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Home Opinion बेटियों को बचाने के लिए सोच भी बदलें

बेटियों को बचाने के लिए सोच भी बदलें

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ योजना का प्रारंभ कर लैंगिक असंतुलन और बच्चियों के साथ भेदभाव पर नियंत्रण करने की सराहनीय पहल की है. देश के कुछ राज्यों को छोड़ दें, तो देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों से कम है.
हरियाणा में लैंगिक अनुपात की दशा सर्वाधिक चिंताजनक है, जहां प्रति हजार पुरुषों पर महिलाओं की संख्या 879 है. यही कारण है कि बेटियों को बचाने, पढ़ाने और बढ़ाने की योजना हरियाणा से शुरू की गयी है.
2011 की जनगणना के अनुसार, लैंगिक अनुपात की सूची में हरियाणा के बाद जम्मू-कश्मीर (889), पंजाब (895), उत्तर प्रदेश (912) और बिहार (918) का नाम आता है, जबकि केरल (1,084), तमिलनाडु (996), आंध्र प्रदेश (993), छत्तीसगढ़ (991) और उड़ीसा (979) का प्रदर्शन शानदार है.
राष्ट्रीय स्तर पर प्रति हजार पुरुषों पर 943 स्त्रियां हैं. हालांकि 2001 की जनगणना की तुलना में 2011 में यह अनुपात 10 फीसदी बढ़ा है, लेकिन छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लैंगिक अनुपात में आठ फीसदी की कमी आयी है, जबकि इस श्रेणी में कुल जनसंख्या में 0.4 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
इससे स्पष्ट है कि स्त्री-भ्रूणहत्या एक भयावह सच्चाई है. ऐसे में सरकार की यह कोशिश अहम है और बच्चियों के सर्वागीण विकास की आवश्यकता तथा उनके प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में बदलाव का जो संदेश उन्होंने दिया है, उस पर देश और समाज को सकारात्मकता के साथ विचार करना चाहिए. हालांकि तमाम संभावनाएं और आकांक्षाएं सपना भर रह जायेंगी, यदि महिलाओं के प्रति नजरिये में परिवर्तन नहीं होगा, कुछ संगठनों का अनर्गल प्रलाप बंद नहीं होगा.
प्रधानमंत्री द्वारा मशहूर शायर हाली के शब्दों में किये महिलाओं के महत्व के रेखांकन को देश के मन की गहराइयों में रच-बस जाना चाहिए : ‘ऐ मांओं, बहनों, बेटियों, दुनिया की जीनत तुमसे है/ मुल्कों की बस्ती हो तुम्हीं, कौमों की इज्जत तुमसे है’. उम्मीद है कि इस योजना की सफलता के लिए सरकार और समाज मिल कर काम करेंगे, तथा मोदी के संदेश पर उनके वे सहयोगी और समर्थक भी विचार करेंगे जो महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद रखना चाहते हैं तथा उन्हें संतानोत्पत्ति का साधन-भर समझते हैं.
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