसभा चुनाव में यूपीए सरकार की विदाई हो गयी. चुनाव के बाद बनी मोदी सरकार ने अपने पहले बजट में इस योजना के लिए 1000 करोड़ रुपये का प्रावधान तो किया, लेकिन योजना पर अमल न होते देख पूर्व सैनिकों ने पिछले दिनों फिर से आंदोलन शुरू कर दिया था. वैसे ओआरओपी के लिए उनका यह पहला आंदोलन नहीं था.

अच्छा हुआ कि इस बार उनका संघर्ष निर्णायक मुकाम पर पहुंचा है. ओआरओपी के संबंध में प्रधानमंत्री के स्पष्टीकरण के साथ कुछ विपक्षी दलों का यह आरोप भी खारिज हो जायेगा कि मोदी सरकार वायदे ही करती है. अब कुछ नेताओं का यह कहना भी कोरी राजनीतिक बयानबाजी ही होगी, कि सरकार ने बिहार विधानसभा चुनाव के मद्देनजर यह घोषणा की है. सेना में 1973 तक ओआरओपी की व्यवस्था थी और उन्हें आम कर्मचारियों से अधिक वेतन मिलता था. अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस सहित अनेक देशों में सैनिकों को आम सेवाओं की तुलना में अधिक वेतन और पेंशन मिल रहा है. लेकिन, 1973 में तीसरे वेतन आयोग ने सशस्त्र बलों का वेतन भी आम कर्मचारियों के बराबर कर दिया था. चूंकि सैन्यकर्मी अन्य सरकारी कर्मचारियों की तुलना में जल्दी रिटायर हो जाते हैं, इसलिए उन्होंने अपने लिए ओआरओपी के रूप में अलग पेंशन स्कीम की मांग शुरू कर दी. 2009 में संघर्ष तेज करते हुए पूर्व सैनिकों ने हजारों मेडल राष्ट्रपति को लौटा दिये थे. साथ ही, डेढ़ लाख पूर्व फौजियों ने अपने खून से हस्ताक्षर कर तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को एक ज्ञापन भी सौंपा था. सितंबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को ओआरओपी पर आगे बढ़ने का आदेश दिया था.

मई, 2010 में सेना पर बनी स्थायी समिति ने भी ओआरओपी लागू करने की सिफारिश की थी. फरवरी, 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने फिर इसे लागू करने का आदेश दिया था. इस तरह लंबे संघर्ष और खींचतान के बाद, आखिर में जब एक चुनी हुई सरकार ने इसे फिर से लागू करने की घोषणा कर दी है, उम्मीद यह भी की जानी चाहिए कि भविष्य में समीक्षा के नाम पर सरकारें या नौकरशाही इसमें गैर-जरूरी अड़ंगे नहीं लगायेगी. साथ ही इस तरह की मांग के लिए अन्य सेवाओं के रिटायर कर्मचारियों को भड़काने की राजनीति भी नहीं होगी.

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