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विश्व हिंदी मेले के तीन दशक

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विश्व हिंदी मेले के तीन दशक
डॉ बुद्धिनाथ मिश्र
वरिष्ठ साहित्यकार
इस बार दसवां विश्व हिंदी सम्मेलन आगामी 10 से 12 सितंबर तक मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में होने जा रहा है. अभी तक की स्थिति से यही लगता है कि यह अब तक का सबसे विफल सम्मेलन होगा. सफल तो पिछले सम्मेलनों को भी नहीं कहा जा सकता.
अगर वे सफल होते, तो हिंदी अब तक संयुक्त राष्ट्र की भाषा नहीं बन गयी होती. यूनेस्को की अद्यतन रिपोर्ट के अनुसार, विश्व में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली 11 भाषाओं का क्रम यह है- मंदारिन चीनी, अंगरेजी, स्पेनिश, हिंदी, अरबी, बांग्ला, रूसी, पुर्तगाली, जापानी, जर्मन और फ्रेंच.
इनमें संयुक्त राष्ट्र की छह आधिकारिक भाषाएं हैं- अंगरेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, चीनी, रूसी और अरबी. इस सूची से स्पष्ट है कि संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए सर्वाधिक बोली जानेवाली भाषा का बिल्ला लगाना जरूरी नहीं है, उस राष्ट्र का विश्व राजनीति में प्रबल होना जरूरी है.
दुर्भाग्य से भारत अभी तक संयुक्त राष्ट्र में निर्णायक भूमिका में नहीं रहा है, जिसका खामियाजा भारत की राजभाषा हिंदी को भुगतना पड़ा.
विश्व हिंदी सम्मेलन की परंपरा 1975 में जब नागपुर में शुरू हुई, तो उसमें इंदिरा गांधी और सर शिवसागर रामगुलाम की उपस्थिति में पहली मांग यही उठी थी कि हिंदी को राष्ट्रसंघ की भाषा बनाने की पहल की जाये. देश को उस समय आश्वासन भी दिया गया कि इस सम्मेलन का पहला उद्देश्य यही है.
उसके बाद से एक-एक कर दस सम्मेलन होते चले गये. आठवें सम्मेलन का उद्घाटन संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क स्थित मुख्यालय में ही उसके महासचिव बान की मून ने किया था. वहां मैं भी उपस्थित था, जब बान की मून ने कहा- ‘मैं दक्षिण कोरिया का भले हूं, मगर मेरा दिल भारत में ही बसता है, क्योंकि मेरी पहली नौकरी दिल्ली में थी. भारत मुङो और मेरे परिवार को इतना भाया कि मेरी बेटी वहीं की बन कर रह गयी.
उसने वहीं शादी कर घर बसा लिया.’ स्वाभाविक है, इस पर तालियों से संयुक्त राष्ट्र का विशाल सभागार गूंज उठा. संयोजकों ने यही मान कर अपनी पीठ थपथपा ली कि चलो संयुक्त राष्ट्र के भीतर तक हिंदी को पहुंचा दिया.
उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह थे. आशा की जा रही थी कि वे उस सम्मेलन में जरूर आयेंगे, मगर वे नहीं आये, उनका संदेश लेकर विदेश राज्य मंत्री आनंद शर्मा आये.
विश्व हिंदी सम्मेलन को मेला कहते हुए मुङो खुशी नहीं हुई.जिस व्यक्ति ने अपना जीवन हिंदी की प्रगति की चिंता में व्यतीत कर दिया हो और जिसे हिंदी के छोटे से छोटे कार्य के लिए आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा हो, वह जब देखता है कि विश्व हिंदी सम्मेलन के नाम पर करोड़ों रुपये उस अफसरशाही के सैर-सपाटे पर खर्च हो रहा है, जो हिंदी के मुख्य बाधक (बल्कि बधिक!) हैं, तो कष्ट होना स्वाभाविक है.
कम से कम दो विश्व हिंदी सम्मेलन, न्यूयॉर्क और जोहांसबर्ग का मैं स्वयं प्रत्यक्ष साक्षी हूं. इनमें अधिकांश व्यक्ति सरकारी टूर पर जाते है. बहुत थोड़े-से वे हिंदी प्राध्यापक भी इसकी शोभा बढ़ाते हैं, जिन्हें छात्रों को न पढ़ाने के लिए लाख-डेढ़ लाख वेतन मिलता है.
आज से तीन दशक पहले जब अनंत गोपाल शेवड़े जी ने इस सम्मेलन की परिकल्पना की थी, तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि लोग इसे भी अपनी अय्याशी का शिकार बना देंगे.
भारत सरकार में हिंदी के कार्यान्वयन का काम गृह मंत्रलय को सौंपा गया है, जहां के राजभाषा विभाग में तदर्थ नियुक्तियों पर तैनात अधिकारियों की विशाल फौज है.
मगर वह फौज क्या काम करती है, वह कहीं दिखता नहीं. विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन का भार विदेश मंत्रलय को दिया गया है, जिसके पास न इसके लिए पर्याप्त जनशक्ति है और न ही इच्छाशक्ति.
भोपाल सम्मेलन की अब तक की स्थिति यह है कि जिस नगर में यह हो रहा है, वहां के साहित्यकारों को भी इसका पता नहीं है. सारे प्रतिभागियों को ऑनलाइन पंजीकरण के लिए वेबसाइट खुला हुआ है, मगर उसमें पंजीकरण के लिए प्रतिभागी को अंगरेजी और कंप्यूटर साइंस दोनों में पारंगत होना होगा.
हिंदी के कितने साहित्यकार इस कठिन शर्त को पूरा कर सकते हैं. एक साहित्यकार ने मुझसे झल्ला कर कहा भी कि यह पंजीकरण तो अमेरिकी वीजा लेने से भी ज्यादा कठिन है.
जिस हिंदी सम्मेलन में हिंदी के सामान्य साहित्यकार नहीं जा सकेंगे, वह सम्मेलन कैसा होगा? उसका एक चित्र यूं बनता है कि मध्य प्रदेश सरकार ने अपने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे अपने-अपने जिले से 50-50 प्रतिभागियों को भेजें.
ऐसा तो राजनीतिक दलों की रैलियों में हुआ करता है! हैरान हूं कि क्या विश्व हिंदी सम्मेलन का स्वरूप भी रैलियों जैसा हो जायेगा, जिसमें साहित्यकारों के बजाय राजनेताओं का जयकारा लगेगा?
हिंदी इस समय घर और बाहर-दोनों मोर्चो पर अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. आज सारा देश जिस कंप्यूटर का गुलाम होता जा रहा है, उसमें अंगरेजी का वर्चस्व है. भारतीय संस्कृति के उपासक योजनाकार लोग यह मान बैठे हैं कि भारत के गरीब लोग भी अंगरेजी जानते हैं.
एक ओर नासा जैसी वैज्ञानिक संस्थाएं कंप्यूटर की भाषा के रूप में संस्कृत को सर्वथा उपयुक्त मान कर अग्रिम शोध कर रही हैं. दूसरी ओर हमारे गांव-गांव में अंगरेजी के फीस-बटोरू स्कूल खुल रहे हैं. मध्य प्रदेश सरकार इस अवसर का लाभ पर्यटन के विकास में उठाना चाहती है.
इस बीच मुख्यमंत्री की एक अपील भोपालवासियों के नाम अखबारों में विज्ञापन के माध्यम से आयी है, जिसमें सभी साइन बोर्ड हिंदी में कर लेने का आग्रह किया गया है. नगर के लोग लाल परेड मैदान में लग रहे आज तक के सबसे बड़े तंबू को देख जरूर रहे हैं, मगर इसमें क्या होनेवाला है, यह उन्हें पता नहीं है.
कुछ होशियार लोगों को इतना पता लगा है कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमिताभ बच्चन आयेंगे. बस करोड़ों रुपये की लागत से हो रहे इस मेले का लब्बोलुवाब यही है.
भोपाल और उसके आसपास के साहित्यकार पांच हजार रुपये की फीस देकर उस महान तंबू में भीड़ बढ़ाने के मूड में नहीं हैं. दूसरे राज्यों के साहित्यकार भी कम ही उत्साहित दीख रहे हैं. केवल दिल्ली में दिन-रात सत्ता के इर्द-गिर्द चक्कर काटनेवाले प्राणी ही इस गोवर्धन पर्व से खासे उत्साहित हैं.
वैसे नरेंद्र मोदी जब संयुक्त राष्ट्र के मंच से अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा करवा सकते हैं, तब संयुक्त राष्ट्र में हिंदी को आधिकारिक भाषा घोषित कराने का सामथ्र्य भी उनमें है, ऐसा माना जा सकता है.यदि ऐसा हो सका, तो विश्व हिंदी सम्मेलन के आयोजन का पहला लक्ष्य तीन दशक बाद ही सही, पूरा हो जायेगा.
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