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अपनी आदिम संस्कृति को बचायें

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विविधता हमारे देश की महानतम विशिष्टता है. यहां अनेक धर्म-संस्कृतियां पल्लवित-पुष्पित हुई हैं. सबने जीवन के गूढ़ रहस्यों को सुलझाने व जीवन यात्र सुखद बनाने के मार्ग प्रशस्त किये हैं. इनमें से कई संस्कृतियां बाहर से भारत में आयीं तथा कुछ विशिष्ट संस्कृतियां भारत-भूमि में मौलिक रूप से सृजित हुई हैं.

भारत की मौलिक संस्कृति को प्राक्-वैदिक अथवा सनातन संस्कृति नाम से विवेचित किया गया. ये संस्कृतियां भारत की आदिम जनजातीय संस्कृतियां थीं, जो आज भी देश के विभिन्न जनजातियों के मध्य दृष्टिगोचर होती हैं. भारत की इन्हीं आदिम संस्कृति में एक है कुड़मालि भाखिचारि संस्कृति. हालांकि, इस संस्कृति के अधिकांश अवदान अब विलोपित हो चुके है. फिर भी इनके अवशेषों को जीर्ण-शीर्ण अवस्था में हम झारखंड-बंगाल-ओड़िशा के चासा (आदिम कृषक) ग्रामों में पाते हैं. कुड़मालि संस्कृति पूर्णत: कृषि पर आश्रित है, जिसमें अन्न (धान) की आराधना डिनि (मां लक्खी) के रूप में वर्ष भर की जाती है. यही मां के दूध के बाद मानव की क्षुधातृप्ति की एकमात्र विकल्प है.

एक समय जब यहां के लोगों की उदरतुष्टि का एकमात्र प्रकृतिगत विकल्प अन्न (धान) ही हुआ करता था, तब सिर्फ अन्य विकल्प के तौर पर वृक्ष के फल ही प्राप्य थे. यहां के जनजातीय समुदायों की अन्न के प्रति अप्रतिम श्रद्धा स्वरूप यह संस्कृति विकसित हुई थी. अत: कुड़मालि संस्कृति में धान के खेत-खिलहानों को पवित्रस्थल मान कर पूजा की जाती है. आज भले ही विभिन्न धर्म-संस्कृतियों का डंका बजे, परंतु आज भी देश की विशिष्ट आदिम संस्कृति के तौर पर इसे जाना जाता है. इस सनातन संस्कृति को बचाने का प्रयास किया जाना चाहिए.

महादेव महतो, बोकारो

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