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प्रवासी भारतीयों में मानव धर्म

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
हम विश्वगुरु रहे हैं. गुरु देता है. ऋगवैदिक काल में मरूतगण और अश्विनी कुमार विदेशों में व्यापार करते थे. रामायण काल में हमारे साधु पूर्वी एशिया में फैले. बौद्धकाल में हमारे भिक्षु उत्तर पूर्वी एशिया में प्रसार को गये.
हाल की कनाडा यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रवासियों से आग्रह किया है कि वे नये भारत के निर्माण में अपनी मातृभूमि का सहयोग करें. आपने पूछा कि क्या कारण है कि भारत में गूगल तथा माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियां नहीं बनायी जा रही हैं? आपने नये भारत को ‘स्किल’ इंडिया की संज्ञा दी है.
स्किल के इस विकास में नि:संदेह प्रवासी भारतीयों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है. लेकिन हमें इस भरोसे नहीं रहना चाहिए कि भारत के विकास में प्रवासियों की भूमिका सकारात्ममक ही होगी. नकारात्मक भी हो सकती है.
एक दृष्टिकोण है कि पश्चिमी एवं विकासशील देश एक ही नाव में सवार हैं. भारतीय प्रवासियों द्वारा कनाडा के विकास में योगदान देना हमारे लिए सुखद है, चूंकि कनाडा की प्रगति हमारी साझा नाव की ही प्रगति है. दूसरा दृष्टिकोण है कि पश्चिमी और विकासशील देशों में शीतयुद्ध चल रहा है. विश्व आय में दोनों अपने हिस्सा बढ़ाने में लगे हैं. वास्तविकता दोनों दृष्टिकोणों के बीच है. एक सीमा तक पश्चिमी देशों के विकास का लाभ भारत को मिलता है, जैसे इन देशों में टीवी, कंप्यूटर के विकास का लाभ हमें मिला है. परंतु दूसरे दृष्टिकोण को नकारा नहीं जा सकता है.
लगभग 200 वर्ष पूर्व विश्व अर्थव्यवस्था में भारत और चीन का हिस्सा लगभग 25-25 फीसदी था. उपनिवेश काल में भारत का हिस्सा 1 फीसदी रह गया था. इसी समय पश्चिमी देशों का वर्चस्व बढ़ा और अमेरिका पूरे विश्व की आधी आय का केंद्र बन गया. भारत का पतन और पश्चिमी देशों की बढ़त एक ही सिक्के के दो पहलू हैं.
1969 में 19 वर्ष की आयु में मैं पढ़ाई करने अमेरिका गया था. जाते समय उस देश में बसने की तीव्र इच्छा थी. मैं समझता था कि भारत पिछड़ा देश है. फिर अमेरिका में अर्थशास्त्र पढ़ने का अवसर मिला. समझ आया कि भारत की बदहाली के लिए पश्चिमी देश नब्बे प्रतिशत जिम्मेवार हैं.
तब मैंने निर्णय लिया कि मैं भारत वापस आऊंगा. हमारे प्रवासी दान करते हैं. इनकी भावना का मैं सम्मान करता हूं. परंतु दान तभी फलीभूत होता है, जब सच्ची कमाई से किया गया हो. आज हमारे प्रवासी पश्चिमी देशों की भारत-विरोधी नीतियों के तले लाभ कमा रहे हैं. परिणामस्वरूप भारत गरीब हो रहा है. ये इस कमाई से दान देते हैं. इससे भारत की गरीबी दूर नहीं होगी, वैसे ही जैसे बंधुआ मजदूर की गरीबी जमींदार द्वारा दो जोड़ी धोती देने से दूर नहीं होती है.
भारत को विदेशी धन की जरूरत नहीं है. भारत की पूंजी भारी मात्र में बाहर जा रही है. अत: सरकार को प्रवासियों के सामने हाथ फैलाने के स्थान पर घरेलू गवर्नेस को सुधारना चाहिए, जिससे देश की पूंजी बाहर न जाये. मेजबान देशों में डब्लूटीओ जैसी नीतियों का विरोध करना ही प्रवासियों की सच्ची देशभ्क्ति होगी.
सरकार की दूसरी अपेक्षा आधुनिक तकनीकों की है. यहां भी पुनर्विचार करने की जरूरत है. हाल में राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा कि ‘पिछले 200 वर्षो में प्रवासियों का स्वागत करने से हमने दूसरे देशों को मात दी है.’ प्श्चिमी देशों की तकनीकी ताकत के पीछे प्रवासियों के योगदान के अन्य प्रमाण भी उपलब्ध हैं.
अमेरिका की एक पत्रिका के अनुसार, अमेरिका में पंजीकृत किये गये पेटेंट में 24 प्रतिशत प्रवासियों द्वारा लिये जाते हैं. नयी कंपनियों में प्रवासियों का हिस्सा 25 प्रतिशत है. आज अमेरिका की 100 सबसे तेजी से बढ़नेवाली कंपनियों में 6 भारतीय प्रवासियों की हैं. भारतीय लोगों में नयी तकनीकों का इजाद करने एवं उन्हें स्थापित करने की क्षमता है. समस्या है कि भारत की गवर्नेस इतनी घटिया है कि नौकरशाहों के बीच रास्ता बनाने में व्यक्ति की प्रतिभा नष्ट हो जाती है.
आधुनिक तकनीकें हासिल करने के लिए भारत के सामने दो रास्ते हैं. एक यह कि अपने देश की गवर्नेस को बदहाल रहने दे, अपनी प्रतिभा का निर्यात करे और फिर अपने प्रवासियों से कहे कि तकनीक लेकर वापस आयें. दूसरा रास्ता है कि घरेलू गवर्नेस सुधारे जिससे अपने ही देश में ही नयी तकनीकों का अविष्कार होने लगे और प्रवासियों के आगे हाथ फैलाने की जरूरत ही न रह जाये.
हम विश्वगुरु रहे हैं. गुरु देता है. ऋगवैदिक काल में मरूतगण और अश्विनी कुमार विदेशों में व्यापार करते थे.
रामायण काल में हमारे साधु पूर्वी एशिया में फैले. बौद्धकाल में हमारे भिक्षु उत्तर पूर्वी एशिया में प्रसार को गये. स्वामी प्रभुपाद ने कृष्ण लीला का वैश्विक पसार किया. बाबा रामदेव ने पूरी दुनिया को योग विद्या सिखायी है.
हमें अपनी इस परंपरा को बढ़ाना चाहिए. प्रवासियों के सामने वास्तविक चुनौती मातृभूमि को समृद्ध बनाने की नहीं है. उनके सामने चुनौती अपने मेजबान पश्चिमी देशों की उन नीतियों के विरोध का है, जिससे संपूर्ण मानव सभ्यता संकट में है. यही मातृभूमि की सच्ची सेवा होगी. मोदी का प्रयास प्रवासियों के दोहन के स्थान पर उन्हें मानव धर्म के विस्तार में लगाना होना चाहिए.
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