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भारत-अमेरिकी संबंधों का नया दौर

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अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत यात्रा से पूर्व एक भारतीय पत्रिका को दिये साक्षात्कार में कहा है कि दोनों देशों के बीच संबंध बहुत प्रगाढ़ हैं तथा वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मिल कर इन्हें नयी ऊंचाइयों की ओर ले जाना चाहते हैं.

मोदी की अमेरिका यात्रा के दौरान दोनों नेताओं ने एक साझा लेख में भी लिखा था कि द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य और पारंपरिक लक्ष्यों से आगे ले जाने की जरूरत है और दोनों देशों के नागरिकों के हित में नया एजेंडा तैयार करने का समय आ गया है. मोदी की महत्वाकांक्षी विकास योजनाओं के लिए भारी मात्र में निवेश की आवश्यकता है.

वर्षो की मंदी के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार के कारण निवेश की संभावनाएं भी बढ़ी हैं. चीन के निरंतर बढ़ते आर्थिक वर्चस्व और वैश्विक आतंकवाद की चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका को भारत जैसे रणनीतिक सहयोगी की बड़ी जरूरत है. लेकिन दो बड़े देशों के बीच बड़े मसलों पर सहमति बनना आसान बात नहीं होती है.

इसे ओबामा ने अपने साक्षात्कार में भी माना है. अगर भारत को अमेरिकी निवेश की जरूरत है, तो उसे चीन के निवेश का भी आसरा है. भारत और चीन भी परस्पर संबंधों को बेहतर करने की कोशिश कर रहे हैं. यह सही है कि भारत ने जापान और वियतनाम से भी संबंध बढ़ाया है और चीन की कई नीतियों की आलोचना भी की है, लेकिन यह सब स्वतंत्र विदेश नीति के तहत हो रहा है.

ओबामा की यात्रा से पहले पाकिस्तान में सक्रिय भारत-विरोधी गुटों पर पाबंदी स्वागतयोग्य है, पर आतंकवाद के मसले पर अमेरिका पाकिस्तान पर अपेक्षित दबाव नहीं बना सका है. दक्षिण एशिया में शांति के लिए यह एक आवश्यक शर्त है कि पाकिस्तान चरमपंथियों और आतंकी गिरोहों को अपनी धरती का इस्तेमाल भारत के विरुद्ध करने से रोके.

अमेरिका को परमाणु सौदों में आपूर्तिकर्ता की जवाबदेही के भारतीय संसद के निर्णय को भी मानना चाहिए और निवेश के एवज में दबाव की नीति से परहेज करना चाहिए. उम्मीद है कि जब प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ओबामा रेडियो के जरिये देश से ‘मन की बात’ करेंगे, तब वे परस्पर संबंधों की बेहतरी के नये एजेंडे और दोनों देशों द्वारा की जा रही ठोस पहलों का भी उल्लेख करेंगे.

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