[tdb_header_weather inline="yes" temp_color="#000000" loc_color="#000000" api="653566bd56b7ecfee45d74c0fc937fc1" float_right="yes" align_horiz="content-horiz-center" icon_size="24" icon_space="10" f_temp_font_family="420" f_temp_font_size="14" f_temp_font_weight="500" f_unit_font_size="14" f_loc_font_size="14" f_unit_font_family="882" location="Ranchi" icon_color="#000000"]
[tdb_header_categories align_horiz="content-horiz-left" el_align_horiz="content-horiz-left" tdc_css="eyJhbGwiOnsibWFyZ2luLXJpZ2h0IjoiNSIsImhlaWdodCI6IjQwIiwiZGlzcGxheSI6IiJ9fQ==" icon_size="18" limit="18" elem_text_color="#2d2800" f_elem_font_family="420" f_elem_font_size="16px" f_elem_font_weight="500" tdicon="tdc-font-fa tdc-font-fa-navicon-reorder-bars" inline="yes" shadow_shadow_size="0" shadow_shadow_offset_vertical="0" shadow_shadow_spread="0" bg_color="#f9f9f9" include="1028, 1081, 1446, 1228, 3706, 2624,1071"][tdb_mobile_horiz_menu inline="yes" menu_id="372" tdc_css="eyJwaG9uZSI6eyJkaXNwbGF5IjoiIn0sInBob25lX21heF93aWR0aCI6NzY3LCJhbGwiOnsiYm9yZGVyLXN0eWxlIjoibm9uZSIsImRpc3BsYXkiOiIifX0=" f_elem_font_size="18px" f_elem_font_weight="eyJhbGwiOiI3MDAiLCJwaG9uZSI6IiJ9" f_elem_font_family="420" text_color_h="#f58220" main_sub_icon_size="13"]
Home Opinion बत्ती गुल होते ही तन गये मिट्टी के दीये

बत्ती गुल होते ही तन गये मिट्टी के दीये

0
पंकज कुमार पाठक
प्रभात खबर, रांची
आफिस में दीपावली की छुट्टी थी. अपनी बालकनी में बैठ कर छुट्टी इंजॉय कर रहा था. शर्माजी, तिवारीजी.. सब पड़ोसी एक-दूसरे से बेखबर, बिजली के बल्ब-तार में उलझे थे. शर्माजी की नजरें मुझसे टकरायीं, तो बोले, ‘गुडमार्निग, पाठकजी!
दिवाली की सब तैयारी हो गयी?’ मैंने सादर अभिवादन स्वीकारते हुए कहा,‘ हम जैसे दैनिक मजदूरों के लिए दिवाली सिर्फ आराम करने का मौका है, शर्माजी.’ मेरी बात पर हंसते हुए शर्माजी बोले, ‘मेरा मतलब है कि लाइट-वाइट लगाये या नहीं?’ मैंने कहा, ‘हां कल बाजार से दीया लाया हूं, रात में जलाऊंगा.’ हमारी बातचीत में तिवारीजी शरीक हुए और बोले, ‘दीया-वीया. सब आउट-डेटेड चीज है. आज कल टुन्नी लाइट (चाइनीज लाइट) का जमाना है.
कहां आप दीया पकड़ कर बैठे हैं.’ उनकी बात सुनते ही पड़ोसियों ने ठहाका लगाया. फिर तिवारीजी बोले, ‘ देखिएगा आज रात. मेरा घर ‘एक-पीस’ लगेगा. कल ही सौ लड़ी चायनीज लाइट खरीदे और पूरे घर को सजा दिया है.’ शर्माजी ने भी तिवारीजी की बात का समर्थन किया, फिर बिजली के बल्ब-तार में उलझ गये. शाम हुई, दीवाली मनाने हम सब नीचे आये. एक -दूसरे को दिवाली की बधाई दी. अपना घर और पड़ोसियों के घरों को देखा. बिजली के गुलाम और चमकीले चायनीज बल्बों के आधार पर की गयी घरों की सजावट पर मिलनेवाली हर तारीफ या कमेंट पर ‘घरवाले’ खुश हो रहे थे.
मायावी सजावट के पीछे का असली चेहरा कोई नहीं देखना चाहता था. कॉलोनी का एक-एक घर कैदी बन गया था. चमकीली सलाखों के पीछे कैद इन घरों का दर्द सुननेवाला कोई नहीं था. इन घरों के दिलों की आवाजों पर पटाखों का शोर हावी था. दूसरी तरफ परंपरा के नाम पर, सौतेला व्यवहार सहते हुए एक -दो दीये, हर घर की दीवारों पर बैठे अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे. मैं कल्पना लोक से बाहर निकला, तब तक शायद भगवान ने कैदी घरों और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे दीयों की फरियाद सुन ली. पूरी कालोनी, अंधेरे की गिरफ्त में थी. इस बार सिर्फ बिजली नहीं गयी थी, बल्कि ट्रांसफर्मर जला था. शर्माजी ने तुरंत अपने मित्र और बिजली विभाग के अधिकारी को फोन मिलाया.
अधिकारी ने अपनी मजबूरी बतायी. एक-दो दिन में ठीक कराने का आश्वासन दिया और और मजाक के अंदाज में गंभीर बात कह गये. उन्होंने कहा, ‘प्रकाश उत्सव को उत्सव की तरह मनाते, तो ट्रांसफर्मर नहीं जलता. आजकल दिवाली के दिन सिर्फ वायु प्रदूषण ही नहीं होता, बल्कि ‘प्रकाश प्रदूषण’ भी होने लगा है. ट्रांसफर्मर की क्षमता सीमित है और लाइटें असीमित लगा देंगे तो क्या होगा? वही होगा, जो आपकी कालोनी में हुआ है..’ और क्षमा मांग ली. पल भर में दृश्य बदल गया. अब ‘घरवाले’ मायूस थे और हंसते-मुस्कुराते घरों के ऊपर दीये अपनी सुनहरी रोशनी, शान-से बिखेर रहे थे.
ऐप पर पढें
होम आप का शहर
News Snap News Reel