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Home Opinion गांधी सेतु के वजूद पर गहराता संकट

गांधी सेतु के वजूद पर गहराता संकट

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गांधी सेतु अब अपनी शान नहीं, वजूद के संकट को लेकर चर्चा में है. इस संकट ने राज्य के 18 जिलों से गंगा पार के इलाकों के सड़क-संपर्क को जटिल बना दिया है. इस पुल को पार करना ‘गंगा पार उतरने’ के समान है. हालात ऐसे हैं कि पुल की जिस दूरी को पार करने में 15 मिनट लगने चाहिए, उसमें तीन से छह घंटे लग रहे हैं.
लोग यह मान कर चलते हैं कि इस पुल को पार करने में कितना भी समय लग सकता है. जाहिर है कि वक्त की कीमत को इस पुल की मौजूदा स्थिति ने कम कर दिया है. इस पुल से गुजरने की बात सोच कर रूह कांप जाती है. 32 साल पुराने इस पुल के जीर्णोद्धार को लेकर 17 सालों से काम चल रहा है, लेकिन यह काम समग्र रूप में न होकर टुकड़ों में होता रहा है. लिहाजा भले इसकी मरम्मत पर अब तक 113 करोड़ रुपये से अधिक खर्च हुए हों, नतीजा ठोस नहीं रहा. यह पुल अब और भरोसे का नहीं रह गया है. इस साल सितंबर में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने इसे लेकर गंभीरता दिखायी थी.
उन्होंने इसकी मरम्मत का काम जल्द शुरू करने की बात की थी. यह उम्मीद की गयी थी कि तीन-चार माह में काम शुरू हो जायेगा, लेकिन लगभग ढाई माह बीत जाने के बाद लगता नहीं है कि यह काम जल्द शुरू हो पायेगा. दूसरी ओर पुल तेजी से कमजोर हो रहा है और इसकी रफ्तार को कम करने के लिए वाहनों की रफ्तार कम की जा रही है. सच तो यह है कि इस सेतु को बचाने को लेकर गंभीरता दिखाने में केंद्र सरकार ने बहुत देर कर दी है. सक्रिय होने में अब और देर करना बिहार के लिए नुकसानदेह होगा. सेतु का एक लेन पहले से बंद है. दूसरे लेन पर मई 2014 से भारी वाहनों का परिचालन ठप है.
फिर भी वाहन के कमजोर होने और इस पर जाम लगने का सिलसिला जारी है. इस पुल का विकल्प नहीं है, जो उत्तर और दक्षिण बिहार को आर्थिक, सामाजिक और यातायात की दृष्टि से सुगमता से जोड़ सके. मोकामा और भागलपुर गंगा पुल, गांधी सेतु का विकल्प नहीं हो सकते. गांधी सेतु वास्तव में बिहार की जीवन रेखा है. इसे बरकरार रखने के लिए राज्य और केंद्र सरकार को पूर्वाग्रह को त्याग कर, बेहतर समन्वय बना कर और प्रक्रिया की जटिलता को दूर कर इस सेतु के पुनरुद्धार का काम जल्द शुरू करना चाहिए.
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