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विदेशी पूंजी का लाभ किसके लिए?

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शीतला सिंह
संपादक, जनमोर्चा
जो विदेशी कंपनियां भारत को गरीब, पूंजीहीन, कम मजदूरी वाला मानती हैं, वे लाभ उठायेंगी. वे जो तकनीक अपनायेंगी, उसमें तो काम करनेवालों को कोई लाभ नहीं होनेवाला, क्योंकि उनकी संख्या पहले की अपेक्षा और घट जायेगी. तो क्या इससे समाज में असंतोष नहीं पनपेगा?
गांधीनगर में हुए वाइब्रैंट गुजरात समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विश्व शक्तियों को भारत में निवेश के लिए आगे आने का आमंत्रण दिया. उन्होंने कहा कि हमारे यहां उन्हें विदेशी निवेश के लिए भरपूर मौके हैं और हमने भी इसके लिए दरवाजे खोल दिये हैं. यह ठीक है, लेकिन जब देश का विकास करना हो तो साधन कहां से आयेंगे, इसके स्नेत ढूंढ़ने ही पड़ेंगे. इसके दो मार्ग हैं, एक तो आंतरिक स्नेतों का पता लगा कर उन्हें प्राप्त किया जाये और दूसरा उद्यम विकास के लिए विभिन्न उद्यमियों को पूंजी निवेश का मौका दिया जाये. यह हमारे देश और पूंजी का विनिवेश करनेवाले दोनों के लिए लाभकारी होगा.
दरअसल, पूंजीपरक सोच पर आधारित उद्यम में देश के विकास से अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति कार्य करती है. देश की आजादी के बाद एक सोच यह भी बनी थी कि देश का विकास विदेशी कंपनियों और पूंजीपतियों की इच्छा-सुविधा पर नहीं होना चाहिए, बल्कि हमें आत्मनिर्भरता का रास्ता अपने साधनों के बल पर ही बनाना चाहिए. अब दुनिया छोटी हो गयी और इसकी जरूरतें भी बढ़ी हैं. इसलिए जिन प्रश्नों पर विदेशी वस्तुओं, साधनों की जरूरत है, उनके निर्यात को भी सीमित किया जाये, क्योंकि आयात-निर्यात का जब तक संतुलन नहीं होगा, तब तक देश के लिए इससे नया संकट ही पैदा होगा.
जब 1977 में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी, तो उसने देश की कई कंपनियों को अनावश्यक मान कर उन्हें बाहर जाने का निर्देश दिया था. यह तर्क दिया गया कि आखिर क्या पेय पदार्थ बनाने के लिए भी हमें पेप्सी और कोका कोला जैसी विदेशी कंपनियों की जरूरत होगी? फिर एक नया युग 1990 में वैश्वीकरण का आरंभ हुआ. घोषणा तो यह थी कि इसके माध्यम से हम पूरी दुनिया का विकास करेंगे, लेकिन इसके पीछे अंतर्निहित तत्व यह था कि पूंजी का वर्चस्व स्थापित करके दुनिया में एक औद्योगिक साम्राज्य की ओर अग्रसर होंगे. औद्योगिक रूप से समृद्ध देशों में मंदी का दौर आ रहा था. वे जो कुछ बना रहे थे, उसके लिए बाजार की खोज मुश्किल थी. इसलिए वैश्वीकरण के वास्तविक लक्ष्य को पाने के लिए उत्पादन के क्षेत्रों को संभावनाओं को ध्यान में रख कर विकसित किया जाये, इससे लाभ का अनुपात भी बढ़ेगा और कमी वाले क्षेत्र की मजबूरियों का पूरा लाभ भी उठाया जा सकेगा. इसलिए इस दृष्टि से वाईब्रेंट गुजरात के आयोजन को मुक्त नहीं किया जा सकता.
अब सवाल उठता है कि विभिन्न देशों को पूंजी निवेश से किन-किन क्षेत्रों को कितना लाभ पहुंचाया जा सकेगा. इससे भारत जैसे देशों को कितना लाभ होना है. इस भारी पूंजी निवेश का सबसे बड़ा लाभ कहीं देश के पांच फीसदी घरानों को ही तो नहीं मिलने जा रहा है? जब कृषि के क्षेत्र में भी विदेशी निवेश इसे लाभ पहुंचाने के लिए होगा, तो सबसे बड़े कृषक वर्ग पर उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? यह तो हो सकता है कि उपभोक्ता को मिलनेवाला सामान कुछ सस्ता हो जाये, लेकिन इससे जो बेरोजगारी पैदा होगी, उसके के लिए कौन सा रास्ता अपनाया जायेगा? जो विदेशी कंपनियां भारत को गरीब, पूंजीहीन, कम मजदूरी वाला मानती हैं, वे लाभ उठायेंगी. वे जो तकनीक अपनायेंगी, उसमें तो काम करनेवालों को कोई लाभ नहीं होनेवाला, क्योंकि उनकी संख्या पहले की अपेक्षा और घट जायेगी. तो क्या इससे समाज में असंतोष नहीं पनपेगा?
फिलहाल सबसे बड़ा डर यही है कि देश को विकसित करने के नाम पर जिस पूंजी को निवेश के लिए आमंत्रित किया जा रहा है, उसका सकल प्रभाव क्या होगा? हो सकता है कि इस निवेश के फलस्वरूप मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ संभव हो जाये, लेकिन इसका लाभ समाज के किन वर्गो को कितना मिलेगा? क्या इससे काम के अवसर बढ़ने और बेरोजगारी घटने की संभावना है? जिस बड़े पैमाने पर बैंक में खाते खुलवा कर लाभ पहुंचाने की घोषणा हो रही है, क्या इससे लोगों को सरकार पर आश्रित बनाया जायेगा? क्या यह उनकी स्वतंत्रता और आकांक्षा के अनुरूप लोकतंत्र को मजबूत करनेवाला होगा?
हमारा समाज आर्थिक रूप से विभिन्न समुदायों-श्रेणियों में बंटा हुआ है. अत: जरूरी यह है कि हम उन्हें समृद्ध बनायें और ऐसी योजनाएं लायें, जिससे कुछ मुट्ठीभर लोगों का ही भला न हो, बल्कि उससे लाभान्वित होनेवाला एक बड़ा समाज हो. अभी तक जिस विकास की चर्चा की गयी है, उसे समग्र और सभी के लिए तो नहीं ही माना जा सकता है. जिन सरकारी योजनाओं को विदेशी पूंजी के सुपुर्द करने के लिए निवेश में छूट की सीमाएं बढ़ायी जा रही हैं, उससे लाभ पानेवाला वर्ग कितना बड़ा है? यदि सार्वजनिक क्षेत्र भी पूंजी के हवाले कर दिया गया, तो भविष्य में यह राष्ट्रीय शोषण का आधार तो नहीं बन जायेगा? इसलिए वास्तविक लाभ किसको पहुंचेगा, यह प्रश्न बहुत ही महत्वपूर्ण है. डर है कि कहीं यह अमीरी और गरीबी के अंतर को बढ़ानेवाला नुस्खा न साबित हो.
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