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दशरथ मांझी और शाहजहां

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दशरथ मांझी और शाहजहां
शाहजहां की तुलना में दशरथ मांझी का जीवन अधिक प्रेरक है. दशरथ मांझी का प्रेम श्रम के सौंदर्य को प्रतिष्ठित करता है. दशरथ मांझी और शाहजहां का प्रेम भिन्न है, एक में जीवन है, दूसरे में प्रदर्शन. प्रेम जीवन से जुड़ा है, न कि प्रदर्शन से.
संभव है, यह शीर्षक कुछ को अटपटा लगे, क्योंकि बादशाह शाहजहां के नाम और काम से पूरी दुनिया परिचित है, जबकि दशरथ मांझी का नाम-काम मशहूर नहीं हुआ है. एक सम्राट और सामान्य मजदूर के बीच साम्य का कोई आधार नहीं होता. पर प्रेम हृदय की वह कोमल वृत्ति है, जो सब में विद्यमान रहती है. प्रेम से कोई वंचित नहीं है. प्रेमाभिव्यक्ति के अनेकों रूप होते हैं. रामचंद्र शुक्ल ने ‘लोभ और प्रीति’ निबंध में प्रेम को ‘हिसाब-किताब’ से परे माना है- ‘हिसाब-किताब करनेवाले भाड़े पर भी मिल सकते हैं, पर प्रेम करनेवाले नहीं.’ आज जो नेता राष्ट्र-प्रेम की बात करते हैं, वे ‘यह भी नहीं झांकते कि किसानों के झोपड़ों में क्या हो रहा है.. वे देश-प्रेम का दावा करें, तो उनसे पूछना चाहिए कि ‘बिना परिचय का यह प्रेम कैसा?’
सामंतों, राजा-महाराजाओं के प्रेम और कर्मठ-श्रमिक, सामान्यजनों के प्रेम में अंतर है. दिल्ली के मुगल वंश का पांचवां बादशाह शाहजहां मुगल सम्राटों में सर्वाधिक वैभवशाली था. सिंहासनासीन होने के तुरंत बाद उसने एक करोड़ की लागत से मयूर सिंहासन बनवाया था. आगरा 1648 ईस्वी तक उसकी राजधानी थी, जहां उसने जुमा मसजिद, मोती मसजिद, लाल किला, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास तथा ताजमहल बनावाया. 1612 ईस्वी में जब शाहजहां शहजादा खुर्रम था, उसने जहांगीर के शासन-काल में सर्वाधिक धनाढ्य और शक्ति संपन्न सरदार आसफ खां की बेटी आरजूमंद बानू बेगम से विवाह किया. विवाह के बाद आरजूमंद का नाम मुमताज महल (रनिवास का रत्न) हो गया. फरवरी 1628 में शहजादा खुर्रम शाहजहां की उपाधि धारण कर गद्दी पर बैठा. 1631 में मुमताज महल की मृत्यु प्रसव काल में हुई. उसका शव बुरहानपुर से आगरा लाया गया था, जहां शाहजहां ने उसकी कब्र पर विश्व प्रसिद्ध स्मारक ‘ताजमहल’ का निर्माण कराया.
ताजमहल शाहजहां की प्रिय बेगम मुमताज महल के मजार पर बना हुआ स्मारक है, जिसके निर्माण में 22 वर्ष (1632-1653) लगे थे. यह सौंदर्य संगमरमर और स्फटिक का है, जिसमें मनमोहक नक्काशियां हैं, कारीगरी-पच्चीकारी का बेमिसाल है. उस समय इसके निर्माण में पचास लाख रुपये खर्च हुए थे, जो अब पचास खरब से भी अधिक होंगे. हजारों मजदूरों, कारीगरों ने दिन-रात खप कर इसका निर्माण किया. ईसा नामक वास्तुकार ने इसका नक्शा बनाया था. इतालवी और फ्रांसीसी वास्तुकारों की भी ताजमहल के निर्माण में बड़ी भूमिका रही. ‘संगमरमर की इस स्वपिAल रचना’ को देखनेवालों की सदैव भीड़ लगी रहती है. पंत ने अपनी ‘ताजमहल’ कविता में इसे ‘मृत्यु का अपार्थिव पूजन’ और रवींद्र नाथ ठाकुर ने ‘एक बूंद नयने जल, कालेर कपोल तले शुभ्र समुज्‍जवल’ कहा है. साहिर लुधियानवी ने शहंशाह की मुहब्बत के साथ गरीबों की मुहब्बत की बात भी की- ‘इक शहंशाह ने बनवा कर हसीं ताजमहल/ हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मजाक.’
बिहार के गया जिले के गहलौर गांव के दशरथ मांझी को पत्नी के प्रेम में एक किलोमीटर लंबे साठ फीट ऊंचे और चालीस फीट चौड़े पहाड़ को काट कर रास्ता बनाने में 22 साल लगे. शाहजहां की पत्नी मुमताज महल को सब जानते हैं. दशरथ मांझी की पत्नी फगुनिया और पिंजरी को जाननेवालों की संख्या नगण्य है. शाहजहां के बेटे औरंगजेब से सभी परिचित हैं, पर दशरथ मांझी के बेटे भागीरथ मांझी को कोई नहीं जानता. क्या शाहजहां और दशरथ मांझी का पत्नी-प्रेम एक समान है? शाहजहां ने ‘ताजमहल’ के निर्माण में कोई श्रम नहीं किया. दशरथ मांझी ने पत्नी-प्रेम में सड़क बनायी. उसने पहाड़ काटा. ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ के निर्माता केतन मेहता ने अभी एक इंटरव्यू में कहा है कि दशरथ मांझी का प्यार ‘शाहजहां से भी ज्यादा था.’ ताजमहल तीस हजार कारीगरों की कारीगरी का नायाब नमूना है. हम उन कारीगरों के नाम नहीं जानते. दशरथ मांझी की कहानी धर्मवीर भारती से लेकर कई फिल्म निर्माताओं को अविश्वसनीय लगी थी. फिक्शन से सत्य कहीं अधिक विश्वसनीय होता है. शाहजहां ने ताजमहल के निर्माण में कोई श्रम नहीं किया. वहां वैभव-सौंदर्य है. दशरथ मांझी के यहां श्रम-सौंदर्य है. प्रेम श्रम से जुड़ कर उदात्त रूप ग्रहण करता है. दशरथ मांझी बुनियादी जरूरतों-सेवाओं से वंचित मुसहर समुदाय के थे-गरीब, भूमिहीन मजदूर. इन दिनों ताजमहल देखने के लिए टिकट कटाना जरूरी है. ताजमहल गरीबों के लिए नहीं है. दशरथ मांझी ने पहाड़ काट कर जो सड़क बनायी, उस पर चलने में कोई पैसा नहीं देना पड़ता. वह सबके लिए है. ताजमहल रात में जाया नहीं जा सकता. दशरथ मांझी द्वारा निर्मित सड़क पर चौबीसों घंटे चला जा सकता है. शाहजहां के ‘ताजमहल’ में स्मृति है. दशरथ मांझी के यहां मात्र स्मृति ही नहीं है.
‘भवानी भवई’, ‘मिर्च-मसाला’, ‘मंगल पांडे’ और ‘सरदार’ जैसी फिल्मों के बाद केतन मेहता ने दशरथ मांझी पर ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ फिल्म बनायी. इसके पहले दशरथ मांझी की ओर लोगों का ध्यान जा चुका था. पत्र-पत्रिकाओं में दशरथ मांझी के जीवन-काल में ही काफी सामग्री प्रकाशित हो चुकी थी. 360 फीट लंबा और 30 फीट चौड़ा मार्ग बनाना साधारण घटना नहीं है. इसके पीछे प्रेम का वह जुनून है, जो अब कम देखने में आता है. यह प्रेम का महान उदाहरण है-विश्व में दुर्लभ.
‘मांझी’ जैसी कहानी विश्व भर के सिनेमा में कहीं नहीं है. सड़क के अभाव में दशरथ मांझी अपनी पत्नी को अस्पताल नहीं ले जा सके थे, जिसका दर्द उन्हें जीवन भर सालता रहा. इस महीने के तीसरे सप्ताह में पहले दशरथ मांझी के जीवन पर कवि-उपन्यासकार निलय उपाध्याय का उपन्यास ‘पहाड़’ (राधाकृष्ण प्रकाशन) आया और एक सप्ताह बाद केतन मेहता की फिल्म आयी, जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी का लाजवाब अभिनय है. फिल्म में दशरथ मांझी की पहली पत्नी फगुनिया है और उपन्यास में फगुनिया की मृत्यु के बाद की पत्नी पिंजरी है.
शाहजहां की तुलना में दशरथ मांझी का जीवन अधिक प्रेरक है. पहाड़ के र्दे को काट कर रास्ता बनाने में छेनी, हथौड़ा, श्रम, हाथ सब एक साथ हैं. उपन्यास में ठीक ही इस काम को एक जगह ‘फल्गु नदी में अदहन’ देने की तरह और ‘गोड़ से सोर तोड़ने’ जैसा कहा गया है. दशरथ मांझी का प्रेम श्रम के सौंदर्य को प्रतिष्ठित करता है. दशरथ मांझी और शाहजहां का प्रेम भिन्न है, एक में जीवन है, दूसरे में प्रदर्शन. प्रेम जीवन से जुड़ा है, न कि प्रदर्शन से. हमारे समय में दशरथ मांझी का प्रेम अपने अप्रतिम रूप से ‘मार्ग’ बन कर उपस्थित है.
रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in
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